थाईलैंड में मोदी जी ने चीन के दांत किये खट्टे, क्या लटक जायेगा RCEP?


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आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.

जैसा की आपको पता होगा, मोदी साहेब तीन दिनों की यात्रा पर थाईलैंड पहुंच गए हैं. जिसमे हम सभी का ध्यान इस ओर रहेगा, की क्या भारत 4 नवंबर को RCEP में शामिल हो जायेगा.



इस बारे में हमने आज अपने चैनल पर पोल करवाया, तो 68% दर्शकों का कहना था, की यदि भारत के हितों ओर चिंताओं का इस एग्रीमेंट में ख्याल रखा जा सके, तो मोदी जी ने इस एग्रीमेंट में शामिल हो जाना चाहिए.



मोदी जी ने भी आपके विचारो को बैंकाक पोस्ट को दिए गए इंटरव्यू में प्रस्तुत किया है.



RCEP के मेंबर देश चाहते हैं, की भारत के बाज़ार में उनके माल को खुली छूट मिल जाये. तो मोदी साहेब ने साफ कर दिया, की भारत भी चाहता है, की इन देशो के बाजार में भारत की सेवाओं को खुली छूट मिले.



बात साफ़ है, अगर आपको बहुत कुछ लेना है, तो आपको कुछ देना भी होगा. यह नहीं हो सकता, की हर एग्रीमेंट के लिए कुर्वानी अकेला भारत ही देता रहे.



हमारे कुछ दर्शको का कहना है, की हम अपने वीडियो में भारत के व्यापार घाटे यानि की ट्रेड डेफिसिट को जरूरत से ज्यादा तरज़ियत देते हैं. 



आपको पता होगा, अमेरिका के पास दुनिया का सबसे अच्छा इंटरस्टेट रोड नेटवर्क है, औऱ अमेरिका ने व्यापार में होने वाले लाभ यानि ट्रेड सरप्लस के दम पर ही यह पूरा नेटवर्क तैयार किया था.



आपको पता होगा, भारत ने अपना अधिकतर रोड नेटवर्क टोल की आशा में  क़र्ज़ लेकर  बनाया है. आप ही बताएं, रोड नेटवर्क क़र्ज़ लेकर बनवाना अच्छा है, अथवा ट्रेड सरप्लस के दम पर बनवाना ज्यादा अच्छा है.



इसलिए मोदी जी ने साफ़ कर दिया, की बढ़ते हुए व्यापारिक घाटे ने भारत की कमर तोड़ दी है, अब भारत इस व्यापारिक घाटे में ओर बढ़त नहीं सह सकता है.



अभी हाल ही में जारी चिंता जनक आकड़ों के मुताबिक, भारत में बेरोजगारी 8.5 % के स्तर तक पहुंच गयी है, जो पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा है.

बेरोजगारी के लिए मोदी साहेब को दोष देना बहुत आसान है, लेकिन आप सभी को पता है, भारत में बेरोजगारी का प्रमुख कारण यह है, की हम एक्सपोर्ट की तुलना में इम्पोर्ट बहुत अधिक करते हैं.



अगर मेक इन इंडिया की असफलता की जिम्मेदारी मोदी सर्कार के सर पर है, तो चीन के सस्ते माल को खरीदने का दोष क्या हम सभी के सरों पर नहीं आता है??



थाईलैंड की जमीं छूते ही मोदी जी ने साफ़ कर दिया, की भारत ने RCEP को लेकर अपने जायज़ प्रस्ताव सामने रख दिए है, ओर वह negotiations में भी सीरियसली भाग ले रहा है. लेकिन RCEP की डील ऐसे तैयार होनी चाहिए, की इसमें शामिल सभी 16 मेंबर्स की इसमें जीत हो.



यदि १ भारत को हराकर अन्य 15 सदस्य देश जीत का आनंद उठाना चाहते हैं, तो भारत थाईलैंड में अपने डेथ वारंट पर साइन तो करेगा नहीं.



