नया नवेला अमेरिका तालिबान एग्रीमेंट अधर में क्यों लटक गया??
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जैसा की आपको पता है, पिछले कई महीनो से पाकिस्तान की कृपा से अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत का नाटक चल रहा है.
अब जबकि दोनों पक्षों के बीच एग्रीमेंट लगभग फाइनल हो चुका है, टाइम मैगज़ीन में छपी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक इस एग्रीमेंट के ऊपर साइन करने से अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोमपेओ तक के हाथ कांपने लगे हैं.
इस एग्रीमेंट पर प्रेजिडेंट ट्रम्प के साइन होने के बाद ही अमेरिकी विदेश सचिव इस एग्रीमेंट पर साइन करेंगे. ऐसा लगता है, अमेरिका में अब उलटी गंगा बहने लगी है.
और यहाँ तक की अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने टाइम मैगज़ीन को आधिकारिक रूप से डिप्लोमेटिक अंदाज़ में बताया है, की अभी कोई भी एग्रीमेंट फाइनल नहीं हुआ है, और जब एग्रीमेंट प्रेजिडेंट ट्रम्प और अन्य सभी पार्टियों को स्वीकार होगा, तभी यदि जरूरत पड़ेगी, तो अमेरिकी विदेश सचिव उस एग्रीमेंट पर साइन करेंगे.
इसलिए सवाल उठता है, की 9 चरणों की बातचीत के बाद तैयार हुए एग्रीमेंट में ऐसा क्या है, की अमेरिकी विदेश मंत्री का पसीना छूट रहा है. जबकि इस एग्रीमेंट के मुताबिक मीडिया में तो बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैनिको के अफ़ग़ानिस्तान से निकलने का टाइम टेबल तक छपना चालू हो चुका है.
इसका जवाब आपको पहले से मालूम होगा, क्योंकि इस एग्रीमेंट के आधार में झूठ और मक्कारी बैठी हुई है.
अमेरिका को उम्मीद है, की तालिबान अपने वचन पर खरा उतरेगा, और यदि तालिबान ने अमेरिका को धोका दिया, तो तालिबान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.
जब अमेरिका की इस एप्रोच ने सीरिया में काम नहीं किया. तो इस बात की सम्भावना बहुत कम है, की यह असफल रणनीति अफ़ग़ानिस्तान में सफल हो जाएगी.
और तो और इस एग्रीमेंट में इन बातों का कोई जिक्र नहीं है, की अमेरिका के थोड़े से सैनिक हमेसा अफ़ग़ानिस्तान में तैनात रहेंगे, और अफ़ग़ान सरकार का अमेरिका के चले जाने के बाद क्या होगा, और तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध विराम करेगा.
इस प्रकार यदि अमेरिका उम्मीद की पट्टी अपनी आँखों पर बांधकर खाई में गिरना चाहता है. तो अमेरिका को हमारी बधाई.
अब जबकि अमेरिकी विदेश सचिव को इस एग्रीमेंट को लेकर डर लग रहा है, तो सवाल उठता है, की जब अमेरिका और तालिबान के बीच 9 चरणों की बातचीत हुई, तो क्या वह सो रहे थे?
जबकि इस दौरान लगातार अफ़ग़ानिस्तान का आसमान तालिबानी धमाकों से गूंजता रहा.
लेकिन इस समय माइक पोम पियो से सवाल करने का कोई मतलब नहीं है, उन्होंने इस एग्रीमेंट पर पहले साइन ना करके अपना काम कर दिया है, अब गेंद राष्ट्रपति ट्रम्प के पाले में है.
यदि राष्ट्रपति ट्रम्प इस एग्रीमेंट को स्वीकार कर लेते हैं. तो सिद्ध हो जायेगा, की अमेरिका की तेजाइ की कीमत पहले अफ़ग़ान और बाद में अमेरिकी नागरिको को ही चुकानी पड़ेगी.
जबकि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से निकलने का रास्ता खोज रहा है, तभी तालिबान ने जीत का जुलुश निकालने की तैयारी तक चालू कर दी है. और उसके नेता अब दूसरे देशों को घमंड के साथ यह भी सीखा रहे हैं, की अमेरिका को धुल कैसे चटाई जाती है.
तालिबानी तालीम बड़ी ही सिंपल है, अगर आप अमेरिका के सामने समर्पण नहीं करते हैं. तो देर सवेर अमेरिका ही युद्ध से बोर होकर अपनी हार मान लेता है.
जहाँ तक हमें लगता है, राष्ट्रपति ट्रम्प ऐसी कोई भी डील स्वीकार नहीं करेंगे, जिससे उनके चुनाव पर तलबार लटक जाये. अगर इस साल अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा. तो अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के वोट डलने के पहले ही अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध की ख़बरें आने लगेंगी.
और ट्रम्प साहब को सैनिक बुलाने के बजाय फिर से भेजने पड़ जायेंगे. इसलिए या तो समय टालने के लिए इस एग्रीमेंट पर थोड़ा और मोल भाव होगा, अथवा बातचीत टूट जाएगी.
और यदि राष्ट्रपति ट्रम्प ने कुल्हाड़ी पर अपना सर मारने की कसम ही खा रखी है, तो हो सकता है, वह इस फ़र्ज़ी एग्रीमेंट पर साइन भी कर दें.
आइये देखते हैं, इस एग्रीमेंट का क्या हश्र होता है.
इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.
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