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आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज कुछ हटकर चर्चा करते हैं.

जैसा की आपको पता चल गया होगा, 6 दिसंबर को पानीपत मूवी रिलीज़ होने वाली है. जिसके आज पोस्टर रिलीज़ हो गए हैं.


आपको यह तो जानकारी होगी ही, की पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी 1761 में मराठा और अफ़ग़ान एम्पायर के बीच लड़ा गया.


हालाँकि आप यह आसानी से सोच सकते हैं, की यह तो मराठो और अफ़ग़ानों का आपसी विवाद था. लेकिन आपको यह जानकारी भी होनी चाहिए, की जब मराठो की हार हो गयी, तो दूसरे दिन 40,000 मराठो को इसलिए नहीं मारा गया, क्योकि वह मराठे थे, और उन्होंने अब्दाली के सैनिकों को मारा था, बल्कि उनका क़त्ल सिर्फ इसलिए किया गया, क्योकि वह काफिर थे. 


पानीपत की तीसरी लड़ाई को आप एक युद्ध मान सकते हैं, लेकिन अहमद साह अब्दाली ने आस पास के सुल्तानों से alliance  बनाकर इसे अकेले मराठो के खिलाफ जिहाद के तौर पर लड़ा.


आपको कभी कभी हैरानी होती होगी, की आखिर पाकिस्तान कैसे अपने से चार गुना बड़े भारत को हारने की सोच लेता है, इसकी प्रेरणा उन्हें पानीपत के तीन युद्धों से ही मिलती है.


जैसा की आप जानते हैं, जो लोग इतिहास से नहीं सीखते हैं, वह पुरानी गलतियों को भविस्य में नए तरीके से दोहराते हैं.


हालाँकि इस युद्ध में हार तो मराठो की हुई थी, लेकिन हमें अहमद शाह अब्दाली के वह शब्द याद रखने चाहिए, जो उसने जयपुर के राजा माधव सिंह को खत में लिखे थे.


अब्दाली के अनुसार, मैराथन ने वीरता का सर्बोच्च परिचय दिया, जो अन्य लोगों के बस की बात नहीं है.इन वीर मराठों ने बिना डरे लड़ाई लड़ी और खून बहाने में सबसे आगे रहे. और अब्दाली की जीत केवल उपरवाले की कृपा और बेहतर रणनीति के कारण हुई.


आपको लग सकता हैं, की अब्दाली इस खत में सांत्वना देने की कोसिस कर रहा होगा. लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है, की पानीपत का तीसरा युद्ध जीतने के बाद भी अब्दाली अफ़ग़ानिस्तान वापस लौट गया.


उसका कारण यह नहीं था, की उसका दिल बदल गया था.बल्कि पानीपत के युद्ध में उसे इतनी छति उठानी पड़ी थी, की जीत उसके लिए बेमानी थी, और उसे डर था, मराठे जल्द ही बदला लेने के लिए फिर से आएंगे.


आज जब हम पानीपत के तीसरे युद्ध के बारे में पड़ रहे थे, तो मराठे क्यों हारे, इसके कई कारण बताये जाते हैं. जिनमे इस एक प्रमुख कारण यह गिनाया जाता है, की मराठो के सेनानायक सदाशिव राव भाऊ एक अच्छे सिपाही थी, लेकिन वह एक सेनापति नहीं थे.


250 सालों के बाद हम अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकते हैं, और भाऊ ने क्या गलत किया, यह समझ पाना भी बहुत आसान है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए, की युद्ध में अपने आपको हारता देख सदाशिव राव भाऊ भी जान बचाकर भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी अंतिम साँस तक लड़ाई लड़ी.


लेकिन सच्चाई यह भी है, की एक और अब्दाली ने मुसलमानो का महा गठबंधन बना लिया था, मराठे राजपूत जाट जैसे हिंदुंओ और सिक्खों को एक जुट नहीं रख पाए.


पानीपत के तीसरे युद्ध को दो धर्मो के बीच आप लड़ाई समझने की आसान गलती कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह लड़ाई पावर और पैसे के लिए लड़ी गयी थी.


आपको सायद पता हो, इब्राहिम खान गर्दी ने सदासिव राव भाऊ के साथ मिलकर पानीपत के युद्ध को जीतने की ऐसी रणनीति बनायीं थी, जिसने मराठो को जीत दिला ही थी.


 इब्राहिम खान गर्दी के नेतृत्वा में तोपखाने के कमाल ने मराठों को जीत दिला ही दी थी, और जीत को पास आता देख, अन्य मराठा जेनेरेल्स ने डिफेंसिव पोजीशन छोड़कर अब्दाली के सेना पर टूटने का निर्णय कर लिया.


परिणाम यह हुआ,  इब्राहिम खान गर्दी के तोपखाने के सामने मराठा सैनिक आ गए, और इस प्रकार मजबूती के मजबूरी बनाते ही मराठे जीती बाजी हार गए.


इब्राहिम खान गर्दी के तोपखाने  ने अब्दाली के सेना को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, और इसके लिए जब वह अपने दोस्त सदाशिव राव भाऊ का अंतिम संस्कार कर रहे थे, तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें तड़पा तड़पा के मार दिया गया.


इसलिए पानीपत की तीसरी लड़ाई को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन एक सच्चाई यह भी है, की धर्म की गोंद से अब्दाली ने अलायन्स बनाने में कामयाबी हांसिल करि थी.


मराठे इस युद्ध में क्यों हारे, इसके कई कारण थे.


जैसे की मराठों के सेना में लड़ने वालों से जायदा सनका ना लड़ने वालों की थी, करीब 2 लाख ऐसे लोग जिसमे महिलाएं और बच्चे शामिल थे, जो उत्तर भारत में तीर्थ यात्रा करने के लिए आ हुई थे. इसलिए पहले तो मराठो की सेना की रफ़्तार इस कारण धीमी हो गयी और जब मराठो की सप्लाई लाइन को अब्दाली ने बंद कर दिया, तो मराठों की खाना जल्द समाप्त हो गया.


एक और कारण यह था, की  मराठे दिल्ही की  शर्दी में लड़ाई लड़ने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन फिर भी गर्मी के कपडे पहन कर उन्होंने ठिठुरती शर्दी में लड़ाई लड़ी.


लेकिन इस युद्ध से हमें सीखने को मिलता है, की संगठन में शक्ति होती है, और उसके बाद ना केवल हमारे पास अच्छी रणनीति होनी चाहिए, बल्कि हमें उस पर अमल भी करना चाहिए.


आजका बेहद आसान सवाल है, की पानीपत की तीसरे युद्ध में मराठो का तोपखाना कौन सम्हाल रहे थे?


पिछले वीडियो में पूछे गए सवाल के लिए आज के लकी विनर हैं, विधान राउत




और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद..

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