ग्वादर, हम्बनटोटा के बाद, हिन्द महासागर में चीन को तीसरा बंदरगाह मिला
Reference -
https://timesofindia.indiatimes.com/india/china-port-pact-in-focus-as-president-visits-myanmar/articleshow/67016367.cms
https://en.wikipedia.org/wiki/Thai_Canal
https://www.ship-technology.com/news/china-myanmar-deep-sea-port/
http://www.indiapost.com/china-clinches-multi-billion-dollar-strategic-port-deal-with-myanmar/
https://amti.csis.org/kyaukpyu-china-indian-ocean/
Transcript -
नमस्ते दोस्तों, Real Quick Info चैनल पर आपका स्वागत है. आइए, अब हम अपने Real Quick Analysis के बारे में चर्चा करते हैं.
जैसा कि हमने कई बार चर्चा की है, पाकिस्तानी लोग अगले हजार वर्षों के लिए साजिश करते हैं, चीन के लोग अगले 100 वर्षों के लिए रणनीति तैयार करते हैं, लेकिन भारत के लोग सिर्फ आज के बारे में चिंता करते हैं.
इस अंतर को सिर्फ इसी तथ्य को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है, कि पिछले नवंबर महीने में चीन और म्यांमार के बीच समझौता हुआ, जिसके अनुसार चीन म्यांमार में गहरे समुद्री बंदरगाह का निर्माण करेगा, जो चीन का हिंद महासागर में तीसरा बंदरगाह होगा. लेकिन इसके बारे में ना तो भारत की मेंस्ट्रीम मीडिया और ना ही सोशल मीडिया में बिल्कुल भी चर्चा हुई.
पाकिस्तान के ग्वादर और श्रीलंका के हंबनटोटा के बाद, हिंद महासागर में म्यांमार के क्यौकप्यू मैं चीन का तीसरा बंदरगाह बनाया जाने वाला है.
शायद जब चीन क्यौकप्यू बंदरगाह को नौसैनिक अड्डे में तब्दील कर देगा, केवल तभी हमें जागने की जरूरत पड़ेगी.
यहां पर साफ करने वाली बात यह है, की म्यानमार के संविधान के अनुसार कोई भी विदेशी देश अपनी सेना को म्यांमार की जमीन पर तैनात नहीं कर सकता है. इसलिए ऐसा कहा जाता है, कि भविष्य में क्यौकप्यू बंदरगाह चीन का नौसैनिक अड्डा बनेगा, इस बारे में चिंता करना बेमानी है.
लेकिन छोटा सा सवाल यह खड़ा होता है, कि क्या म्यांमार के संविधान को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, और क्या चीन के लिए यह जरूरी है, कि वह अपने सैनिक यूनिफॉर्म के साथ औपचारिक रूप से क्यौकप्यू बंदरगाह में तैनात करे?
क्यौकप्यू बंदरगाह चीनी नौसैनिक अड्डे में तब्दील होगा या नहीं, अंग्रेजी के अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, इस सप्ताह भारत के राष्ट्रपति की म्यांमार यात्रा के दौरान चीन और म्यांमार के बीच इस बंदरगाह को लेकर हुई deal के बारे में गंभीर चर्चा हो सकती है.
लेकिन हमारी अपेक्षा के अनुसार, म्यांमार फिर से भारत को यही आश्वासन देगा, कि वह इस बंदरगाह को चीनी नौसैनिक अड्डे में तब्दील कभी नहीं होने देगा. अब यह हम पर निर्भर करता है, कि हम इस आश्वासन को मानते हैं या नहीं.
अगर नौसैनिक अड्डे का निर्माण करना चीन का उद्देश्य नहीं है, तो आखिर चीन इस क्यौकप्यू बंदरगाह का निर्माण क्यों कर रहा है?
इसका उत्तर यह हो सकता है, कि पहले ही क्यौकप्यू से लेकर चीन के युनान प्रांत के बीच ऑयल और गैस की दो समानांतर पाइप लाइन बिछाई गई हैं.
