चाबहार पोर्ट को सफल बनाने के लिए भारत ने अमेरिका को कैसे झुकाया??
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https://www.thehindu.com/news/national/india-iran-agree-to-accelerate-chabahar-development/article30374799.ece
https://www.financialexpress.com/defence/india-oman-and-iran-a-troika-of-significance/1804632/
https://www.hindustantimes.com/india-news/india-iran-to-boost-economic-viability/story-nEUGUqM1Yphjg9OgGPyLuJ.html
https://www.indiatoday.in/india/story/india-us-iran-javad-zarif-1619837-2019-11-17
आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
जैसा की आपको पता है, इस महीने भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका की यात्रा करि.
इस यात्रा के दौरान हम सभी का ध्यान इसी और डाइवर्ट कर दिया गया, की भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल से सिर्फ इसलिए मिलने से मना कर दिया, क्योकि उस प्रतिनिधि मंडल में भारतीय मूल की प्रमिला जयपाल शामिल थी.
अब आप देखिये वामपंथी और भारत की आलोचना करने वाले लोग किस तरह फालतू की चीज़ों पर हमारा ध्यान भटका देते हैं, जबकि उस दौरान हमें सिर्फ यह देखना चाहिए था, की विदेश मंत्री जी की यात्रा से भारत को क्या लाभ पंहुचा.
चलिए आगे बढ़ते हुए, आप सभी को पता है, चाबहार पोर्ट भारत के लिए कितना इम्पोर्टेन्ट है. और वर्ष 2016 में इस पोर्ट को लेकर भारत अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच समझौता हुआ था.
इससे पहले की चाबहार पोर्ट रफ़्तार पकड़ पाता, ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबन्ध लग गए. लेकिन वर्ष 2018 में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से अमेरिका ने चाबहार पोर्ट को ढिलाई दे दी.
चाबहार पोर्ट से होकर ट्रेड तो चल रहा था, लेकिन चाबहार पोर्ट को अमेरिकन सैंक्शंस से राहत दिलाने के लिए भारत और अफ़ग़ानिस्तान को थैंक यू बोलने के बजाये, कुछ ही महीनो पहले ईरान के विदेश मंत्री ने कहा था, की चाबहार पोर्ट पर प्रगति बहुत धीमी है.
यहाँ ध्यान देने वाली बात है, दिसंबर 2018 में जब भारत ने चाबहार पोर्ट के Shahid Beheshti टर्मिनल का operational कण्ट्रोल 10 वर्षों के लिए अपने हाथ में लिया, तब से लेकर आज तक 5 लाख टन कार्गो को इस पोर्ट ने हैंडल भी किया है.
फिर भी हमारा कहना यह था, की चाबहार पोर्ट पर व्यापार और तेजी से आगे बढ़ सकता है, इसके लिए तीनो देशों को एक दूसरे की तरफ उंगली दिखने के बजाय कंधे से कन्धा मिलाना चाहिए.
चाबहार पोर्ट पर कार्गो की हैंडलिंग के बड़े बड़े इक्विपमेंट जैसे की rail-माउंटेड क्रेन खरीदने के लिए आर्डर 2 साल पहले दे दिया गया था.
लेकिन चूँकि उन इक्विपमेंट के लिए पैमेंट डॉलर में होना था, इसीलिए इन आर्डर के लिए इंटरनेशनल बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाना था.
एक और ईरान पर अमेरिकी सैंक्शन लगे हुए थे, तो दूसरी और ईरान के चाबहार पोर्ट को अमेरिकी सैंक्शंस से ढिलाई मिली हुई थी. इसलिए ईरान का नाम सुनते ही डॉलर में काम करने वाले बैंक्स को सांप सूंघ जाता था.
चाबहार पोर्ट को लेकर वह डॉलर में ट्रांसक्शन कर सकते हैं, लेटर ऑफ़ क्रेडिट के कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक बैंक्स चाबहार पोर्ट के लिए इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनी को पैमेंट कर सकते हैं, इसके बारे में अमेरिका ने पहले मौखिक रूप से अस्वासन दिए थे.
