आखिर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों राम लाला के पक्ष में फैसला सुनाया?


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आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं. जैसा की आज ऐतिहासिक अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश दे दिया है. जिसमे २.77 एकड़ का पूरा विवादित छेत्र राम मंदिर के लिए दे दिया गया, और 5 एकड़ की नई जगह मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माड़ के लिए दी जाएगी. इस वीडियो में हम इस बात की चर्चा करेंगे, की आखिर कैसे सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पंहुचा की विवादित जमीं हिन्दू पक्ष को दी जाएगी. हम सभी का इस पहलू को जानना इसलिए अति आवश्यक है, क्योकि लिबरल एक्सपर्ट्स और मीडिया ने अभी से इस को लेकर असमंजस फैलाना चालू कर दिया है. सबसे पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया की, 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माड़ कराया गया. और 1528 के पहले उस स्थान के नीच कोई ऐसा स्ट्रक्चर था, जिसे कम से कम मस्जिद नहीं कहा जा सकता था .लेकिन साफ़ तौर पर ASI की खुदाई में क्या निकला इसके आधार पर जमीं के मालिकाना हक़ का निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट के वर्डिक्ट के अनुसार, लेकिन इस बात का कोई एविडेंस नहीं है, की मुस्लिम पक्ष ने वहां पर नमाज़ 1528 से ही पड़ना चालू कर दी थी. इस प्रकार वर्ष 1528 से 1857 के बीच 329 साल के बीच उस मस्जिद में नमाज़ होती थी, यह सिद्ध नहीं सकता है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार विवादित जगह दो हिस्सों में इनर कोर्टयार्ड और आउटर कोर्टयार्ड में बंटी हुई थी. चूँकि आउटर कोर्टयार्ड में पूजा होने को लेकर कोई विवाद था ही नहीं. यहाँ तक की मुस्लिम पक्ष का भी कहना था, आउटर कोर्टयार्ड में पूजा हो सकती है. इस प्रकार कहा जा सकता है, की 1528 से लेकर आउटर कोर्टयार्ड में पूजा होती रही. मूल रूप से सारा विवाद इनर कोर्टयार्ड के मालिकाना हक़ को लेकर था. इसलिए कानून के सिद्धांत balance of probabilities के अनुसार यह मुस्लिम पक्ष की जिम्मेदारी थी, की वह एविडेंस प्रस्तुत करे, की इनर कोर्टयार्ड में नमाज़ 1528 से हो रही है. क्योकि मुस्लिम पक्ष कोई सबूत प्रस्तुत नहीं कर पाया, इसलिए दोनों पक्षों की और से सबूतों के आभाव को ध्यान में रखते हुए , सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पंहुचा की, हिन्दू पक्ष ने 1528 से 1857 तक इनर कोर्टयार्ड में भी पूजा करि. इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने यह conclude किया की, 1857 में जब अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया, उसके पहले वहां पर इनर कोर्टयार्ड में भी पूजा ही होती थी. और साथ ही 18 वी शताब्दी में भारत आये यूरोपियन यात्री ने अयोध्या के बारे में लिखा था. जो इशारा करती थी, की इनर कोर्टयार्ड में बेदी अथवा चबूतरा नामक जगह पर हिन्दू पूजा करते थे. लेकिन यूरोपियन यात्री के ऑब्जरवेशन को सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट में केवल साइट किया गया, उसे सबूत नहीं माना गया . लेकिन जब अंगरेजों ने 1857 इनर कोर्टयार्ड और आउटर कोर्टयार्ड को सेपरेट करने के लिए दिवार बनायीं, तब से मुस्लिम पक्ष ने यह एविडेंस प्रस्तुत किया था, की तब से उन्होंने वहां पर नमाज़ पड़ना चालू किया, जो वर्ष 1949 तक चालू रही. यहाँ पर एक बात तो साफ हो जाती है, की अंग्रेजो ने फुट डालो और राज करो की नीति पर काम करते हुए, विवाद का निपटारा करने के बजाय, विवाद को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन चूँकि कानून के सिद्धांत के अनुसार जब मुस्लिम पक्ष यह सिद्ध नहीं कर पाया की, इनर कोर्ट यार्ड में केवल उसी का अधिकार 1528 से 1857 तक रहा. इसलिए इनर कोर्टयार्ड का मालिकाना हक़ भी हिन्दू पक्ष को दे दिया गया. यहाँ पर ध्यान रखने की जरूरत है, की balance of प्रोबबिलिटीज़ का यह लीगल कांसेप्ट सुप्रीम कोर्ट ने कोई अयोध्या के केस के लिए ही ईजाद नहीं किया है. यह कांसेप्ट साफ़ कहता है, की किसी घटना को लेकर यदि नयायधिसों के मन में डाउट यानि की संसय हो तो उन्हें तय करना होता है, की सबूत देने की जिम्मेदारी किस पक्ष पर है, और यदि वह पक्ष सबूत उपलब्ध नहीं करा पता है, तो निर्णय उस पक्ष के विरोध में सुनाया जाता है. यदि मुस्लिम पक्ष यह सबूत उपलब्ध करा देता, की 1528 से इनर कोर्टयार्ड में नमाज़ अदा हो रही थी. तो आज भी सुप्रीम कोर्ट इनर कोर्टयार्ड का मालिकाना हक़ उन्हें दे देता. लेकिन फिर भी लिबरल एक्सपर्ट यह बात हाई लाइट कर रहे हैं, की जबकि मुस्लिम पक्ष यह सिद्ध नहीं कर पाया की 1528 से वह इनर कोर्टयार्ड में नमाज़ पड़ रहा था. तो हिंदू पक्ष भी सिद्ध नहीं कर पाया की, वह वहां पर पूजा करता था. लेकिन बात फिर वही है, सबूत उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी मुस्लिम पक्ष की थी, नाकि हिन्दू पक्ष की. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही साफ़ साफ़ निर्णय दिया है, लेकिन उसको लेकर डाउट पैदा करने की भरपूर कोसिस की जा रही है. आशा है, जब हमारे एक्सपर्ट सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान करते हैं, तो वह उस पर सवालिया निसान खड़ा करना बंद करेंगे. दुर्भाग्यवश जो अंग्रेजो ने 1857 में किया था,आज हमारे लिबरल एक्सपर्ट और मीडिया वही करने की पूरी कोसिस कर रही है. आज सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसमे 130 करोड़ भारतियों की जीत हुई है, इसलिए इस विवाद को भूलते हुए, हमें भविस्य की और अब देखना चाहिए. वैसे भी भारत के पास चुनौतियों और समस्याओ की को कमी नहीं है. हमें गरीबी बेरोजगारी भुखमरी कुपोषण और धीमे होते आर्थिक विकास जैसे चैलेंजेज का अब एक जुट हो कर सामना करना होगा. नया भारत पुराने विवादों में अपना समय और ऊर्जा अब और बर्बाद नहीं कर सकता है. आज का बेहद आसान सवाल है, बाबरी मस्जिद का निर्माड़ किस वर्ष में हुआ था. पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, Shashank Shekhar और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.

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