US के LNG प्रोजेक्ट में $2.5 बिलियन निवेश से भारत को कैसे फायदा होगा?


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Reference -





नमस्ते दोस्तों, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.



जैसा की आपको पता है, आज दुनिया की एनर्जी कैपिटल के रूप में जाने जाने वाले शहर हूस्टन में प्रधान मंत्री मोदी जी ने एनर्जी सेक्टर के CEOs से मुलाक़ात करि. 







हमारी मीडिया का ज्यादातर ध्यान मोदी और ट्रम्प के जॉइंट रैली पर है.  साथ ही एक्सपर्ट्स लोग यह बात का गहराई से अध्यन कर रहे हैं, की इस जॉइंट रैली से राष्ट्रपति ट्रम्प को उनके चुनाव में कैसे मदद मिलेगी,







लेकिन इस वीडियो में हम केवल इस बारे में चर्चा करेंगे, की कैसे ऊर्जा छेत्र में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ने से भारत को लाभ होने की सम्भावना है.







सबसे पहले तो आपको पता ही होगा, की हाल के समय में अमेरिका दुनिया में आयल एंड गैस का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है.







अमेरिका के द्वारा ईरान और वेनेजुएला के ऊपर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, भारत ने अमेरिका से तेल और गैस को बड़ी मात्रा में ख़रीदा है. 







वर्ष 2018 की तुलना में इस साल भारत ने अमेरिका से तीन गुना तेल और दो गुना गैस की मात्रा खरीदी है. इसलिए भारत और अमेरिका के बीच एनर्जी व्यापार बहुत तेजी से बढ़ा है, यह बिलकुल साफ़ है.







जैसा की भारत के सामने वर्ष 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनने का लक्ष्य है. हम इस टारगेट को मीट करें या न करें, यह एक अलग एनालिसिस का विषय है. लेकिन यदि हम इतने बड़े लक्ष्य को अपने सामने रखे हुए है, तो निश्चित रूप से हमारी ऊर्जा की जरूरत और अधिक बढ़ेगी.







हमारी बढ़ती हुई ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए, हमें दुनिया के सबसे बड़े आयल एंड गैस उत्पादक के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने ही होंगे 







हमेशा से भारत अपनी ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए आयल और कोयले पर निर्भर रहा है. लेकिन ये दोनों ही प्रदुषण को भी बढ़ाते हैं.







जैसा की आप जानते होंगे, LNG ऊर्जा का क्लीन सोर्स है, इसलिए भारत को गैस इकॉनमी बनने की तरफ जाना ही पड़ेगा.







जबकि LNG को use करने के लाभ स्वाभाविक है, फिर भी  अपेक्षा के अनुसार भारत में LNG की मांग नहीं बढ़ पायी है.







यही कारण है, वर्ष 2011 में भारत की GAIL कंपनी ने अमेरिका की कंपनियों के साथ अगले 20 सालों के लिए 5.8  मिलियन Tons LNG खरीदने का करार किया था. लेकिन भारत ने जो भी LNG शिपमेंट अमेरिका से ख़रीदे,  उन्हें डिमांड के आभाव में अन्य बाज़ारों में बेच दिया गया.







अमेरिका और भारत के बीच दुरी के बहुत अधिक होने के कारण भी अमेरिका से LNG मंगाना महंगा पड़ता  था. 







सायद यही कारण था, भारत अपनी LNG की 98 फ़ीसदी जरूरत को खाड़ी देशों से पूरा किया करता था.







लेकिन अमेरिका चीन ट्रेड वॉर के दौरान चीन ने खाड़ी के देशों से बड़ी मात्रा में LNG खरीदना चालू कर दिया, जिससे LNG की कीमतों में इजाफा हुआ.







परिणाम यह हुआ, की लम्बी दुरी के बाबजूद अमेरिका से भारत को किफायती दरों पर LNG मिलने लगी.







तभी तो पिछले साल भारत ने पहली बार अमेरिका से LNG का shipment मार्च में मगाया था.







अब जबकि यह बात हमारी समझ आ रही है, की भविस्य में भारत को बड़ी मात्रा में LNG खरीदना होगी, और अमेरिका LNG बड़ी मात्रा में सप्लाई कर सकता है.







तो सवाल उठता है, क्या भारत अमेरिकी तेल और गैस का हमेसा खरीदार बना रहेगा, अथवा भारत अमेरिका का एनर्जी पार्टनर भी बन सकता है?







