अमित शाह पर प्रतिबन्ध की धमकी का भारत ने अमेरिका को मुहतोड़ जवाब दिया
अमेरिका अमित शाह पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगा पायेगा??
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Reference
https://www.uscirf.gov/news-room/press-releases-statements/uscirf-raises-serious-concerns-and-eyes-sanctions
https://en.wikipedia.org/wiki/United_States_Commission_on_International_Religious_Freedom
https://www.thehindu.com/news/national/us-commissions-comment-on-cab-unwarranted-and-inaccurate-mea/article30265763.ece
https://www.outlookindia.com/website/story/india-news-guided-by-biases-mea-after-us-commission-on-religious-freedoms-remarks-over-citizenship-bill/343895
https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/it-has-no-locus-standi-mea-on-uscirfs-citizenship-bill-statement/articleshow/72454886.cms
https://en.wikipedia.org/wiki/Executive_Order_13769
https://www.uscirf.gov/sites/default/files/Tier2_INDIA_2019.pdf
जैसा की घड़ियाली आँसू बहाते हुए, U.S. Commission on International Religious फ्रीडम ने कहा था, की लोकसभा में सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल के पास होने से उसे बड़ी बैचेनी हो रही है.
और उसे लग रहा था, की भारत ने इस बिल को पास करके गलत दिशा में खतरनाक टर्न ले लिया है.
लेकिन सवाल यह था, की भारत को किस मोड़ पर कब और कौन सा टर्न लेना है, इसका निर्णय भारत की संसद करेगी या अमेरिका का कोई ऐसा संगठन करेगा, जिसकी बात स्वयं अमेरिका की सर्कार नहीं सुनती है?
आगे बढ़ते हुए, इस कमिशन ने अमेरिकन सर्कार को रेकमेंड भी किया था, की अगर यह बिल राज्य सभा में भी पास हो गया, तो अमेरिकन सर्कार ने भारत के गृह मंत्री और अन्य प्रमुख नेताओं पर प्रतिबन्ध लगाने चाहिए.
बड़ी स्वाभाविक बात है, भारतीय विधायी प्रक्रिया में इस अमेरिकी हस्तछेप को हम सभी भारतीय नहीं पचा पाएंगे.
क्या हमारे पूर्वजो ने इसी दिन को देखने के लिए भारत को आजाद कराया था, की भारत की संसद कौन सा कानून पास करेगी, यह निर्णय सात समुन्दर पर बैठा हुआ कोई कमिशन तय करेगा?
इसी बीच अच्छी बात यह हुई, की भारतीय विदेश मंत्रालय ने बिना समय गवाए, अमेरिका के इस कमिशन को मुँह तोड़ जवाब दिया.
जिसमे साफ़ कर दिया गया, की अमेरिकी कमिशन को कोई हक़ नहीं है, की वह भारत के आतंरिक मामले में अपनी टांग अड़ाये.
साथ ही यह भी साफ़ कर दिया गया, की अमेरिकी कमीशन की इस प्रतिक्रिया से भारत को कोई आश्चर्य नहीं है,
क्योकि पहले भी यह अमेरिकी कमीशन बिना भारत की यात्रा करे, भारत के खिलाफ एक तरफा नकारात्मक एनुअल रिपोर्ट्स छापता रहा है.
जैसा की अमेरिकी कमीशन ने कहा है, की उसे चिंता इसलिए हो रही है, क्योकि इस बिल में धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान है. और इसी लिए अमित शाह पर प्रतिबन्ध लगाए जाने चाहिए.
तो ये कमीशन क्या यह बताएगा, की कब वह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ प्रतिबन्ध के लिए रिकमेन्डेशन दे रहा है.
राष्ट्रपति ट्रम्प ने जनवरी 2017 में एक एग्जीक्यूटिव आर्डर पास किया था, जिसे मीडिया में मुस्लिम बैन कहा जाता था. जबकि मूल रूप से यह अमेरिका की सुरक्षा के लिए पास किया गया आर्डर था, यहाँ तक की इसके कारण नार्थ कोरिया और वेनेजुएला लोग प्रभावित हो रहे थे.
बाद में जून 2018 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी इस एग्जीक्यूटिव आर्डर को सही ठहराया था.
लेकिन जब न्याय की कसौटी पर राष्ट्रपति ट्रम्प के द्वारा अमेरिका की सुरक्षा के लिए पास किया गया एग्जीक्यूटिव आर्डर खरा उतरा, तो सायद ही किसी लिबरल एक्सपर्ट और मीडिया ने माफ़ी मांगी होगी.
मुद्दे की बात यही है, की जब अमेरिका के राष्ट्रपति अमेरिका की सुरक्षा के लिए कुछ देशो के नागरिको की एंट्री पर बैन लगाते हैं, अथवा जब भारत में कुछ देशो के सताये हुए माइनॉरिटी समुदाय के लोगों को नागरिकता देने के लिए कानून बनाया जाता है.
तभी इन लिबरल एक्सपर्ट्स और मीडिया को धर्म दिखाई देने लगता है.