चीन को सबसे अधिक डर अमेरिका के द्वारा मलक्का स्ट्रेट की नाकाबंदी से लगता है. अगर चीन का यह भय सत्य में तब्दील हो जाए, तो भी अमेरिका के साथ विवाद के दौरान इन दो पाइपलाइन की मदद से चीन को ऊर्जा की सप्लाई होती रहेगी.
इसलिए सवाल यह खड़ा होता है, मलक्का की खाड़ी की नाकाबंदी की समस्या से निपटने के लिए चीन ने पहले ही वर्ष 2015 में इन दो पाइप लाइंस का निर्माण करवा लिया है. तो फिर वह क्यौकप्यू मैं बंदरगाह का निर्माण क्यों करवा रहा है.
अब आप कहेंगे, कि हो सकता है, चीन इस पाइपलाइन की सुरक्षा की व्यवस्था करना चाहता हो . लेकिन अगर ऐसा है, तो क्या यह सिद्ध नहीं होता है, कीचीन को म्यांमार की सैन्य और पुलिस क्षमता पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं है.
क्यौकप्यू बंदरगाह इस प्रकार सिद्ध करता है, की मलक्का स्ट्रेट को लेकर चीन की जो चिंताएं हैं, वह केवल दुनिया को मूर्ख बनाने का एक बहाना मात्र है.
अब आप देखिए, कि भारत के द्वारा बनाया गया सित्तवे बंदरगाह, और जापान की आर्थिक मदद से बनाए गए थिलवा बंदरगाह और दावे बंदरगाह भी अपनी पूरी कैपेसिटी पर नहीं चल पा रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है, म्यांमार के पास पहले से ही अपने खुद के बंदरगाह भी हैं.
इसलिए सवाल यह खड़ा होता है, कि जब म्यांमार के तट पर पहले से ही इतनी सारे बंदर कहां मौजूद हैं, तो चीन ग्वादर और हंबनटोटा में 2 समुद्री स्विमिंग पुल का निर्माण करवाने के बाद, क्यौकप्यू बंदरगाह के रूप में तीसरे समुद्री स्विमिंग पूल का विकास क्यों करवाना चाहता है.
क्या यह चीन का पागलपन है या इसके पीछे कोई रणनीति है? इसका जवाब तो आपको केवल आने वाला समय ही दे पाएगा.
आप शायद जानते हो, चीन का क्रा कैनाल का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है, जो थाईलैंड की खाड़ी को अंडमान सागर से जोड़ेगी.
28 बिलियन डॉलर की भारी कीमत पर बनाई जाने वाली यह प्रस्तावित नहर थाईलैंड की वर्तमान सरकार की प्राथमिकता नहीं है. तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए, कि यह नहर भविष्य में भी थाईलैंड सरकार की प्राथमिकता नहीं बनेगी. जबकि इस नहर का चीन की रणनीति के हिसाब से महत्व बहुत अधिक है.
देखा जाए तो, यह नहर दक्षिण चीन सागर को छोटे रास्ते से सीधा हिंद महासागर से जोड़ने वाली है. इस प्रकार से चीन की शक्ति का प्रभाव क्षेत्र हिंद महासागर में और मजबूत हो सकेगा.
अगर हम भविष्य में सबसे खराब स्थिति के बारे में चर्चा करें, तो हो सकता है, चीन आज पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा पेश करता है, तो आने वाले कल में चीन के इस दावे की बढ़ती हुई सीमा के अंदर हिंद महासागर भी आने लगे.
क्या चीन के लालच की कोई सीमा आप तय कर सकते हैं?
हम तो यही आशा करते हैं, शांति प्रिया चीन हमेशा भारत का दोस्त बना रहे. लेकिन दक्षिण चीन सागर और डोकलाम में चीन ने जो कारगुजारी की है, उसमें और चीन के नेता जो शिखर सम्मेलनों में बोलते हैं, उसके बीच में जमीन आसमान का अंतर है.
जब कभी भी हिंद महासागर का इतिहास लिखा जाएगा, तो हो सकता है, इतिहास लेखकों को अफसोस हो, कि जब चीन भारत के खिलाफ मोतियों की माला को पिरो रहा था, उस समय भारतीय लोग और भारतीय मीडिया फिल्मों और रियलिटी शो में व्यस्त थी.