इसी सवाल का जवाब देते हुए, मोदी जी की यात्रा के दौरान भारत की कंपनी पेट्रोनेट LNG और अमेरिका की कंपनी टेल्यूरियम ने 2.5 बिलियन डॉलर के मेमोरेंडम of अंडरस्टैंडिंग पर साइन किये.







2.5 बिलियन डॉलर खर्च करके भारत की कंपनी ने टेल्यूरियम के 28 बिलियन डॉलर के नए ड्रिफ्टवुड प्रोजेक्ट में 18% हिस्सेदारी प्राप्त कर ली. जिसके बदले में भारत को इस LNG टर्मिनल प्रोजेक्ट से हर साल 5 मिलियन टन गैस मिलेगी.







और  यह गैस हम प्रोजेक्ट की पूरी लाइफ के दौरान खरीद सकते हैं. 







अब आप समझ गए होंगे, 18% हिस्सेदारी ले लेने से बहुत लम्बे समय के लिए LNG सप्लाई की गारंटी हमें मिल गयी है.







लेकिन हमें याद रखना होगा, इस बारे में पहला एग्रीमेंट इस साल फरबरी में साइन हुआ था, मोदी जी की उपस्थिति में उसी पुराने एग्रीमेंट के अपडेटेड वर्शन पर साइन फिर से किये गए है. 







और अभी भी एग्रीमेंट फाइनल नहीं हुआ है, मार्च 2020 तक हिस्सेदारी के बदले गैस की सप्लाई की डील फाइनल होने की सम्भावना है. सही मायनो में, आज के एग्रीमेंट की केवल सांकेतिक value है, अभी बहुत मोल भाव होना बाकि है.







लेकिन हमें इस टाइम लाइन के बारे में जरुरत से ज्यादा चिंता करना नहीं है, क्योकि ड्रिफ्टवुड प्रोजेक्ट में कंस्ट्रक्शन इस साल चालू होगा, तो वर्ष 2023 से ही ऑपरेशन्स चालू हो पाएंगे, तभी इस प्रोजेक्ट से LNG का उत्पादन और एक्सपोर्ट शुरू होगा . 







इसलिए वर्तमान के लिए ना ही सही, भविस्य के लिए इस प्रोजेक्ट का खासा महत्वा है.







साथ ही अमेरिकी एनर्जी कंपनियों के CEOs ने मोदी जी को कई सुझाव दिए, जैसे की अमेरिकी कंपनियों के पास टेक्नोलॉजी है, जिससे कोयले से सिंथेटिक गैस बनायीं जा सकती है, जिसका प्रयोग आयात किये जाने वाले आयल के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है.







आप तो जानते हैं, भारत के पास कोयले के विशाल भंडार है, यदि यही कोयला हमारे कच्चे तेल के आयत को कम कर दे, तो भारत की विदेशी मुद्रा बचाने में बड़ी मदद मिलेगी. आशा है, अमेरिकी कंपनियों का ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल होने के लिए भारत स्वागत करेगा.







साथ ही एक और सुझाव के तौर पर यह कहा गया, की भारत ने ऊर्जा के छेत्र में काम करने वाले केंद्र सर्कार के सभी मंत्रालयों को मिलाकर के यूनिफाइड मिनिस्ट्री बना देना चाहिए, ताकि सभी मिलकर एक दिशा में आगे बड़े और एक दूसरे का हाथ बताएं.







एक और सुझाव दिया गया,की अब जबकि अमेरिकी ऊर्जा कंपनियां भारत में व्यापार करेंगी, तो आप तो स्मार्ट लोग हैं, विवाद भी होगा, असहमति भी होगी, इसलिए इन सभी के निपटारे के लिए भारत में एक ऐसी व्यवस्था का विकास होना चाहिए, ताकि विवादों को आपसी बातचीत और मोल भाव के जरिये निपटाया जा सके. 







आशा है, मोदी सर्कार अमेरिकी एनर्जी कंपनियों के CEOs के द्वारा दिए गए सुझावों पर सकारात्मक तरीके से विचार करके जरूरी कदम उठाएगी.



आज का बेहद आसान सवाल है, ड्रिफ्टवुड प्रोजेक्ट में ऑपरेशन किस साल में चालू हो पायेगा?





 पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, जाता कतह









और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद

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