Well Done Modi ji - India Stopped Following One China Policy



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Reference
https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/policy/new-fdi-rules-not-for-taiwan-inflows/articleshow/75479443.cms
https://www.financialexpress.com/industry/sme/startup-lobby-sai-seeks-rs-25000-startup-india-fund-writes-letter-to-commerce-minister-piyush-goyal-dpiit-secretary-for-chinese-investments/1944120/
https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/policy/rcep-urges-india-to-return-to-negotiating-table-as-covid-19-wrecks-economies/articleshow/75477407.cms
https://www.aninews.in/news/world/europe/indias-reciprocated-one-china-policy-needs-to-be-reviewed-says-efsas20191113200539/
https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/policy/new-fdi-rules-trigger-concerns-over-investments-from-taiwan/articleshow/75459501.cms
https://en.wikipedia.org/wiki/China%E2%80%93India_relations
https://en.wikipedia.org/wiki/Regional_Comprehensive_Economic_Partnership


जैसा की आपको पता है, की 18 अप्रैल को भारत ने अपनी फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट की पालिसी में बदलाव कर दिया, जिससे यह साफ़ हो गया, की चीन से भारत डायरेक्टली अथवा घुमा फिरा के indirectly आने वाले हर निवेश को सरकारी अप्रूवल की प्रतीक्षा करनी होगी.





हालाँकि यह नियम हम सभी के लिए बेहद संतोष प्रद  था, क्योकि पहली बार भारत ने दोस्तों के निवेश और दुश्मन की साजिस में भेद करने का निश्चय किया था. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में ताइवान ने इंडियन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड एनर्जी सेक्टर्स में अच्छा निवेश किया हुआ है, इसलिए एक बड़ा सवाल पैदा हो गया था, की क्या ताइवान से भारत आने वाले निवेश की राह में भी रुकावट पैदा हो जाएगी.





आप सभी को पता है, की वर्ष 1949 से ही भारत One चाइना  की पालिसी का पालन करता हुआ आया है, यहाँ तक की वर्ष 1950 में पाकिस्तान से भी पहले भारत दुनिया का ऐसा पहला नॉन communist देश था, जिसने चीन के साथ डिप्लोमेटिक रिलेशनशिप स्थापित किये.



आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले नेहरू ने चीन का तुस्टीकरण किया, परिणाम यह हुआ, की 1962 की लड़ाई में चीन ने उनकी पीठ पर ऐसा छुरा घोंपा, की उसके बात नेहरू ग्लोबल स्टेज पर सीना तान के खड़े नहीं हो पाए.



जबकि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में हस्तक्चेप करने का चीन कोई मौका कभी नहीं छोड़ता है, फिर भी भारत के ऊपर से आजतक one चाइना की पालिसी का पागलपन नहीं उतरा था, इसलिए सवाल और भी गंभीर हो गया था, की one चाइना की पालिसी के कारण क्या भारत में ताइवान के निवेश को भी सरकारी अप्रूवल का इंतजार करना होगा.



अब साहस दिखाते हुए मोदी सर्कार ने साफ़ कर दिया है, की ताइवान से भारत में निवेश पर 18 अप्रैल के पालिसी परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. यानि की पहले की तरह अब भी ताइवान के भारत में इन्वेस्टमेंट को खुला स्वागत है.



चीन भले ही ताइवान को स्वतंत्र ना मानते हुए उसे अपना एक अलग थलग प्रान्त मानता रहे, लेकिन one चाइना की पालिसी से हमें क्या लेना देना, भारत के लिए ताइवान एक अलग और स्वतंत्र देश है.



भारत ने निवेश के  लिए जिस तरह ताइवान और चीन में अंतर करने का निर्णय लिया है, वह एक बेहद स्मार्ट मूव है, इसे कहते हैं, सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे.



ताइवान भारत में निवेश करता रहेगा, और चीन सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटेगा.



जब तक चीन One इंडिया के अस्तित्वा को स्वीकार नहीं करता है, उसे कोई हक़ नहीं है, की वह भारत से One चाइना की पालिसी के पालन की अपेक्षा करे.  वैसे भी ताइवान हमारा लोकतान्त्रिक मित्र देश है, उसके निवेश को हरी झंडी हमेसा बनी रहनी चाहिए.





इसी बीच आप सभी को याद होगा, पिछले साल नवंबर ने भारत ने चीन के नेतृत्वा वाली रीजनल कम्प्रेहैन्सिव इकनोमिक पार्टनरशिप के भूत से पीछा छुड़ाया था.



तब बड़े घमंड में चूर होकर चीन ने कहा था, की हम तो इस एग्रीमेंट पर साइन करेंगे, भारत को बाद में इसमें शामिल होना हो, तो वह ज्वाइन कर सकता है.



भारत के बिना जिस महफ़िल का आयोजन चीन कर रहा था, वह महफ़िल आजतक नहीं बैठ पायी है,  और अब कोरोना वायरस संकट के कारण रीजनल कम्प्रेहैन्सिव इकनोमिक पार्टनरशिप में शामिल देशो को फिर दिन में तारे दिखने लगे हैं, इसलिए उन्होंने भारत से प्रार्थना की है, की भारत ने बातचीत की टेबल पर लौटना चाहिए, क्योकि अब यह संगठन भारतीय चिंताओं के निराकरण के लिए तैयार है.



पिछले 8 - 10 सालों से इस एग्रीमेंट पर विचार चल रहा है, फिर भी इन देशों ने भारत के हितों को दरकिनार करके सिर्फ हमारा शोषण करने के रस्ते निकाले. तो हम अब कैसे मान लें, की चीन की लीडरशिप वाले इस आर्गेनाइजेशन की अब अकल ठिकाने लग गयी होगी.



बात साफ़ है, चीन को भारत में 130 करोड़ उपभोक्ता दिखाई देते हैं, 260 करोड़ काम करने वाले हाथ नहीं.



इसलिए हमारा तो साफ़ तौर पर मत है, की भारत ने भूलकर भी RCEP की भूल भुलैया में अब नहीं घुसना चाहिए. इस एग्रीमेंट के लिए बात करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है.



चीन के अलावा RCEP में शामिल आसियान के 10 देशों ने जाने क्या फूंक रखा है, चाइनीस ड्रैगन ने पूरा का पूरा साउथ और ईस्ट चाइना सी निगल लिया है. इन्हीं देशो के पानी में इन्ही देशो की नावों को डुबाना भी चालू कर दिया है, फिर भी ये देश RCEP की टेबल पर बैठकर अपनी सम्प्रभुता का सौदा कर रहे हैं.



बात साफ़ है, इन 10 देशों ने अपना आत्मा सम्मान को बेजिंग में गिरबी रख दिया है, जो लोग दूसरों की गलतियों से नहीं सीखते हैं, वह उन्ही गलतियों का शिकार बनते हैं. आज भी इन 10 देशो की आखें नहीं खुली हैं, और तो और ये लोग भारत को भी अँधा समझने लगे हैं. इसलिए चीन ने इन देशों का समुद्र हड़प लिया तो क्या गलत किया, ये छोटे छोटे देश हैं ही इसी के लायक. चीन इन्हे लूटेगा, लेकिन फिर भी ये चीन के साथ व्यापार करेंगे.



उम्मीद है, भारत दोबारा RCEP के भवर जाल में नहीं फसेगा, अभी हमारा पूरा ध्यान होना चाहिए, भारत को ग्लोबल फैक्ट्री बनाने पर, नाकि पहले की तरह भारत को हमेसा के लिए ग्लोबल मार्केट बनाए रखने पर.

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