Did Jawaharlal Neharu gave away Gwadar to Pakistan??
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Reference -
http://www.sunday-guardian.com/news/manmohan-did-not-correct-map-error-to-protect-nehru-name
https://www.quora.com/Was-India-once-offered-the-Gwadar-Port-by-the-Sultan-of-Oman-before-Pakistan
https://www.dailyo.in/politics/chabahar-gwadar-port-india-pakistan-china-ties-cpec-afghanistan/story/1/11256.html
https://www.qdl.qa/en/gwadar-sultan%E2%80%99s-possession
https://www.csis.org/analysis/pakistans-gwadar-port-new-naval-base-chinas-string-pearls-indo-pacific
https://tribune.com.pk/story/1478472/cpec-and-gwadar/?__cf_chl_jschl_tk__=7e1458bba3668ac15644a1b228f445fc3512c86e-1577103922-0-AamF91BFJCX8xkNuhkFCidazslYta2J6pun9BDK165HaPY2XdC8VHkWCREJjy_BsoEYsB7nA2tElrVGkfQI-YMfZKmgPsIGYg9zY41-lIRmoxpxEpchJiVr2lV_eK58fnRfl_vzACi6P6U4-MV-Q1tY4JXsczN7h824kKquCHto0pJZu3N_OtA1MfPWCJS5DI0xMUKsiOGpAlSHDyeqsPHvfaAMVG5v0mPLhqgaOgTPmEurevhwtSgifufRb5_3BAm8c5CZ72q8wGystPLkf0Hr0hK31bLHQPmT1GdxzpRXJ
https://en.wikipedia.org/wiki/Gwadar_Port
आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
जब भी कभी हम ग्वादर पोर्ट का नाम सुनते हैं, तो हम यह स्वाभाविक रूप से मान लेते हैं, की हमेसा से ग्वादर पाकिस्तान का हिस्सा रहा होगा.
लेकिन सच्चाई यह है, वर्ष 1784 में खान ऑफ़ कलात ने ग्वादर ओमान को दे दिया था. जिसका ओमान के साथ एकीकरण वर्ष 1792 में पूरा हो गया.
तब से लेकर ग्वादर मछुआरों का गांव बनकर रहा. फिर जाके वर्ष 1863 में खान ऑफ़ कलात को ग्वादर की याद आयी, और उन्होंने ग्वादर को वापस लेने के लिए कोसिस चालू कर दी.
फिर वर्ष 1895 और 1904 में खान ऑफ़ कलात और गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ने विचार किया, की ग्वादर को ओमान से खरीद लिया जाये, लेकिन यह सौदा पूरा नहीं हो पाया.
फिर 1939 में ओमान की तरफ से फॉर्मल प्रस्ताव ब्रिटिश सर्कार को किया गया, की सैन्य मदद के बदले में ओमान ब्रिटिश सर्कार को ग्वादर देने के लिए तैयार है.
फिर 1947 और 1948 में ऐसी बातें चली की, पैसे के बदले ओमान स्टेट ऑफ़ कलात को ग्वादर बेच देगा.
इसी बीच भारत आजाद हो गया, और ब्रिटिश और कलात दोनों ही ओमान से ग्वादर नहीं खरीद पाए.
लेकिन स्टेट ऑफ़ कलात को पाकिस्तान में मिला लिया गया.स्टेट ऑफ़ कलात का पाकिस्तान में कैसे छल कपट से विलय हुआ, वह आपको पता होगा ही.
फिर जाके वर्ष 1954 में United States Geological सर्वे की मदद से पाकिस्तान को समझ आ गया, की ग्वादर में डीप sea पोर्ट बनाया जा सकता है.
फिर जाके वर्ष 1958 में ओमान ने ३ मिलियन डॉलर की कीमत पर पाकिस्तान को ग्वादर बेच दिया, तभी से ग्वादर पाकिस्तान का हिस्सा है.
चलो ये तो हो गयी वो सारी बातें, जिनके ब्रिटिश लाइब्रेरी में सबूत मौजूद हैं. लेकिन यहाँ पर एक बात सिद्ध हो गयी, की ओमान से ग्वादर ख़रीदे जाने का प्रस्ताव 175 सालों से टेबल पर रहा है.
इसलिए कम से कम यह तो कहा जा सकता है, की तब की भारत सर्कार को यह तो पता होगा, की ओमान के कब्जे में ग्वादर है, और उसे खरीदने को लेकर बात चल रही है.
