आज मोदी जी ने रूस के साथ कौन से बेहद इम्पोर्टेन्ट समझौते किये??



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नमस्ते दोस्तों, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
जैसा की आप सभी जानते हैं, भारत के प्रधान मंत्री अभी रूस की यात्रा पर गए हुए हैं.

आपको पता है, की रूस का फार ईस्टर्न इलाका प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है, और वहां पर विकास की असीम संभावनाएं है. लेकिन चीन का प्रभाव वहां पर हमेसा से ज्यादा रहा है, जिसे रूस कण्ट्रोल में रखना चाहता है.

जैसा की रूस ने यह घोसणा करि थी, की  यदि चीन कोई प्रोजेक्ट लगाएगा, तो उसमे 80% रोजगार रूस के लोगो को दिया जाना चाहिए, और शेष रोजगार चीन अपने देश के लोगों को दे सकता है.

फार ईस्टर्न इलाके में जनसँख्या का प्रकार नहीं बदले यह रूस के लिए बड़ी समस्या है.

इसलिए प्रधान मंत्री मोदी जी ने रूस के अख़बार को दिए इंटरव्यू में साफ़ कर दिया, की भारत के लोग रुसी नागरिकता की तुलना में, उसके फार ईस्टर्न इलाके में काम करके पैसा कमाने में जायदा इंटरेस्टेड हैं. उदाहरण के लिए, भारत के लगभग 90 लाख लोगों ने पिछले 40 सालों में गल्फ कन्ट्रीज को चमकाया है, लेकिन उनमे से किसी एक ने भी भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी है.

ठीक उसी प्रकार से रूस को डरने की जरूरत नहीं है, यदि रूस के पास काम है, तो भारत के पास काम करने वाले हाथ हैं. उम्मीद है, फार ईस्टर्न इलाके में भारत के लोगों को बड़ी मात्रा में रोजगार मिलेगा.

वैसे तो इस यात्रा के दौरान आज भारत और रूस के बीच 15 एग्रीमेंट्स पर साइन हुए हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण समझौतों की चर्चा हम जल्दी से करेंगे.

रूस के अखबार को ही दिए हुए इंटरव्यू में मोदी साब ने कहा था, की यदि भारत और रूस मिलकर भारत में रक्षा उपकरणों का उत्पादन करें, तो हम सस्ती कीमतों पर हथियार आर्थिक रूप से कमजोर देशो को बेच सकते हैं.

इसी सुझाव को ध्यान में रखते हुए, अब दोनों देश मिलकर हथियार के डेवलपमेंट और प्रोडक्शन पर विशेष ध्यान देंगे, ताकि कम कीमत पर हथियार बनाये जा सकें.

हालांकि यह पहल अच्छी है, लेकिन यह देखना होगा, की रूस अपनी टेक्नोलॉजी को ट्रांसफर करना चाहता है या नहीं. लेकिन जैसा की AK 203 के प्रोजेक्ट में हुआ है, रूस को सस्ते हथियार भारत में बनाने को लेकर झिझकने की जरूरत नहीं है.

वैसे भी मोदी साब ने रूस से अपने नए और सबसे आधुनिक हथियारों को भारत में बनाने के लिए नहीं कहा है.

भारत और रूस के बीच दूसरा महत्वपूर्ण समझौता चेन्नई व्लादिवोस्टोक सी रूट के विकास के डेवलपमेंट को लेकर हुआ है.

आप तो समझदार हैं,  रूस के फार ईस्टन इलाके का भारत के साथ व्यापार तब तक नहीं बढ़ सकता है, जब तक यह इलाका भारत से अच्छी तरह से जुड़ा नहीं है.

अभी भारत के माल को रूस के फार ईस्टन इलाके के प्रमुख शहर व्लादिवोस्टोक तक पहुंचने में अराउंड 40 दिन लगते हैं. क्यों की हमारा माल समुद्री और जमीने रास्ते से घूम फिरके वहां तक पहुँचता है. कहने की जरूरत नहीं है, इस तरह के ट्रांसपोर्ट में फालतू में पैसा भी ज्यादा खर्च होता है.

लेकिन  चेन्नई से व्लादिवोस्टोक के बीच सीधे समुद्री रास्ते के खुल जाने के बाद, भारत का माल वहां पर कम कीमत में मात्र 24 दिनों में ही पहुंच जायेगा.

इसलिए यह समुद्री रास्ता भारत और रूस के फार ईस्टर्न इलाके के बीच आपसी व्यापार को बढ़ाने में मदद निश्चित रूप से करेगा.

आप तो स्मार्ट हैं, आप भाप गए होंगे. यह नया रास्ता साउथ चाइना सी से होकर गुजरेगा. लोमड़ी चीन मन ही मन मिसमिसाता रहेगा और भारत के जहाज उसके समुद्री किलो से होकर रूस पहुचेगे. अगर चीन में हिम्मत हो, तो अब रोक ले साउथ चाइना सी में भारत को .

भारत रूस के फार ईस्टर्न इलाके के विकास में रूचि रखता है, यह दर्शाने के लिए यही काफी है,  जब व्लादिवोस्टोक दुनिया के लिए बंद था, तब भारत दुनिया का वह पहला देश बना, जिसने वर्ष 1992 में वहां पर अपना वाणिज्य दूतावास कांसुलेट स्थापित किया था .

हालाँकि हम यह बात भी स्वीकार करते हैं, की जबकि भारत ने रूस के फार ईस्टर्न इलाके में सबसे पहले कदम आगे बढ़ाये थे. लेकिन बड़े ही स्वाभाविक कारणों से भारत और इस इलाके के बीच व्यापार फल फूल नहीं पाया.

कोई बात नहीं, देर आये दुरुस्त आये. भारत और फार ईस्टन रीजन के बीच मेरीटाइम सी रूट के बन जाने के बाद आगे की राह आसान होगी, हम सभी को यही उम्मीद रखनी चाहिए.

आज का बेहद आसान सवाल है. रूस के व्लादिवोस्टोक शहर में सबसे पहले कांसुलेट किस देश ने स्थापित करि थी?

पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, रघुकुमार पुलपर्ती  .

और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.

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