वर्तमान सरकार के दौरान ऐसा लगा था, कि भारतीय हाथी अपनी नींद से जागने लगा है. लेकिन अब तो ऐसा लगता है, कि वर्ष 2019 के आम चुनाव के बाद, भारत का यह हाथी फिर से गहरी नींद में सो जाएगा. लेकिन चाइनीस ड्रैगन दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में हमेशा डांस करता रहेगा.
आप के विश्लेषण के अनुसार, क्या शांतिप्रिय चीन वैश्विक समृद्धि के लिए हिंद महासागर में नए बंदरगाहों का निर्माण कर रहा है?
आप अपने विचार हमें नीचे कमेंट सेक्शन में लिख कर बता सकते हैं.
इस वीडियो को बनाते समय हमने कुछ ऑनलाइन लेख पढ़े थे. आपको उनकी लिंक डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगी.
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जैसा कि हमने कई बार चर्चा की है, पाकिस्तानी लोग अगले हजार वर्षों के लिए साजिश करते हैं, चीन के लोग अगले 100 वर्षों के लिए रणनीति तैयार करते हैं, लेकिन भारत के लोग सिर्फ आज के बारे में चिंता करते हैं.
इस अंतर को सिर्फ इसी तथ्य को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है, कि पिछले नवंबर महीने में चीन और म्यांमार के बीच समझौता हुआ, जिसके अनुसार चीन म्यांमार में गहरे समुद्री बंदरगाह का निर्माण करेगा, जो चीन का हिंद महासागर में तीसरा बंदरगाह होगा. लेकिन इसके बारे में ना तो भारत की मेंस्ट्रीम मीडिया और ना ही सोशल मीडिया में बिल्कुल भी चर्चा हुई.
पाकिस्तान के ग्वादर और श्रीलंका के हंबनटोटा के बाद, हिंद महासागर में म्यांमार के क्यौकप्यू मैं चीन का तीसरा बंदरगाह बनाया जाने वाला है.
शायद जब चीन क्यौकप्यू बंदरगाह को नौसैनिक अड्डे में तब्दील कर देगा, केवल तभी हमें जागने की जरूरत पड़ेगी.
यहां पर साफ करने वाली बात यह है, की म्यानमार के संविधान के अनुसार कोई भी विदेशी देश अपनी सेना को म्यांमार की जमीन पर तैनात नहीं कर सकता है. इसलिए ऐसा कहा जाता है, कि भविष्य में क्यौकप्यू बंदरगाह चीन का नौसैनिक अड्डा बनेगा, इस बारे में चिंता करना बेमानी है.
लेकिन छोटा सा सवाल यह खड़ा होता है, कि क्या म्यांमार के संविधान को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, और क्या चीन के लिए यह जरूरी है, कि वह अपने सैनिक यूनिफॉर्म के साथ औपचारिक रूप से क्यौकप्यू बंदरगाह में तैनात करे?
क्यौकप्यू बंदरगाह चीनी नौसैनिक अड्डे में तब्दील होगा या नहीं, अंग्रेजी के अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, इस सप्ताह भारत के राष्ट्रपति की म्यांमार यात्रा के दौरान चीन और म्यांमार के बीच इस बंदरगाह को लेकर हुई deal के बारे में गंभीर चर्चा हो सकती है.
लेकिन हमारी अपेक्षा के अनुसार, म्यांमार फिर से भारत को यही आश्वासन देगा, कि वह इस बंदरगाह को चीनी नौसैनिक अड्डे में तब्दील कभी नहीं होने देगा. अब यह हम पर निर्भर करता है, कि हम इस आश्वासन को मानते हैं या नहीं.
अगर नौसैनिक अड्डे का निर्माण करना चीन का उद्देश्य नहीं है, तो आखिर चीन इस क्यौकप्यू बंदरगाह का निर्माण क्यों कर रहा है?
इसका उत्तर यह हो सकता है, कि पहले ही क्यौकप्यू से लेकर चीन के युनान प्रांत के बीच ऑयल और गैस की दो समानांतर पाइप लाइन बिछाई गई हैं.
