चीन के खिलाफ,संप्रभु भारत ने दलाई लामा पर पॉलिसी में किया बड़ा बदलाव?


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जय हिन्द दोस्तों , चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
आप सभी दर्शको का साफ़ तौर पर विस्वास था, की 84 वर्षीय दलाई लामा के नए अवतार का सवाल पुरे विस्व के सामने खड़ा है.

जबकि दलाई लामा ने साफ़ कर दिया है, की 90 वर्ष की आयु में वह ही तय करेंगे, की उन्हें अगली बार अवतार लेना है, या नहीं. और लेना है, तो कहाँ पर लेना है.

लेकिन  तिब्बत ऑटोनोमस रीजन में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नीचे काम करने वाली सर्कार ने कह दिया है, की सिर्फ उसी के पास दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार है. 

जबकि दलाई लामा के पुनर जनम को लेकर असमंजस बना हुआ है, भारत सर्कार ने इस मुद्दे पर मौन साधा हुआ है.

इसी बीच चीन ने आधिकारिक रूप से भारत को याद दिलाया, की यदि दलाई लामा और भारत के अधिकारिओं के बीच सार्वजनिक रूप से कोई भी बातचीत हुई, तो इससे भारत और चीन के सम्बन्धो पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा.

चीन तो ऐसे बोल रहा है, जैसे दोनों देशों के बीच अच्छे संबधों का ठेका अकेले भारत ने ले रखा है.

इसलिए सवाल उठता है, की चीन को ऐसी कौन से मिर्ची लगी जो वह चिल्लाने लगा, इसका कारण यह है, की अक्टूबर महीने के अंत में सीनियर US डिप्लोमैट ने दलाई लामा से धर्म शाला में मुलाक़ात करि थी.

आपको याद होगा, अभी हाल ही में अमेरिकी संसद में नया बिल पेश कर दिया गया है, इस बिल में यह साफ़ तौर पर कहा गया है, की दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना एक धार्मिक मामला है, और इसका निर्णय करने का अधिकार केवल तिब्बत के लोगों को है.

इसलिए दलाई लामा के पुनर जन्म को कण्ट्रोल करने के लिए चीन के कान खड़े हो गए हैं..

लेकिन बड़ा सवाल यह था, की इस मुद्दे पर भारत का स्टैंड क्या होना चाहिए?

आपको सायद याद होगा, की डोकलाम विवाद के बाद अप्रिल 2018 में फर्स्ट इंडिया चाइना इनफॉर्मल समिट के लिए सुहावना माहौल बनाने के लिए फरबरी 2018 में भारत ने एडवाइजरी जारी करि थी, की भारत सर्कार के सीनियर अधिकारी ऐसे किसी भी कार्यक्रम से दूर रहेंगे, जिसमे दलाई लामा भाग ले सकते हों.

साफ़ तौर पर चीन के राष्ट्रपति को गले लगाने के लिए भारत को दलाई लामा की परछाई से भी दर लगने लगा था.

तब से लेकर आज तक इंडिया और चाइना के बीच इनफॉर्मल समिट के तमाशे का दो बार आयोजन किया जा चुका  है,  लेकिन एक बार भी चीन ने भारत के हितों और चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, लचीला रुख नहीं अपनाया है.

आप ही बताएं, इन इनफॉर्मल समिट से भारत को क्या रत्ती भर भी लाभ हुआ है?

बात साफ़ है, चीन भारत को दोस्त  नहीं, बल्कि पिछलग्गू बनाना चाहता है. 

उल्टा जब भारत 2018 की एडवाइजरी पर काम कर रहा था, तो चीन का भारत पर फालतू में चिल्लाना क्या स्वीकार किया जा सकता है?

इसलिए अब भारत ने उस एडवाइजरी को कचरे की डब्बे में डालने का निर्णय ले लिया है.

भारत सर्कार ने नई दिल्ली में 24 बे वार्षिक Radhakrishnan Memorial लेक्चर में भाग लेने के लिए दलाई लामा को निमंत्रण दिए जाने को अप्रूवल दे दिया है.

आपको याद होगा, Dr सर्वेपल्ली राधाकृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे, और उन्ही की याद में इस लेक्चर प्रोग्राम का आयोजन मिनिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमन रिसोर्स के नीचे काम करने वाले ऑटोनोमस The Indian Institute of Advanced स्टडीज के द्वारा किया जा रहा है.

इसलिए जब इस गुरुवार को दिल्ली में दलाई लामा लेक्चर देंगे, तो बेजिंग में चीन को मिर्ची तो लगेगी ही, पक्के से.

अच्छी बात यह है, की भारत सर्कार ने चीन का तुस्टीकरण करने की नीति को पूरी तरह से त्याग दिया है.

पहले RCEP को नकार देना, और अब दिल्ली में दलाई लामा का लेक्चर यह साबित करने के लिए काफी है.

उम्मीद है. दलाई लामा के पुनर जन्म को लेकर दलाई लामा जो निर्णय लेंगे, स्वाभिमानी और संप्रभु भारत किसी ना किसी रूप में उसका समर्थन करेगा.

वैसे भी दलाई लामा को पुनर जन्म कहाँ लेना है, कब लेना है, और लेना है भी की नहीं, इसका निर्णय करने का अधिकार दलाई लामा और उनके अनुआइयों को हैं. और कोई फॉरेन पालिसी का यह बहुत बड़ा निर्णय नहीं है, वल्कि कॉमन सेंस हैं.

आज का बेहद आसान सवाल है, भारत और चीन के बीच अभी तक कितनी इनफॉर्मल समिट का आयोजन किया गया है?
पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, हार्दिक मेहता 

और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.

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