मोदी जी अक्साई चिन को चीन के कब्जे से कैसे मुक्त करा सकते हैं??
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आपको याद होगा 1962 की लड़ाई में भारत के हार जाने के बाद अक्साई चिन पर चीन का कब्जा हो गया. भारत के लोगों को अक्साई चिन के चले जाने के बाद शोक नहीं मनाना चाहिए, इसके पीछे भारत के सबसे अकल्मन्द प्रधान मंत्री नेहरू ने एक बात बताई थी, कि इस इलाके में तो घास ही नहीं उगती है.
इसके जवाब में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महावीर त्यागी जी ने कहा था, कि नेहरू जी आप के सर पर भी कोई बाल नहीं उगता है, तो क्या आप अपना सर भी किसी दूसरे आदमी को दे देंगे?
हालांकि महावीर त्यागी जी की बात में दम था, लेकिन नेहरू जी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, और भारत ने अक्साई चिन पर एक बार फिर कब्जा करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की.
वास्तव में देखा जाए तो नेहरु जी की बात सही थी, अक्साई चिन में कोई भी नहीं रह सकता, क्योंकि यहां पर प्राकृतिक वातावरण बहुत ही विषम है.
लेकिन नेहरु जी को एक सवाल और पूछना चाहिए था, कि आखिर अक्साई चिन में ऐसा क्या था? कि चीन ने तवांग जिला जीतने के बावजूद, अरुणाचल प्रदेश को छोड़ दिया, और अक्साई चिन पर कब्ज़ा करके, उसने भारत के साथ युद्ध समाप्त कर दिया.
आइए अब हम अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश की तुलना करते हैं. अक्साई चिन पहाड़ों से भरा हुआ इलाका है, यहां पर कोई भी फसल नहीं हो सकती और, अभी तक प्राकृतिक संसाधनों का भी कोई पता नहीं है.
तो दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में प्राकृतिक वातावरण बहुत अच्छा है, जमीन उपजाऊ है, और प्राकृतिक संसाधन भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध है.
अगर आप समग्र दृष्टि से देखना चाहें, तो सामरिक दृष्टि कोण से अक्साई चिन का महत्व अरुणाचल प्रदेश की तुलना में बहुत ज्यादा है.
अक्साई चिन ऊंचाई का इलाका है, और दिल्ली के पास है, इसलिए अगर कभी भारत और चीन के बीच में विवाद हुआ ,तो चीन बड़ी तेजी से अपनी सेना भारत के अंदर हमला करने के लिए भेज सकता है.
जबकि अरुणाचल प्रदेश से मध्य भारत में आने के लिए चीन को बहुत अधिक समय लगेगा.
वास्तव में देखा जाए तो अक्साई चिन चीन का एक महत्वपूर्ण सामरिक स्थान हैं, जिससे वह पूरे भारत और मध्य एशिया पर नजर रख सकता है.
साधारण शब्दों में अक्साई चिन भारत और चीन के बीच में एक बफर जोन का काम करता है. इसके अलावा, अगर कभी भारत और पाकिस्तान के बीच में विवाद हुआ, तो चीन अक्साई चिन से पाकिस्तान को जरूरी मदद पहुंचा सकता है, और भारत पर दबाव बढ़ा सकता है.
साथ ही अक्साई चिन पर भारत की ओर से नियंत्रण करना कठिन है, जबकि चीन की तरफ से नियंत्रण करना आसान है.
उदाहरण के लिए, चीन ने Xinjiang और तिब्बत को जोड़ने वाली एक सड़क का निर्माण कार्य 1951 में चालू किया था, और यह सड़क अक्साई चिन के बीच में से होकर गुजरती है.
भारत पर इतनी बुरी तरह से शासन किया गया, 4 साल बाद 1955 में जब चीन ने अपने नए मानचित्र प्रकाशित किए, तब इस सड़क के बारे में भारत को बात पता चली.
दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश की हालत बिल्कुल विपरीत है, अरुणाचल प्रदेश उत्तर पूर्वी राज्यों और भारत से अच्छी तरीके से जुड़ा हुआ है.