चीन को सबसे अधिक डर अमेरिका के द्वारा मलक्का स्ट्रेट की नाकाबंदी से लगता है. अगर चीन का यह भय सत्य में तब्दील हो जाए, तो भी अमेरिका के साथ विवाद के दौरान इन दो पाइपलाइन की मदद से चीन को ऊर्जा की सप्लाई होती रहेगी.
इसलिए सवाल यह खड़ा होता है, मलक्का की खाड़ी की नाकाबंदी की समस्या से निपटने के लिए चीन ने पहले ही वर्ष 2015 में इन दो पाइप लाइंस का निर्माण करवा लिया है. तो फिर वह क्यौकप्यू मैं बंदरगाह का निर्माण क्यों करवा रहा है.
अब आप कहेंगे, कि हो सकता है, चीन इस पाइपलाइन की सुरक्षा की व्यवस्था करना चाहता हो . लेकिन अगर ऐसा है, तो क्या यह सिद्ध नहीं होता है, कीचीन को म्यांमार की सैन्य और पुलिस क्षमता पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं है.
क्यौकप्यू बंदरगाह इस प्रकार सिद्ध करता है, की मलक्का स्ट्रेट को लेकर चीन की जो चिंताएं हैं, वह केवल दुनिया को मूर्ख बनाने का एक बहाना मात्र है.
अब आप देखिए, कि भारत के द्वारा बनाया गया सित्तवे बंदरगाह, और जापान की आर्थिक मदद से बनाए गए थिलवा बंदरगाह और दावे बंदरगाह भी अपनी पूरी कैपेसिटी पर नहीं चल पा रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है, म्यांमार के पास पहले से ही अपने खुद के बंदरगाह भी हैं.
इसलिए सवाल यह खड़ा होता है, कि जब म्यांमार के तट पर पहले से ही इतनी सारे बंदर कहां मौजूद हैं, तो चीन ग्वादर और हंबनटोटा में 2 समुद्री स्विमिंग पुल का निर्माण करवाने के बाद, क्यौकप्यू बंदरगाह के रूप में तीसरे समुद्री स्विमिंग पूल का विकास क्यों करवाना चाहता है.
क्या यह चीन का पागलपन है या इसके पीछे कोई रणनीति है? इसका जवाब तो आपको केवल आने वाला समय ही दे पाएगा.
आप शायद जानते हो, चीन का क्रा कैनाल का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है, जो थाईलैंड की खाड़ी को अंडमान सागर से जोड़ेगी.
28 बिलियन डॉलर की भारी कीमत पर बनाई जाने वाली यह प्रस्तावित नहर थाईलैंड की वर्तमान सरकार की प्राथमिकता नहीं है. तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए, कि यह नहर भविष्य में भी थाईलैंड सरकार की प्राथमिकता नहीं बनेगी. जबकि इस नहर का चीन की रणनीति के हिसाब से महत्व बहुत अधिक है.
देखा जाए तो, यह नहर दक्षिण चीन सागर को छोटे रास्ते से सीधा हिंद महासागर से जोड़ने वाली है. इस प्रकार से चीन की शक्ति का प्रभाव क्षेत्र हिंद महासागर में और मजबूत हो सकेगा.
अगर हम भविष्य में सबसे खराब स्थिति के बारे में चर्चा करें, तो हो सकता है, चीन आज पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा पेश करता है, तो आने वाले कल में चीन के इस दावे की बढ़ती हुई सीमा के अंदर हिंद महासागर भी आने लगे.
क्या चीन के लालच की कोई सीमा आप तय कर सकते हैं?
हम तो यही आशा करते हैं, शांति प्रिया चीन हमेशा भारत का दोस्त बना रहे. लेकिन दक्षिण चीन सागर और डोकलाम में चीन ने जो कारगुजारी की है, उसमें और चीन के नेता जो शिखर सम्मेलनों में बोलते हैं, उसके बीच में जमीन आसमान का अंतर है.
जब कभी भी हिंद महासागर का इतिहास लिखा जाएगा, तो हो सकता है, इतिहास लेखकों को अफसोस हो, कि जब चीन भारत के खिलाफ मोतियों की माला को पिरो रहा था, उस समय भारतीय लोग और भारतीय मीडिया फिल्मों और रियलिटी शो में व्यस्त थी.
