साउथ चाइना सी को लेकर भारत ने अपनी रणनीति में किया आक्रामक बदलाव
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जैसा की आप सभी का विस्वास रहा है, की यदि भारत ने चीन का सामना साउथ चाइना सी में नहीं किया, तो हमें चीन से हिन्द महासागर में लड़ना होगा.
अब ऐसा लगता है, अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी जी ने भारत की चीन के प्रति तुस्टीकरण की नीति त्यागकर आक्रामक होने का निर्णय ले लिया है.
हालाकिं इस बारे में बड़े लेवल पर कोई बड़ा अनाउंसमेंट नहीं किया जा रहा है, लेकिन अगर आप भारत और चीन के सम्बन्धो को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे अंदर ही अंदर धीरे धीरे परिवर्तन होने लगा है.
उदहारण के लिए, भारत के रक्षा मंत्री जब बैंकाक में आसियान के डिफेंस मिनिस्टर्स को सम्बोधित कर रहे थे, तो उन्होंने भारत के आक्रामक इरादे साफ़ कर दिए हैं.
डिप्लोमेटिक अंदाज़ में उन्होने कहा, की उन्हें उम्मीद है, की साउथ चाइना सी में स्थिति स्टेबल बनी रहेगी. और उस पुरे छेत्र में सैन्य शक्ति का प्रयोग नहीं किया जायेगा.
आपको सायद पता हो, आसियान के देश पिछले दो दशकों से चीन के साथ मिलकर साउथ चाइना सी के लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट बनाने के लिए बातचीत कर रहे हैं.
आप सभी ने देखा है, जबकि यह बातचीत बंद कमरों में चलती रही, साउथ चाइना सी को हड़पने में चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी है.
अब ऐसी उम्मीद जताई, जा रही है, की साउथ चाइना सी कोड ऑफ़ कंडक्ट वर्ष 2021 तक लागु हो जायेगा.
इसलिए भारतीय रक्षा मंत्री ने आसियान देशो से साफ़ साफ़ कह दिया, की वह चीन के साथ साउथ चाइना सी कोड ऑफ़ कोडक्ट फाइनल कर सकते हैं. लेकिन इस कोड ऑफ़ कंडक्ट में भारत जैसे उन देशो के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए, जिन्होंने कोड ऑफ़ कंडक्ट के मोल भाव में हिस्सा नहीं लिया है.
साउथ चाइना सी केवल उन्ही देशो का नहीं है, जो उससे बॉर्डर साझा करते हैं. इंटरनेशनल वाटर इंटरनेशनल लॉ के मुताबिक सभी के यातायात के लिए खुले रहे, इसको निश्चित करना सभी की साझा जिम्मेदारी है.
आपको अंदाज़ा होगा, चीन आसियान देशों का हाथ मरोड़कर कैसे कोड ऑफ़ कंडक्ट को फाइनल करवाएगा, इसलिए इससे पहले की आसियान के देश चाइनीस कोड ऑफ़ कंडक्ट को स्वीकार कर लें, भारत ने उसे लाल झंडी अभी से दिखा दी है.
इसलिए आसियान के देश चीन के साथ कोई भी खिचड़ी पका सकते हैं, लेकिन उन्हें यह अंधी उम्मीद नहीं करनी चाहिए, की पूरी दुनिया चुपचाप अन्याय को सहन कर लेगी.
बात साफ़ है, ये नया भारत साउथ चाइना सी में अपने हितों के खिलाफ किसी भी गैर कानूनी कोड ऑफ़ conduct को नहीं मानाने वाला.
जहाँ तक चाइनीस नेवी के इरादों का सवाल है, पूरी दुनिया ने खासतौर पर लोकतान्त्रिक देशों ने उसे बड़े हलके से लिया है.
लेकिन अब सबकी आँखें खुलने लगी है, example के तौर पर फ्रेंच नेवी के चीफ का कहना है, की पायरेसी से लड़ने के लिए समुद्री पानी में जंगी जहाज़ हर कोई भेजता है.
लेकिन वर्ष 2008 के बाद पायरेसी से लड़ने के लिए हिन्द महासागर में चीन ने अपनी नौसेना को तैनात करना चालू कर दिया.
अब जबकि पायरेसी पर कण्ट्रोल पाया जा चूका है, फिर भी चीन की नौसेना गल्फ ऑफ़ Aden में तैनात बनी हुई है.
इस इलाके का सामरिक महत्वा आप सभी को पता है. लेकिन चीन ने दुनिया को इतना बेवक़ूफ़ समझ रखा था, की उसने पाइरेट्स से लड़ने के लिए हिन्द महासागर में अपनी पनडुब्बियां तक भेजना चालू कर दी थी.
जब चीन को साउथ चाइना सी में नहीं रोका गया, तो वह इंडियन ocean में हरकतें क्यों नहीं दिखायेगा.
इसी बीच चैनेसे डिफेंस मिनिस्टर ने अमेरिका के डिफेंस मिनिस्टर से बैंकॉक में मुलाक़ात में धमकी थी, की अमेरिका ने साउथ चाइना सी में अपनी ताकत दिखाना बंद करना होगा.
जिसके जवाब में अमेरिका के रक्षा मंत्री ने कहा, की वह इंडो पसिफ़िक एरिया को फ्री एंड ओपन रखना चाहते हैं.
लेकिन जब अमेरिका के रक्षा मंत्री बातें दे रहे थे, तभी चीन ने अपना पहला मेड इन चाइना युद्ध पोत ट्रेनिंग और रिसर्च के लिए साउथ चाइना सी में डेप्लॉय कर दिया.
अब आप ही देख लीजिये, चीन कैसे दुनिया की आँखों में धुल झोंकता है, उसे अपने नए नवेले युद्ध पोत को ट्रेनिंग साउथ चाइना सी में ही देनी थी, साथ ही इसके लिए साउथ चाइना सी में पहुंचने का रास्ता उसने ताइवान स्ट्रेट से होकर चुना.
अगर दुनिया ने बेवक़ूफ़ बनने की दवा खा रखी है, तो बात ही अलग है. वैसे चीन की हरकतों से उसके इरादे साफ़ हो जाते हैं.
लेकिन इसी बीच अच्छी बात यह है, की साउथ चाइना सी को लेकर अब भारत ने अपनी बात साफ़ साफ़ शब्दों में शक्ति के साथ रखना चालू कर दिया है.
आज का बेहद आसान सवाल है, हिन्द महासागर में पायरेसी के खतरे से निपटने के लिए पनडुब्बियां कौन सा देश तैनात करता है?
पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, हर्षित गुप्ता
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.
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