लेकिन आपको भी अंदाज़ा है, किसी ने कब क्या कहा, इस पर बैंक काम नहीं करते हैं, उन्हें चाहिए होता है, डॉक्युमेंटरी एविडेंस.
जिसके आभाव में भारत किसी भी इंटरनेशनल बैंक से लेटर ऑफ़ क्रेडिट नहीं खुलवा पा रहा था, और कोई भी कंपनी चाबहार पोर्ट के लिए इक्विपमेंट का कंस्ट्रक्शन चालू नहीं कर पा रही थी, क्योकि उसे कन्फर्म पता नहीं था, की जैसे जैसे इक्विपमेंट बनेगा, वैसे वैसे कॉन्ट्रैक्ट के माइलस्टोन के मुताबिक बैंक पैमेंट करेगा.
आप ही बताएं, पेमेंट की गारंटी न हो, तो कौन अपना पैसा फसायेगा.
इसलिए दो सालों से भारत ने जो आर्डर प्लेस किये हुई थे, वह लटके हुए थे, फिर भी यह काबिले तारीफ है, की बेहतर और बड़े इक्विपमेंट का wait किये बिना, भारत ने चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल चालू रखा.
इसी बैकग्राउंड में भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका के फॉरेन सेक्रेटरी से मुलाक़ात करि. जिसमे भारत ने अमेरिका को समझाया, की भाई, अमेरिकी प्रतिबंधों से चाबहार पोर्ट को ढिलाई मिली हुई है, ये सिर्फ बातें हैं,बातों का क्या.
इसलिए भारत की बात अमेरिका के गले उतर गयी, और उसने पहली बार लिखित में अस्वासन दिया. सरल शब्दों में इसका मतलब है, की यदि कोई बैंक चाबहार पोर्ट के लिए डॉलर में ट्रांसक्शन करने के लिए अपनी गर्दन बहार निकालता है, तो अमेरिकन सैंक्शंस की तलवार से उसकी गर्दन काटी नहीं जाएगी.
अब इस डॉक्यूमेंट को दिखाकर भारत चाबहार पोर्ट के लिए 85 मिलियन डॉलर के इक्विपमेंट खरीद पायेगा.
लेकिन भारतीय विदेश मंत्री यही रुकने वाले नहीं थे, उन्होंने अमेरिका से लौटने के बाद ईरान और ओमान की यात्रा करि.
और ओमान में भारत ईरान और ओमान के विदेश मंत्री एक ही कमरे में बैठे, ताकि ईरान और भारत के बीच के गिले सिकवे मिटाये जा सकें.
चाहे अमेरिका हो या भारत हो ईरान के साथ मोल भाव किसी को भी करना हो, ओमान उसमे ब्रिज का काम करता है.
लेकिन बड़ी बात यह है, की चाबहार पोर्ट की प्रगति के लिए ओमान की मदद हमें वैसे भी चाहिए होगी.
अभी तक चाबहार पोर्ट से व्यापार करने के लिए भारत व्यापारियों को 40% सब्सिडी देता है, और कुछ मात्रा में ईरान भी सब्सिडी देता है.
ईरान के विदेश मंत्री से मुलाक़ात के बाद निर्णय लिया गया, की दोनों देश चाबहार पोर्ट से व्यापार के लिए और सब्सिडी मुहैया कराएँगे, ताकि व्यापारियों को पाकिस्तान के कराची और ईरान के बन्दर अब्बास बंदरगाह की बजाय चाबहार पोर्ट से व्यापार करने में जायदा लाभ हो.
बात वही सिंपल है, चाबहार पोर्ट को सफल बनाने की जिम्मेदारी भारत और ईरान दोनों की है.
जहाँ तक चाबहार पोर्ट को दी जाने वाली सब्सिडी का सवाल यह है, यहाँ पर कहना जरूरी है, की यह भारतीय टैक्स पयेर्स का ही पैसा है.
और यह सिद्ध करता है, की भारत का आम टैक्स पेयर भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच व्यपार को बढ़ाने के लिए आज अपने पैसो की कुर्वानी दे रहा है.
अच्छी बात यह है, की हमारे विदेश मंत्री यह बात समझते हैं, इसलिए वह चाबहार पोर्ट से जुडी समस्यायों को सुलझाने की ना सिर्फ कोसिस कर रहे हैं, बल्कि उसमे सफल भी हो रहे हैं.