फिर जाके वर्ष 2014 में वरिष्ठ पत्रकार माधव नालापत ने संडे गार्डियन में एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से आर्टिकल छापा, की जिस तरह नेहरू ने भारत को मिलने वाली UN सिक्योरिटी कौंसिल की सीट चीन को दे दी, उसी प्रकार जब ओमान के सुल्तान भारत को मात्रा 1 मिलियन डॉलर में ग्वादर देने को तैयार थे, तब नेहरू ने ग्वादर पाकिस्तान के हाथो ने सौंप दिया.
इसी बीच चीन पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर ने आकार लेना चालू किया, और फिर वर्ष 2016 में भारत अफ़ग़ानिस्तान और ईरान ने चाबहार पोर्ट को लेकर एक एग्रीमेंट किया.
वर्ष 2016 में ही रिटायर्ड ब्रिगेडियर गुरमीत कँवल ने इसी बारे में ओपिनियन छापा, जिसमे लिखा था की डिप्लोमेटिक कम्युनिटी में ऐसी बाते चलती है, की आजादी के बाद सुल्तान ऑफ़ ओमान की तरफ से गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ही ग्वादर का एडमिनिस्ट्रेशन देखती थी.
दोनों देशो के बीच सम्बन्ध बेहद अच्छे थे, इसलिए जब खान ऑफ़ कलात ने ओमान से ग्वादर पाकिस्तान को लौटाने के लिए कहा, तो ओमान ने पहले ग्वादर इंडिया को ऑफर किया, लेकिन भारत ने ग्वादर की गिफ्ट लेने से मना कर दिया.
ब्रिगेडियर गुरमीत कँवल ने यह भी साफ़ कहा था, की ओमान ने सायद यह ऑफर मौखिक रूप से दिया था, और वह ऑफर सच था, या नहीं, इसकी सच्चाई का कन्फर्मेशन नहीं है.
यहाँ पर आपने ध्यान दिया हो, तो यह खबर किसी ऐरे गेरे आदमी ने नहीं छापी थी, एक वरिष्ठ पत्रकार और सेना के एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने इसे अपने ओपिनियन में शामिल किया था.
भारत सर्कार को ग्वादर पोर्ट ऑफर हुआ था या नहीं, यह तो कन्फर्म अभी तक नहीं हुआ है. लेकिन एक बात तो कही जा सकती है, की भारत सर्कार को निश्चित रूप से पता होगा, की ग्वादर बिकने वाला है.
इसलिए क्या भारत सर्कार ने प्रोऐक्टिवली उस समय ओमान से नहीं पूछना चाहिए था, की अगर पैसे के लिए बेचना ही है, तो इंडिया को बेच दो.
लेकिन जो लोग इस खबर को पड़ते हैं, वह हमें यह तुरंत बताने लगते हैं, की ग्वादर को खरीदना भारत के लिए क्यों मूर्खतापूर्ण होता.
इन विद्वान लोगों का पहला आर्गुमेंट होता है, की भाई ग्वादर बहुत दूर था, और अगर ओमान भारत को ग्वादर दे भी देता, तो पाकिस्तान उसे हमला करके भारत से छीन लेता.
यह तो हुआ नेगेटिव आर्गुमेंट, जिसके अंतर्गत बिना लड़े ही हार मान ली गयी.
आपमें से बहुत से लोगो को यह भी पता होगा, की कलात को भी भारत में मिलाने के खिलाफ ऐसे ही argument दिए जाते थे, की वह भारत से बहुत दूर था.
यहाँ तक की 27 मार्च 1948 को आल इंडिया रेडियो पर announce हुआ था, की कलात भारत में मिलना चाहता है, लेकिन फिर भी जमीं पर कलात को पाकिस्तान का हिस्सा बना लिया गया.
कलात के पाकिस्तान के विलय को लेकर किसने क्यों और कैसे सहायता करि. यह भी एक इतिहास का अनसुलझा रहस्य है.
लेकिन यहाँ पर याद रखने वाली बात है, की ग्वादर पाकिस्तान ने ख़रीदा 1958 में और वर्ष 1948 में पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर कब्ज़ा कर चुका था.
आप ही बताएं, ऐसी स्थिति में क्या वर्ष 1958 के पहले बेहतर ऑफर देकर भारत को ओमान से ग्वादर नहीं खरीदना चाहिए था.
अगर उस समय ग्वादर हमारे पास आ जाता, और इन विद्वान लोगों की बात भी सच हो जाती तो, हम पाकिस्तान से ग्वादर में लड़ रहे होते.
क्या अपने घर में दुश्मन से लड़ने के बजाये यह अच्छा नहीं होता, की हम दुश्मन से उसके घर में लड़ते?