जैसा की अभी भी मोल भाव चल रहा है, कुछ दिनों के लिए इंतजार कर लेते हैं. लेकिन यदि भारत RCEP को स्वीकार कर लेता है, तो यह जिम्मेदारी भी मोदी सर्कार की होगी, की वह हमें समझाए, की चीन के नेतृत्व वाली यह डील आखिर कैसे भारत को लाभ पहुचायेगी?



इसी बीच अमेरिका के ट्रेज़री सेक्रेटरी ने भारत के वित्त मंत्री से मुलाक़ात करि , ओर विश्वास जताया, की अगले पांच सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का लक्स्य भारत हांसिल कर लेगा.



भारत ओर अमेरिका मिलकर विकास दर को बढ़ाने, ओर इकनोमिक सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए साथ मिलकर कोसिस करते रहेंगे.



साथ ही अमेरिका चाहता है, की भारत कुछ विशेष छेत्रों को अमेरिकी निवेश के लिए खोल दे, हालाँकि उन्होंने इन एरियाज की जानकारी सार्वजनिक नहीं की. सरल शब्दों में अमेरिका चाहता है, की उसे भारत में निवेश बढ़ाने का मौका ओर मिले.



लगे हाथों  भारत ने भी साफ़ कर दिया है, की अमेरिका ने भविस्य में भी चाबहार पोर्ट को आर्थिक प्रतिबंधों से ढिलाई जारी रखनी चाहिए, क्योकि ऐसा करके अमेरिका भारत औऱ अफ़ग़ानिस्तान दोनों के हितों का ख्याल रख रहा है.



अब आप देखिये, की एक ओर अमेरिका भारत में निवेश बढ़ाना चाहता है, तो दूसरी ओर RCEP के 15 देश भारत में अपना माल डंप करना चाहते हैं.



लेकिन साफ़ करने वाली बात यह है, की चाहे अमेरिका हो या चीन हो, हर कोई देश अपना स्वार्थ साधने में लगा है, इसलिए भारत ने अपने हितों की रक्षा करने के लिए हमेसा जागरूक रहने की जरूरत है.



आपने देखा होगा, की राष्ट्रपति Trump पर महावियोग चलता देख, भारत की मीडिया को आजकल मन ही मन बड़ी खुसी हो रही है.



लेकिन हमें यह नहीं बताया जा रहा है, की अमेरिका में बेरोजगारी पिछले 50 सालों के निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, 



ट्रम्प को गालिया देना बहुत आसान है, ओर इसमें आपको मजा भी आ सकता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं, की October महीने में अमेरिका में १ लाख 28 हज़ार नौकरियां आयी है.



राष्ट्रपति ट्रम्प के कारण जमीं फट जाएगी ओर आसमान नीचे गिर पड़ेगा, इस निष्कर्ष पर पहुंचने वाले एक्सपर्ट ने क्या हमें यह बताया था, की अमेरिका की अर्थ व्यवस्था आज तेज गति से विकास करेगी.



कल क्या होगा, किसी को नहीं पता, लेकिन आज जो डेटा हमारे सामने है, वह यही दर्शा रहा है, की ट्रम्प इकोनॉमी काम कर रही है.



लेकिन हम फिर अपने मैन पॉइंट पर लौटते हैं, दुनिया का भला करने के लिए निकलने के पहले, भारत को अपना खुद का कल्याण करने के रास्ते खोजने होंगे.



अमेरिका हो या चीन हो, सबको भारत में 130 करोड़ उपभोक्ता दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हे भारत में 260 करोड़ काम करने वाले हाथ दिखाई नहीं पड़ते हैं.



उम्मीद है, भारत सर्कार अमेरिका औऱ  चीन के साथ डील करते हुए, यह ध्यान रखेगी, की बिना कमाई के खरीदारी भी नहीं हो सकती है.



आज का बेहद आसान सवाल है, किस देश में बेरोजगारी पिछले 50 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है?





पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, जिग्नेश सुरथी 






और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.

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