यह अलग बात हैं, की उनकी इस सफलता को ना तो व्यापक तौर पर कवर किया जाता है, और ना ही उन्हें थैंक यू बोला जाता है.
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
जैसा की आपको पता है, इस महीने भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका की यात्रा करि.
इस यात्रा के दौरान हम सभी का ध्यान इसी और डाइवर्ट कर दिया गया, की भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल से सिर्फ इसलिए मिलने से मना कर दिया, क्योकि उस प्रतिनिधि मंडल में भारतीय मूल की प्रमिला जयपाल शामिल थी.
अब आप देखिये वामपंथी और भारत की आलोचना करने वाले लोग किस तरह फालतू की चीज़ों पर हमारा ध्यान भटका देते हैं, जबकि उस दौरान हमें सिर्फ यह देखना चाहिए था, की विदेश मंत्री जी की यात्रा से भारत को क्या लाभ पंहुचा.
चलिए आगे बढ़ते हुए, आप सभी को पता है, चाबहार पोर्ट भारत के लिए कितना इम्पोर्टेन्ट है. और वर्ष 2016 में इस पोर्ट को लेकर भारत अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच समझौता हुआ था.
इससे पहले की चाबहार पोर्ट रफ़्तार पकड़ पाता, ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबन्ध लग गए. लेकिन वर्ष 2018 में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से अमेरिका ने चाबहार पोर्ट को ढिलाई दे दी.
चाबहार पोर्ट से होकर ट्रेड तो चल रहा था, लेकिन चाबहार पोर्ट को अमेरिकन सैंक्शंस से राहत दिलाने के लिए भारत और अफ़ग़ानिस्तान को थैंक यू बोलने के बजाये, कुछ ही महीनो पहले ईरान के विदेश मंत्री ने कहा था, की चाबहार पोर्ट पर प्रगति बहुत धीमी है.
यहाँ ध्यान देने वाली बात है, दिसंबर 2018 में जब भारत ने चाबहार पोर्ट के Shahid Beheshti टर्मिनल का operational कण्ट्रोल 10 वर्षों के लिए अपने हाथ में लिया, तब से लेकर आज तक 5 लाख टन कार्गो को इस पोर्ट ने हैंडल भी किया है.
फिर भी हमारा कहना यह था, की चाबहार पोर्ट पर व्यापार और तेजी से आगे बढ़ सकता है, इसके लिए तीनो देशों को एक दूसरे की तरफ उंगली दिखने के बजाय कंधे से कन्धा मिलाना चाहिए.
चाबहार पोर्ट पर कार्गो की हैंडलिंग के बड़े बड़े इक्विपमेंट जैसे की rail-माउंटेड क्रेन खरीदने के लिए आर्डर 2 साल पहले दे दिया गया था.
लेकिन चूँकि उन इक्विपमेंट के लिए पैमेंट डॉलर में होना था, इसीलिए इन आर्डर के लिए इंटरनेशनल बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाना था.
एक और ईरान पर अमेरिकी सैंक्शन लगे हुए थे, तो दूसरी और ईरान के चाबहार पोर्ट को अमेरिकी सैंक्शंस से ढिलाई मिली हुई थी. इसलिए ईरान का नाम सुनते ही डॉलर में काम करने वाले बैंक्स को सांप सूंघ जाता था.
चाबहार पोर्ट को लेकर वह डॉलर में ट्रांसक्शन कर सकते हैं, लेटर ऑफ़ क्रेडिट के कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक बैंक्स चाबहार पोर्ट के लिए इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनी को पैमेंट कर सकते हैं, इसके बारे में अमेरिका ने पहले मौखिक रूप से अस्वासन दिए थे.
लेकिन आपको भी अंदाज़ा है, किसी ने कब क्या कहा, इस पर बैंक काम नहीं करते हैं, उन्हें चाहिए होता है, डॉक्युमेंटरी एविडेंस.
