कमजोर तालिबान ने ताकतवर मोदी जी के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया ??
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Reference -
आपने सायद अख़बारों में इस हेड लाइन को पड़ा हो, की तालिबान का कहना है, की वह भारत के खिलाफ नहीं है, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान के पुनर निर्माड़ में उसे भारत की मदद चाहिए.
लेकिन आप यदि गौर से तालिबान के प्रवक्ता के इंटरव्यू को पड़ें, तो आप पाएंगे, उन्होंने सीधे तौर पर यह नहीं कहा है, की तालिबान को भारत की हेल्प चाहिए.
वल्कि उनसे सवाल यह पूछा गया था, की भारत में लोगों को ऐसा डर लगता है, की यदि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से पीछे हट गया, तो अफ़ग़ानिस्तान पर कण्ट्रोल कर लेने के बाद तालिबान अपने लड़ाके भारत की तरफ भेजने लगेगा.
इसके जवाब में तालिबान के प्रवक्ता का कहना था, की हम लोगों का यह डर आधारहीन है. और तालिबान अपने लड़ाकों को भारत के खिलाफ क्यों इस्तेमाल करेगा, जबकि आजादी के बाद उन्हें अपने देश का पुनर निर्माड़ करना है.
इसलिए तालिबान दूसरे देशों के आतंरिक मामलो में हस्तक्छेप नहीं करेगा, बल्कि वह उनके साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने पर ध्यान देगा.
आपको तालिबान के तरफ से सुनाई पड़ रही बातें सुनने में बड़ी सुहावनी लग रही होंगी, लेकिन अब हम इस स्टेटमेंट के बैक ग्राउंड को जल्दी से देखते हैं.
आपको अच्छे से याद होगा, पिछले साल जब अमेरिका और तालिबान के बीच अफ़ग़ान पीस टॉक चालू हुई थी, तो सबसे पहले भारत के बड़े बड़े एक्सपर्ट्स ने तालिबान के साथ भारत की बातचीत का आह्वाहन किया था.
लेकिन जब उनकी दाल नहीं गल पायी, तो अब तालिबान के प्रवक्ता भी, भारत को भ्रमित करने के लिए मीठी मीठी बातें करने लगे हैं. इस प्रकार आपको समझ आ गया होगा, की हमारे एक्सपर्ट्स की एक्सपरटाइज आती कहाँ से है.
अभी पिछले महीने की ही तो बात है, जब राष्ट्रपति ट्रम्प ने तालिबान के साथ पीस टॉक को ट्वीटर पर ख़तम कर दिया था.
फिर इस महीने की शुरुआत में खबरें आई, की तालिबान ने भारत के 3 engineers को छोड़ दिया है, और इसके बदले में तालिबान के 11 बंदियों को छोड़ दिया गया.
तब ऐसा लगा था, यह बंदियों की कोई सीमित अदला बदली थी.
लेकिन अब जबकि अमेरिका और तालिबान के बीच पीस टॉक को दोबारा चालू करने को लेकर बातचीत चालू हो चुकी है, तो आपसी बिस्वास को बढ़ाने के लिए अमेरिका और तालिबान के बीच भी बंदियों की अदला बदली पर मोल भाव चलने लगा है.
इसलिए भारत के 3 engineers का रिहा होना, अगल करके नहीं देखा जा सकता है, यह सभी कदम इसलिए उठाये जा रहे हैं, ताकि जल्द से जल्द तालिबान और अमेरिका के बीच बात चीत चालू हो सके.
लेकिन इन पॉजिटिव डेवलपमेंट को देखते हुए, हमें यह नहीं भूलना चाहिए, की आखिर तालिबान के लीडर और अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि के बीच मुलाक़ात कहाँ पर आयोजित की गयी.
इसका जवाब क़तर नहीं है, वल्कि पाकिस्तान है.
इसलिए ये पॉजिटिव स्टेप्स और कुछ नहीं, अमेरिका को फ़साने के लिए पाकिस्तान के झूठ का तिलिस्म है.
आपको याद होगा, पाकिस्तान ने ऐसी ही बातें दे दे कर अपने 22 बे IMF बेलआउट का जुगाड़ तो कर लिया, लेकिन अमेरिका आज भी अपने अफ़ग़ानिस्तान बेलआउट के लिए झट पटा रहा है.
अब आप कह सकते हैं, की शांति के लिए बातचीत करना बहुत जरूरी है, यह बात बिलकुल सही है.
लेकिन यहाँ पर पाकिस्तान को अच्छे से पता है, की अमेरिका को एक न एक दिन अफ़ग़ानिस्तान से उलटे पाँव भागना ही है, इसलिए किसी भी मोल भाव में अमेरिका की शर्तों को मानना मूर्खता ही होगी.
और बात चीत करके आप ही देख लीजिये, पाकिस्तान ने राष्ट्रपति ट्रम्प का पूरा कार्य काल तो बर्बाद कर ही दिया है. अब यदि राष्ट्रपति ट्रम्प दोबारा जीत गए, तो अफ़ग़ानिस्तान से भागने के लिए वह और अधिक उतावले होंगे, और यदि कोई डेमोक्रेट पार्टी से प्रेजिडेंट बन गया, तो वह तालिबान से बिना फ़र्ज़ी पीस डील किये ही अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटने का निर्णय भी ले सकता है.
इसलिए अमेरिका के खिलाफ पाकिस्तान ने शातिर बिशात बिछा रखी है.
लेकिन इस बार अफ़ग़ानिस्तान पीस टॉक के तमाशे की बहुत बड़ी कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ी, भला हो इस पीस टॉक का जिसने भारत को कश्मीर से धारा 370 हटाने का कीमती एक महीना दिया, और उस समय मौके का लाभ उठाते हुए, भारत ने 5 अगस्त को ऑपरेशन पूरा कर लिया.
आपको अच्छे से याद होगा, उस समय हर रोज पाकिस्तान से आवाजे आती थी, की अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के भागने के बाद, पाकिस्तान अपनी पूरी ऊर्जा कश्मीर से भारत को भगाने पर केंद्रित करेगा.
जबकि यह खतरा आधारहीन नहीं था, भारत ने जिस प्रकार तब आगे बढ़कर कदम उठाये, उससे पहली बार पाकिस्तान को उसके कर्मो की सजा भोगने का मौका मिला. इसलिए पाकिस्तान को थैंक यू की उसने अफ़ग़ान पीस टॉक का नाटक रचा, नहीं तो आज भी कश्मीर में धारा 370 लगी होती.
इसलिए ऐसा भी हो सकता है, की एग्रेसिव भारत को देखकर तालिबान के इरादे ठन्डे पड़ गए हों, और अब वह मोदी जी से दो हाथ करने के बजाय हाथ मिलाने की सोचने लगा हो.
लेकिन जैसा की आपको अंदाज़ा होगा, इसकी सम्भावना बहुत ही कम है. इसलिए तालिबान की तिलिस्मी बातों में ना आकर भारत ने अफ़ग़ानिस्तान की लोक तांत्रिक सर्कार के पीछे मजबूती से खड़े रहना चाहिए.
वैसे भी इस महीने के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव परिणाम सामने आ जायेंगे, देखते है, कौन अफ़ग़ानिस्तान का नया राष्ट्रपति बनता है.
आजका बेहद आसान सवाल है, तालिबान और अमेरिका के बीच बातचीत चालू करवाने की कोसिस कौन सा देश कर रहा है?
पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, मनोज ख़राद .
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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