दोस्तों यहाँ पर हमें अमेरिकन सर्कार और U.S. Commission on International रिलीजियस फ्रीडम को अलग अलग करके देखने की जरूरत है.
इस कमीशन का काम है रिकमेन्डेशन देना, इसे बनाया ही इसीलिए गया है. इसकी सलाह पर काम करना है, या नहीं यह तो अमेरिका की सर्कार को तय करना है.
आपको भी पता है, ये आदर्शवादी बातें अमेरिका क्यों करता है. ताकि इनका उपयोग करके मोल भाव के दौरान वह अपने स्वार्थ साध सके.
आपको पता है, यह US कमीशन कन्ट्रीज ऑफ़ पर्टिकुलर कंसर्न नामक वाच लिस्ट जारी करता है, वर्ष 2018 की अपनी एनुअल रिपोर्ट में इस कमीशन ने पाकिस्तान को इसी वॉचलिस्ट में डालने के लिए रिकमेन्डेशन दी थी.
लेकिन अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को वॉचलिस्ट और उसके प्रतिबंधों से छूट दे दी. फिर भी वर्ष 2019 की एनुअल रिपोर्ट में इस कमीशन ने पाकिस्तान को वॉचलिस्ट में रखने के लिए रिक्वेस्ट करि.
पाकिस्तान की ही तरह इस कमीशन ने चीन को भी वॉचलिस्ट में डालने के लिए अमेरिका के विदेश मंत्रालय को अपनी 2019 की एनुअल रिपोर्ट में रिकमेन्डेशन दी थी.
तो दूसरी ओर 2019 की एनुअल रिपोर्ट में भारत को वॉचलिस्ट के लिए रेकमेंड ना करते हुए, उससे एक निचले स्तर पर रखा था, और भारत से अपेक्षा करि थी, की वह इस कमीशन को भारत आकर जमीनी हालत देखने का मौका दे. आपको पता होगा, भारत ने ये परमिशन पिछले दो दशकों में इस कमीशन को नहीं दी है.
हम सिर्फ यह कहना चाह रहे हैं, की इस कमीशन की रिकमेन्डेशन को हम जरूरत से ज्यादा भाव दे रहे हैं. हो सकता है, की इसका अंत अमेरिकी विदेश मंत्रालय के किसी कचरे के डब्बे में हो.
मुद्दे की बात यह है, की हमें इस कमीशन की रिकमेन्डेशन पर अमेरिकी सर्कार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और कदम का इंतजार करना होगा.
हो सकता है, अमेरिका की रिपब्लिकन सर्कार जो खुद अमेरिका में घुसपैठ के खिलाफ कड़ा रुख अपनाये हुए है, वह भारत के प्रति नरम रवैया अपनाये.
साफ़ तौर पर जब अमेरिका ने इस कमीशन की एनुअल रिपोर्ट को तब्बजो नहीं दी, तो इसकी सम्भावना कम है, की वह इस कमीशन के एक पेज की रिकमेन्डेशन को पढ़कर भारत की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हस्तछेप करेगा .
हाँ यह होने की सम्भावना ज्यादा है, की इस रिकमेन्डेशन का प्रयोग अमेरिका भारत के साथ मिनी ट्रेड डील के लिए चल रहे अथवा अन्य किसी मोल भाव में करे. इस सिनेरियो के बारे में हमें तैयार रहना होगा.
लेकिन इन फर्जी धमकियों से मोदी सर्कार डरेगी, इसका खतरा बहुत कम जान पड़ता है. बात साफ़ है, ट्रेड डील अपनी जगह, और भारत की विधायी प्रक्रिया अपनी जगह.
चाहे भारत को हथियार और माल बेचना हो, अथवा चीन को इंडो पसिफ़िक में संतुलन में रखना हो, अमेरिका की सर्कार के लिए भारत का महत्व इस सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल से बहुत अधिक है, इसलिए अमेरिका भारत के गृह मंत्री पर कारवाही करके अपने पैरो पर कुल्हाड़ी तो मारेगा नहीं.
ये तो भारत और अमेरिका में बैठे लिबरल मीडिया, नेता और एक्सपर्ट हैं, जो जिस डाल पर बैठे हैं, उसी डाल को काटने की कोसिस दिन रात करते रहते हैं.
वैसे राजनीती की समझ आपको भी है, अगर अमेरिका की सर्कार ने गलती करके अमित शाह के खिलाफ कारवाही करि, तो इसका लाभ सबसे जायदा किसको होगा, यह आपको भी अच्छे से पता है.
आपको तो याद होगा, पिछली बार रिलीजियस फ्रीडम का बहाना बनाकर अमेरिका की सर्कार ने मोदी साब का वीसा कैंसिल कर दिया था. इसलिए अमेरिका अपनी गलतियों से इस बार सीखेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए.
कम से कम अभी तो हमें नहीं लगता है, की अमेरिका की राष्ट्रवादी ट्रम्प सर्कार इस फेक रिकमेन्डेशन पर कोई रियल कारवाही करेगी. आपको क्या लगता है, नीचे कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताएं.
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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