अमेरिका भारतीय प्रगति का उदाहरण दुनिया को क्यों दे रहा है??


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Reference 





आज कल हमारे देश में  नेगेटिव माहौल का निर्माण करने की जोरो शोरो से कोसिस करि जा रही है. उस समय यह सुनने में अच्छा लगता है, जब विदेशो में भारत की तारीफ करि जाती है.



यहाँ पर साफ़ करने वाली बात यह है, की यह किसी विशेष सर्कार की तारीफ नहीं है, यह उस भारतीय मॉडल की तारीफ है, जिसे भारत के किसान मजदूर कामगार व्यापारी और उद्यमी मजबूती से आगे ले जा रहे हैं.



आपको सायद इस बात की जानकारी हो, की एक समय ऐसा था, जब भारत गेंहू के दाने दाने के लिए मोहताज था. वर्ष 1947 से 1959 के बीच अमेरिका ने 931 मिलियन डॉलर की खाद्य सहायता भारत को मुहैया कराइ थी.



आज जबकि हमारे खाद्य भंडार अनाज से भरे पड़े हैं, और हम अपने दयनीय हालत को भूल चुके हैं. अमेरिकियों को आज भी याद है, की वह कभी बोरो में भरकर गेहू भारत भेजा करते थे.



लेकिन आज भारत का उदहारण देकर अमेरिका दुनिया को यह बता रहा है. की जिसतरह उसने भारत की मदद करि, उसी तरह वह दुनिया के अन्य विकासशील देशो की भी मदद कर सकता है, ताकि वे सभी अपने पाँव पर खड़े हो जाये.



दुनिया की सबसे बड़ी विदेशी सहायता देने वाली अमेरिकी संस्था United States Agency for International डेवलपमेंट के एडमिनिस्ट्रेटर के अनुसार वह देशो की मदद ऐसे करना चाहते है, की वे सभी सहायता लेने वाले से बदलकर सहायता देने वाले देश बन जाये.



जिस तरह एक समय दान लेने वाला देश भारत, आज अफ़ग़ानिस्तान को सहायता देने वाला पांचवा सबसे बड़ा देश बन गया है.



अमेरिकी सर्कार के अंतर्गत काम करने वाली इस स्वतंत्र संस्था  ने भारत की प्रगति में सहयोग दिया होगा,उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद्. लेकिन अच्छा होता, अगर अमेरिकी अधिकारी पूरा क्रेडिट अपनी संस्था को देने के बजाय आम भारतीय के पुरुषार्थ की महानता को भी स्वीकार करते.



कोई बात नहीं, अमेरिकी संस्था भारतीय विकास की उपलब्धि को आज स्वीकार कर रही है, यही काफी है.  लेकिन हम सभी को पता है, की हमें अभी बहुत आगे जाना है.



अभी अमेरिका भारत का example दुनिया को दे रहा है, लेकिन भारत का सपना फिर से विश्वगुरु बनने का है. और हम इस सपने को जल्द से जल्द पूरा करेंगे.



भारत का उदहारण देने के साथ साथ अमेरिकी अधिकारी विकाशील देशों को चीन से कर्ज लेने के नुकसान भी समझाने लगे.



अभी हाल ही में श्री लंका के राष्ट्रपति भारत आये थे, तो उन्होंने कहा था. की यदि दुनिया के अन्य देश श्री लंका की मदद नहीं करेंगे, तो उसे आर्थिक सहायता चीन से ही लेनी पड़ेगी.



दुनिया भर के देश यह तर्क देते हैं, की क्योकि अमेरिका इंडिया जापान और सिंगापुर जैसे देश निवेश नहीं करते हैं, इसलिए वह चीन को गले लगाने के लिए मजबूर होते हैं.



सायद ये देश यह समझते हैं, की चीन से कर्जा ले लेकर वह अमीर बन जायेंगे.



लेकिन दुनिया भर के अख़बार उन केस स्टडीज से भरे पड़े हैं, जिनमे साफ़ साफ़ लिखा है, की चीन के कर्ज के जाल में फंस फंस कर किसने क्या क्या कुर्वानी दी है.



भारत हो या अमेरिका हो, हम जब ही कभी किसी देश को आर्थिक मदद देते हैं, तो हर डिटेल सार्वजनिक करि जाती है. लेकिन चीन आर्थिक मदद देने के पहले यह एग्रीमेंट करता है, की एग्रीमेंट की डिटेल्स सार्वजानिक नहीं की जाएगी.



देख लीजिये, यदि चाइनीस चोर की दाढ़ी में तिनका नहीं है, तो वह ऐसे सीक्रेट एग्रीमेंट करता क्यों है.



जबकि अमेरिका और भारत अब यह कोसिस कर रहे हैं, की दुनिया के देशो को यह समझ आने लगे, की चीन के कर्जे की छिपी हुई कौन सी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी.



फिर भी जैसा की हम देख रहे हैं, चीन से पैसे लेने की तेजाइ में किसी के पास समय नहीं है, की वह श्री लंका जैसे उन देशो का हश्र देखें, जिन्होंने अपने स्ट्रेटेजिक एसेट्स चीन के हाथो में दे दिए.



इन देशो के वर्तमान नेताओं ने चीन से आने वाले पैसे को गिना जरूर होगा, लेकिन आगे आने वाली पीडियों इन नेताओं को गालिया नहीं तो और क्या देंगी.



लेकिन अच्छा है, कम से कम अब लोकतान्त्रिक देशो ने यह कोसिस तो चालू करि है, ताकि कर्ज लेने वाले कमजोर देश चीन के पैसे की सच्ची कीमत के बारे में सोचने को मजबूर हों.



फिर वही बात, ऐसे इन कमजोर देशो को समझाने से अच्छा है, बीमारी को उसकी जड़ से मिटाया जाये.



चीन के पास पैसे की गर्मी आती कहाँ से है, की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी पूरी दुनिया में ब्लेंक चेक बांटते फिरते हैं.



एक्सपर्ट लोगों के अलावा, इसका जवाब आप सभी को मालूम है. जब तक लोकतान्त्रिक देशो में  नागरिकों के घर मेड इन चाइना माल से भरे होंगे, तब तक वही लोकतान्त्रिक देश आर्थिक रूप से कमजोर देशो को उपदेश नहीं दे सकते हैं, की वे चीन से कर्ज ना लें.



हाल के कुछ समय में यह देखने में अच्छा लगता है, की अमेरिका हो अथवा भारत हो, दोनों ही देश अब चीन की बिमारी का जड़ से इलाज करने के लिए आगे निकल पड़े हैं.




आइये देखते हैं, की लोकतंत्र और कम्युनिज्म की इस लड़ाई के अंत में जीत किसकी होती है?

और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.

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