पहली बार चाबहार पोर्ट से ताजा अफगानी अंगूर भारत पहुंचे !!
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Reference -
अभी कुछ ही दिनों पहले अख़बारों में खबरे छपी थी, की चाबहार पोर्ट को अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों से ढिलाई मिलने के बाबजूद इस पोर्ट का काम अभी भी लटका हुआ है.
इस निष्कर्ष का आधार यह है, की वर्ष 2017 के बाद से ही हर साल चाबहार पोर्ट के विकास के लिए 150 करोड़ allocate किये जाते थे. लेकिन भारत सरकार ने यह पैसा पिछले 2 सालों में विल्कुल भी खर्च नहीं किया है.
और इस साल भारत सरकार ने चाबहार पोर्ट के लिए मात्र 45 करोड़ ही allocate किया है. इसलिए यह कहा जा रहा है, की चाबहार पोर्ट का उपयोग तो केवल फोटो खिचाने के लिए ही किया जाता है.
हालाँकि यह बात सही है, की भारत सरकार ने वहां पर पैसा खर्च नहीं किया है, लेकिन जब ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के भविस्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. तो क्या चाबहार पोर्ट में और पैसा लगाना अक्लमंदी है?
और भले ही भारत सरकार पैसा लगाने के लिए चेक बुक लिए बैठी रहे, यदि कोई प्राइवेट कंपनी ही इस अनसर्टेन एनवायरनमेंट में काम नहीं करना चाहती हो. तो भारत सरकार क्या हम टैक्स पेयर्स के पैसे को खर्च करने के लिए उसे हवा में उड़ा दे?
आप लोग तो स्मार्ट हैं, आप ही बताएं, बिज़नेस के फलने और फूलने के लिए स्टेबिलिटी का होना जरूरी है, या नहीं.
लेकिन यह बात एक्सपर्ट लोगो को कम ही समझ आती है. ध्यान देने वाली बात है, की चाबहार पोर्ट लटक गया है, इस निष्कर्ष तक पहुंचने के पहले एक्सपर्ट लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं, की अभी तक भारत ने जो चाबहार पोर्ट में निवेश किया है, उसका भारत को क्या लाभ मिल रहा है?
अब सकारात्मक बात करते हुए, आप सभी ने कई बार सुना होगा, की अफ़ग़ानिस्तान से ड्राई फ्रूट्स भारत लाये गए.
लेकिन अभी तक अफ़ग़ानिस्तान से फ्रेश फ्रूट्स पाकिस्तान के रुकावट भरे रस्ते से होकर भारत पहुंचते थे.
इसलिए भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के साथ एयर कॉरिडोर का विकास किया था, ताकि अफ़ग़ानिस्तान से ड्राई और फ्रेश फ्रूट्स भारत जल्द पहुंच सकें.
लेकिन आपको तो पता है, हवाई रास्ते की तुलना में माल को समुद्री रास्ते से ले जाना हमेसा सस्ता पड़ता है.
समुद्री रास्ते से ड्राई फ्रूट्स को ले जाना आसान होता है. लेकिन फ्रेश फ्रूट्स के समुद्री रास्ते से गुजरने पर उनके सड़ने का डर रहता है.
अब चाबहार पोर्ट पर ऐसी सुविधाओं का विकास कर लिया गया है, ताकि फ्रेश फ्रूट्स बिना सड़े भारत भेजे जा सके.
और ईरान के अख़बार फाइनेंसियल ट्रिब्यून में छपी खबर के मुताबिक, ईरान से होकर पहली बार फ्रेश अफगानी अंगूर का शिपमेंट भारत पहुंच चुका है.
आपको याद होगा, एयर कॉरिडोर और सी कॉरिडोर से होकर अफगानी किसमिस कई बार भारत आ चुकी है, अब पहली बार अफगानी फ्रेश अंगूर भी भारत की जमीं पर पहुंच चुका है.
उम्मीद है, सी रूट के खुल जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान से फ्रेश फुइटस बड़ी मात्रा में और सस्ती कीमतों पर भारत लाये जा सकेंगे.
लेकिन जैसा की आपको अंदाज़ा होगा, दुर्भाग्यवश इस पॉजिटिव न्यूज़ को ना केवल हमारी मीडिया बल्कि हमारे एक्सपर्ट्स भी पूरी तरह से नजर अंदाज़ कर देंगे. वैसे भी अफ़ग़ानिस्तान के बारे में बुरी और नेगेटिव खबरे छापने से उन्हें फुर्सत कहाँ है.
अब आप कह सकते हैं, की अफ़ग़ान पीस टॉक की बाद समझौता होते ही, अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से भाग खड़ा होगा. और चाबहार पोर्ट का भविष्य अंधरकारमय हो जायेगा.
निश्चित रूप से इस परिस्थिति के बारे में सोच कर पाकिस्तान के मुँह में पानी आना लाजमी है.
लेकिन आप सभी जानते है, निर्माण की शक्ति में विनाश की शक्ति से ज्यादा तागत होती है. इसलिए जब तक चाबहार पोर्ट से अफ़ग़ानिस्तान को व्यापारिक लाभ मिल सकेगा, चाबहार पोर्ट पर बहार बनी रहेगी.
आइये देखते हैं, आने वाले 30 दिनों की भीतर अफ़ग़ान पीस टॉक किस निष्कर्ष तक पहुँचती है.
आज का बेहद आसान सवाल है, पहली बार कौन सा अफगानी फ्रेश फ्रूट समुद्री रास्ते से आया है?
पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, Biswaraj Mondal .
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.
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