वर्तमान सरकार के दौरान ऐसा लगा था, कि भारतीय हाथी अपनी नींद से जागने लगा है. लेकिन अब तो ऐसा लगता है, कि वर्ष 2019 के आम चुनाव के बाद, भारत का यह हाथी फिर से गहरी नींद में सो जाएगा. लेकिन चाइनीस ड्रैगन दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में हमेशा डांस करता रहेगा.
आप के विश्लेषण के अनुसार, क्या शांतिप्रिय चीन वैश्विक समृद्धि के लिए हिंद महासागर में नए बंदरगाहों का निर्माण कर रहा है?
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Transcript -
As we discussed multiple times in the past, while Pakistanis makes conspiracy for next 1000 years, Chinese makes strategy for next 100 years, we Indians think only about today.
This difference can be highlighted from the fact, that In November this year, China and Myanmar have entered into an agreement to let China build its third deep sea water port in Indian ocean, but there was effectively no discussion either in Main stream media or in Social media.
After Gwadar port in Pakistan, Hambantota port in Sri Lanka, Kyaukpyu Port in Myanmar will be third Chinese port in Indian Ocean.
Perhaps only after China transforms Kyaukpyu port into its Naval base, we will wake up.
Lets be clear, Constitution of Myanmar doesn't allow deployment of foreign troops on its soil now. Therefore its argued that we need not worry about military use of Kyaukpyu port.
But the simple questions are, Can constitution of Myanmar not be amended? Is it really necessary for China to formally deploy troops in uniform there?
Whether Kyaukpyu port transforms itself into Chinese Naval base or not in future, As per report published in The times of India, During Indian president's Myanmar visit, the port deal in between China and Myanmar will be subject of serious discussion.
However lets be frank, Myanmar can at best give us assurance, this port will not be allowed to be used as Chinese military facility. Now, its up to us, if we accept such assurances or not.
If building naval base at Kyaukpyu is not Chinese strategy, why China is building this port.
The answer may be that one oil pipeline and one parallel natural gas pipeline already connects Kyaukpyu town with Chinese Yunnan province.
If Chinese worst night mare of America blocking Malacca strait becomes reality, this gas pipeline would continue energy supply to China during the conflict.
Therefore the question is, if blockade of Malacca strait is only Chinese concern, it has already built these two pipelines in 2015. Then why it wants to build a port in Kyaukpyu.
Now, you would say, China might want to ensure the safety of this end terminal, but does that not confirm that China has no faith in Myanmar capability to protect the pipeline.
This Kyaukpyu port concludes that Chinese insecurity related to Malacca strait is just an excuse to make whole world fool.
you see, India built Sittwe port, Financed by Japan Thilaw port and Dawei ports are already struggling to be up and running. Needless to say, Myanmar has other ports as well.
Therefore the question is, when there is already idle port capacity on the coast of Myanmar, why China is throwing 1 Billion Dollars to build another swimming pool at Kyaukpyu port after having two large swimming pools in Gwadar and Hambantota.
Is it Chinese madness or Chinese strategy? The confirmed answer will be provided only by time.
You might know, another big project China is interested is proposed Kra Canal, which will connect Gulf of Thailand with Andaman sea.
While the proposal of this 28 Billion Dollar canal is not priority of current Thai government, we should not assume that it will never remain so, since this canal has special place in Chinese game plan.
This Canal directly connects South China sea to Indian ocean with shorter route, and will increase Chinese influence in Indian ocean significantly.
if we talk about worst case scenario, its possible, that Today china claims South China sea as its own, in future a day will come when Chinese claim would extend to Indian ocean as well.
Is there any limit of Chinese greed?
We wish that China remains Indian friend and peace loving nation. But Chinese actions in South China Sea and Doklam speaks louder than its words in Global summits.
When the history of Indian ocean will be written, historians will regret, that when China was making string of pearls around India, Indians and Indian media were busy in movies and reality shows.
Under current government India elephant has woken up to Chinese challenge, but In the year 2019 after general election, Its most likely that Indian elephant will again go for sleep, but Chinese dragon will continue dancing in South China Sea and Indian Ocean.
As per your analysis, Is Peaceful China building all these ports in Indian ocean for global prosperity?
Please let us know your views in comment section below.
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