जिसके आभाव में भारत किसी भी इंटरनेशनल बैंक से लेटर ऑफ़ क्रेडिट नहीं खुलवा पा रहा था, और कोई भी कंपनी चाबहार पोर्ट के लिए इक्विपमेंट का कंस्ट्रक्शन चालू नहीं कर पा रही थी, क्योकि उसे कन्फर्म पता नहीं था, की जैसे जैसे इक्विपमेंट बनेगा, वैसे वैसे कॉन्ट्रैक्ट के माइलस्टोन के मुताबिक बैंक पैमेंट करेगा.
आप ही बताएं, पेमेंट की गारंटी न हो, तो कौन अपना पैसा फसायेगा.
इसलिए दो सालों से भारत ने जो आर्डर प्लेस किये हुई थे, वह लटके हुए थे, फिर भी यह काबिले तारीफ है, की बेहतर और बड़े इक्विपमेंट का wait किये बिना, भारत ने चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल चालू रखा.
इसी बैकग्राउंड में भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका के फॉरेन सेक्रेटरी से मुलाक़ात करि. जिसमे भारत ने अमेरिका को समझाया, की भाई, अमेरिकी प्रतिबंधों से चाबहार पोर्ट को ढिलाई मिली हुई है, ये सिर्फ बातें हैं,बातों का क्या.
इसलिए भारत की बात अमेरिका के गले उतर गयी, और उसने पहली बार लिखित में अस्वासन दिया. सरल शब्दों में इसका मतलब है, की यदि कोई बैंक चाबहार पोर्ट के लिए डॉलर में ट्रांसक्शन करने के लिए अपनी गर्दन बहार निकालता है, तो अमेरिकन सैंक्शंस की तलवार से उसकी गर्दन काटी नहीं जाएगी.
अब इस डॉक्यूमेंट को दिखाकर भारत चाबहार पोर्ट के लिए 85 मिलियन डॉलर के इक्विपमेंट खरीद पायेगा.
लेकिन भारतीय विदेश मंत्री यही रुकने वाले नहीं थे, उन्होंने अमेरिका से लौटने के बाद ईरान और ओमान की यात्रा करि.
और ओमान में भारत ईरान और ओमान के विदेश मंत्री एक ही कमरे में बैठे, ताकि ईरान और भारत के बीच के गिले सिकवे मिटाये जा सकें.
चाहे अमेरिका हो या भारत हो ईरान के साथ मोल भाव किसी को भी करना हो, ओमान उसमे ब्रिज का काम करता है.
लेकिन बड़ी बात यह है, की चाबहार पोर्ट की प्रगति के लिए ओमान की मदद हमें वैसे भी चाहिए होगी.
अभी तक चाबहार पोर्ट से व्यापार करने के लिए भारत व्यापारियों को 40% सब्सिडी देता है, और कुछ मात्रा में ईरान भी सब्सिडी देता है.
ईरान के विदेश मंत्री से मुलाक़ात के बाद निर्णय लिया गया, की दोनों देश चाबहार पोर्ट से व्यापार के लिए और सब्सिडी मुहैया कराएँगे, ताकि व्यापारियों को पाकिस्तान के कराची और ईरान के बन्दर अब्बास बंदरगाह की बजाय चाबहार पोर्ट से व्यापार करने में जायदा लाभ हो.
बात वही सिंपल है, चाबहार पोर्ट को सफल बनाने की जिम्मेदारी भारत और ईरान दोनों की है.
जहाँ तक चाबहार पोर्ट को दी जाने वाली सब्सिडी का सवाल यह है, यहाँ पर कहना जरूरी है, की यह भारतीय टैक्स पयेर्स का ही पैसा है.
और यह सिद्ध करता है, की भारत का आम टैक्स पेयर भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच व्यपार को बढ़ाने के लिए आज अपने पैसो की कुर्वानी दे रहा है.
अच्छी बात यह है, की हमारे विदेश मंत्री यह बात समझते हैं, इसलिए वह चाबहार पोर्ट से जुडी समस्यायों को सुलझाने की ना सिर्फ कोसिस कर रहे हैं, बल्कि उसमे सफल भी हो रहे हैं.
यह अलग बात हैं, की उनकी इस सफलता को ना तो व्यापक तौर पर कवर किया जाता है, और ना ही उन्हें थैंक यू बोला जाता है.
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