अगर चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा भी कर लिया, तो उस कब्जे को बनाए रखने में चीन को दिक्कत का सामना करना पड़ सकता था, क्योंकि भारतीय सेना फिर से इकट्ठा होकर चीन पर कई बार हमला करती रहती.
चीन कुछ भी कहता रहे, इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए, कि अक्साई चिन भारत का अभिन्न हिस्सा है.
हमारे दर्शको का यह कई बार पूछना था, कि मोदी सरकार कैसे अक्साई चीन को चीन के कब्जे से मुक्त करा सकती है.
सीमा विवाद के ऊपर भारत और चीन के बीच में लंबे समय से बातचीत चली आ रही है. इस बातचीत के लिए भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल इस समय भारत के विशेष प्रतिनिधि हैं.
क्योंकि अभी राजनयिक ढंग से बातचीत चल रही है, इसलिए बात चीत और लेन देन करके ही इस विवाद का समाधान निकाला जा सकता है. आइए अब हम कुछ प्रमुख विकल्पों के बारे में जल्दी से बात करते हैं. इन विकल्पों के ऊपर भारत और चीन के बीच बिचार विमर्श भी हो चुका है.
पहला विकल्प यह है, कि भारत को अरुणाचल प्रदेश पर अपनी दावेदारी खत्म कर देनी चाहिए, और चीन को अक्साई चिन के ऊपर अपना कब्जा छोड़ देना चाहिए. हालांकि अक्साई चिन का सामरिक महत्व ज्यादा है, इसलिए इस बात की संभावना कम है कि यह विकल्प काम करेगा.
दूसरा विकल्प है, भारत और चीन की सीमा पर यथास्थिति बनाए रखी जाए, और Line of Actual Control अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए. ऐसा होने पर अरुणाचल प्रदेश पर भारत का कब्जा बना रहेगा, और अक्साई चिन पर चीन का कब्जा बना रहेगा.
तीसरा विकल्प है, कि भारत को सैन्य कार्रवाई करके अक्साई चिन पर कब्जा कर लेना चाहिए. ज्यादातर भारतीय लोगों को यह विकल्प पसंद आने वाला है, लेकिन उनको यह बात ध्यान रखनी चाहिए, कि इस विकल्प से सफलता मिलना निश्चित नहीं है, और इस विकल्प पर काम करने की कीमत भी बहुत ज्यादा है.
चौथा विकल्प है, भारत और चीन को बातचीत करने के लिए बातचीत करते रहना चाहिए. और यह अपेक्षा करना चाहिए, कि आगे आने वाला समय इस विवाद का समाधान अपने आप निकालेगा. यह पहले की कांग्रेस सरकारों का विकल्प है, और बीजेपी की वर्तमान सरकार भी इसी विकल्प पर काम कर रही है.
पांचवा विकल्प है, भारत को अक्साई चिन पर अपनी दावेदारी खत्म कर लेना चाहिए, और अरुणाचल प्रदेश चीन के हाथों में सुपुर्द कर देना चाहिए. आपसी विवाद को सुलझाने का यह सबसे आसान तरीका है. लेकिन ऐसा करने पर यह निश्चित नहीं है, कि चीन को इन दोनों क्षेत्रों से पूरी संतुष्टि मिल जाएगी. कहने की जरूरत नहीं है, यह विकल्प हम सभी को बिलकुल भी मंजूर नहीं है.
इन सभी विकल्पों को देखते हुए हमें अपेक्षा है, की मोदी सरकार अरुणाचल प्रदेश को लेकर मोल भाव न करते हुए, अक्साई चिन के ऊपर दावा मजबूत रखेगी और चीन से उसे वापस लेने की कोसिस करती रहेगी.
आज का बेहद आसान सवाल है, किस प्रधान मंत्री के कार्यकाल में चीन ने भारत के अक्साई चिन पर कब्ज़ा कर लिया था?
आप अपने जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में लिख कर बता सकते हैं.
हमारे कई दर्शकों ने पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल का सही जवाब दिया था, उन सभी viewers में से आज के लकी winner हैं, नरेंद्र .
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