मोदी की थाईलैंड इंडोनेशिया के नेताओं से मीटिंग में क्या बेहद खास हुआ?


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आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.

जैसा की आपको पता होगा, RCEP की डील के लिए कल का दिन बड़ा ही महत्वपूर्ण है.



इसी बीच थाईलैंड सिंगापुर और जापान के लोकल मीडिया में इस तरह की खबरें छप रही हैं, की कल RCEP की डील फाइनल नहीं होगी, और पिछले साल की तरह जॉइंट स्टेटमेंट के साथ बात अगले साल के लिए टाल दी जाएगी.



हालाँकि RCEP की  डील के ना हो पाने को लेकर सीनियर officials अभी भारत का नाम लेने से बच रहे हैं, लेकिन इशारों इशारों में दोष तो भारत के सर पर धरा ही जा रहा है.



वैसे भी हमें इन देशों से अपनी झूठी तारीफ सुनने की कोई भूख नहीं है, मोदी सर्कार भारत के हितों की रक्षा करे यह उसका धर्म है, विस्वास के साथ हमें उम्मीद है, की जब तक भारत के लिए लाभ के सौदे की गारंटी नहीं होगी, मोदी सर्कार भारत को चीन के द्वारा खोदे गए RCEP के कुए में नहीं धकेलेगी.



वैसे देखा जाये, तो मोदी साहब की यह यात्रा RCEP  तक ही सीमित नहीं है, unfortunately हमारा ध्यान RCEP पर ही केंद्रित बना हुआ है.



उदहारण के लिए, आज मोदी साहेब ने थाईलैंड और इंडोनेशिया के नेताओं से महत्वपूर्ण मुलाक़ात करि.



सबसे पहले मोदी जी की थाईलैंड के प्रधान मंत्री से मीटिंग की चर्चा करते हैं.



दोनों नेताओं ने निर्णय लिया, की रक्षा उद्योग के छेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ाया जायेगा, साथ में दोनों देशो के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाने की कोसिस करनी चाहिए.



थाईलैंड के साथ भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं, लेकिन आज कल अमेरिका और चीन की ट्रेड वॉर के शुरुआती चरण में थाईलैंड ने बहुत चांदी काटी है, इसके लिए थाईलैंड को बहुत बहुत बधाई.



लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प से हमें यह सीखना चाहिए, दोस्ती अपनी जगह और व्यापार अपनी जगह.



इसलिए यदि एक्सपोर्ट इम्पोर्ट डेटा की बात करें, तो वर्ष 2015 में जहाँ भारत को थाईलैंड के साथ व्यापार करने से 2.4 बिलियन डॉलर का घाटा हुआ, तो वर्ष 2018 तक घाटे का यह आंकड़ा 2.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया.



बात साफ़ है, थाईलैंड और भारत के बीच व्यापार में मलाई अकेला थाईलैंड ही उड़ा रहा है. इसलिए आशा है, अब थाईलैंड भारत में निवेश करेगा ताकि साल दर साल भारत के बढ़ते हुए व्यापारिक घाटे को संतुलन में रखा जा सके.



दोस्तों, जब हम ट्रेड डेफिसिट यानि की व्यापारिक घाटे की बात करते हैं, तो इसका सीधा सम्बन्ध भारत में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या से है.



आगे बढ़ते हुए, मोदी जी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के साथ भी मुलाक़ात करि.



आपको याद होगा, पिछले साल इंडोनेशिया ने इंडियन नेवी को सबंग पोर्ट तक पहुंच दे दी थी. अब भारत और इंडोनेशिया ने उसी राह पर और आगे बढ़ने का निर्णय लिया है.



पुरे इंडो पसिफ़िक एरिया में शांति और स्थायित्व बनाये रखने की जिम्मेदारी भारत और इंडोनेशिया के कंधो पर है.



इसके अलावा आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए भी इंडिया और इंडोनेसिया ने साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया.



साथ ही मोदी जी ने इंडोनेशिया से मांग करि, की उसे भारत की दवाओं, ऑटोमोटिव पार्ट्स और कृषि उत्पादों के लिए अपना बाज़ार खोलना होगा.



कोई आश्चर्य नहीं है, भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापार में भी पलड़ा इंडोनेशिया की तरफ ही झुका हुआ है.



आंकड़े हमारी आँखें फाड़ने के लिए काफी है, पिछले पांच सालों में हर साल इंडोनेशिया को भारत के साथ व्यापार करने में 10 बिलियन डॉलर से भी अधिक का लाभ हुआ है.



अब आप कहेंगे, हम क्या इन छोटे छोटे देशो के आंकड़े बताकर आपका समय बर्बाद कर रहे हैं.



लेकिन अगर भारत के कुल मिलाकर व्यापारिक घाटे यानि ट्रेड डेफिसिट को देखें, तो पिछले पांच सालों में यह 137 बिलियन डॉलर के आंकड़े से बढ़कर पिछले साल 184 बिलियन डॉलर तक के आंकड़े तक पहुंच गया.



मोदी सर्कार के हर गुजरते साल के साथ भारत का व्यापारिक घाटा 10 बिलियन डॉलर बड़ा है.



आप ही बताएं, जब हम जो भी माल खरीद रहे हैं, वह बनके बहार से आ रहा है, तो भारत में बेरोजगारी नहीं तो और क्या होगी.

कब तक हम बिना कमाए खरीदारी करते रहेंगे?

उम्मीद है, इंडोनेशिया हो या थाईलैंड हो, दोनों को यह बात समझ आएगी, की व्यापारी घाटे से भारत की कमर टूटने वाली है. इससे पहले की पानी सर के ऊपर से गुजरे, इन दोनों देशों को भारत के साथ दोस्ती का ख्याल करते हुए, भारत में निवेश बढ़ाना होगा, और भारत के माल को अपने देशों में खुली छूट देनी ही होगी.



हमें आशा है, मोदी सर्कार इस सन्दर्भ में थाईलैंड और इंडोनेशिया पर दवाब बनाये रखेगी. क्योकि हमें नहीं लगता है, एक या दो मुलाक़ात के बाद ये देश 15 सालों से चली आ रही अकेले मलाई उड़ाने की आदत को बदलेंगे.



हमारे ट्रेड डेफिसिट के सागर में सबसे बड़ी नदी चीन से गिरती है, लेकिन इंडोनेशिया और थाईलैंड के देश ज्यादा पीछे नहीं है.



आज जब भारत को RCEP की डील में शामिल कराने के लिए कुछ एक्सपर्ट्स ज्ञान बांटते फिरते हैं, अगर  फ्री ट्रेड एग्रीमेंट काम कर सकता होता, तो UPA सर्कार ने धड़ा धड़ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किये, तो वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच RCEP में शामिल 16  देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा 7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 78 बिलियन डॉलर कैसे हो गया?


बात साफ़ है, बिना फैरनेस के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत को नुकसान ही होगा. 



लेकिन अब हम UPA सर्कार को उसकी गलतियों के लिए नहीं कोश सकते हैं, मोदी सर्कार को अब जिम्मेदारी लेनी ही होगी, और अगले पांच सालों में भारत के व्यापारिक घाटे में गिरावट लानी ही होगी.



और इस नेक काम की शुरुआत, हमारे थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे दोस्तों ने करनी चाहिए. बहुत हुई प्यार मोहब्बत की बातें, अब यह दोस्ताना व्यापार के आकंड़ों में दिखना चाहिए.



लेकिन साथ में चीन जैसे दुश्मन से निपटने के लिए भी हमें रणनीति तैयार करनी होगी.



आज का बेहद आसान सवाल है, इंडोनेशिया और थाईलैंड के साथ भारत के व्यापार में घाटा साल दर साल कौन सा देश अकेला खा रहा है?



पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, विधान राउत




और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद..

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