हम कभी लड़ने के लिए बहार नहीं गए, इसी का परिणाम है, की आज हम सिकुड़ते सिकुड़ते अखंड भारत से इंडिया हो गए हैं.
यदि 1958 में भारत ने ग्वादर ले लिया होता, तो हो सकता था, की 1965 का भारत पाकिस्तान का युद्ध ही नहीं होता.
आपको पता होगा, 1965 का युद्ध हुआ ही इसलिए था, की पाकिस्तान को लगता था, की यह लड़ाई कभी भी इंटरनेशनल बॉर्डर पर नहीं फैलेगी, बल्कि बनिया भारत जम्मू कश्मीर पर हुए हमले का जवाब जम्मू कश्मीर में ही देता रहेगा, और पाकिस्तान कुछ ही दिनों में भारत से जम्मू कश्मीर पूरा का पूरा छीन लेगा.
यदि 1958 में भारत ने ग्वादर का फ्रंट खोल दिया होता, तो भारत बनियो का देश है, यह पाकिस्तानी भ्रम 1965
की बजाय 1958 में ही टूट जाता.
बात साफ़ है, इतिहास का रुख बदला जा सकता था, यदि भारत ग्वादर खरीद लेता.
आप तो समझदार है, ग्वादर पोर्ट पर भारत के बैठने मात्र से बिना कुछ किये ही बलोचिस्तान की आजादी के संगर्ष को कितना बल मिलता.
ग्वादर के आकाश में भारत के लड़ाकू विमान उड़ने मात्र से बलोचिस्तान की जमीं पर दमन चक्र चलाने वाली पाकिस्तान की सेना के पाँव कांपने लगते
आज चाबहार पोर्ट की 10 15 सालों की लीज के लिए भारत को ईरान के चक्कर लगाने की जरूरत ही क्या पड़ती?
हमारे पास हमेसा के लिए ग्वादर पोर्ट होता, और अगर बलोचिस्तान आजाद भी ना होता, तो भारत ईरान से होकर पुरे सेंट्रल एशिया तक व्यापर कर सकता था.
ग्वादर पोर्ट के भारत के पास होने से अफ़ग़ानिस्तान का भविस्य बदला जा सकता था.
चीन पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर कभी असित्व में ही नहीं आता, इसके जवाब में विद्वान लोग कहते हैं, की यदि ग्वादर भारत के पास होता, तो चीन पाकिस्तान से कराची बंदरगाह ले लेता.
लेकिन यह विद्वान लोग इतना नहीं सोचते, की ग्वादर पोर्ट पर भारतीय नौ सेना होने के बाद कराची पोर्ट को अपना नेवल बेस बनाकर चीन क्या खास कर लेता. उसकी हर हरकत पर भारत की नजर होती, और भारत कराची को कभी भी ब्लॉक कर सकता था.
और ये विद्वान लोग यह कैसे समझ लेते हैं, की पाकिस्तान पागल है. वह कैसे अपने सबसे कीमती कराची पोर्ट को चीन को दे देता. अरे भाई, पाकिस्तान के लोग भी रोटी खाते हैं. वह इतने बड़े बेवक़ूफ़ नहीं है, जितना हमारे विद्वान उसे समझते हैं.
एक अन्य तर्क यह दिया जाता है, की ओमान के पाकिस्तान के साथ अच्छे सम्बन्ध थे, इसलिए वह ग्वादर पाकिस्तान को ही बेचता.
लेकिन जैसा की हमने शुरू में चर्चा करि थी, ग्वादर कलात ने ओमान को दिया था, ना की पाकिस्तान ने. तो भी फ्री की चीज़ को दो सौ साल के बाद लौटाने के लिए ओमान ने 3 मिलियन डॉलर लिए. इससे सिद्ध हो जाता है, की पाकिस्तान और ओमान के बीच सम्बन्ध कितने अच्छे थे.
यह पूरी तरह से एक कमर्शियल transaction था. जो पैसे अच्छे देता, ग्वादर उसका होता.
ग्वादर पोर्ट ओमान भारत को बेचना चाहता था, या गिफ्ट देना चाहता था, अगर यह सिद्ध नहीं हो सकता है. तो यह भी सिद्ध नहीं हो सकता है, की नेहरू सर्कार ने ओमान से ग्वादर खरीदने की कोसिस करि, और ओमान ने यह कह दिया, की भले ही भारत 6 मिलियन डॉलर दे, वह ग्वादर तो अपने प्यारे दोस्त पाकिस्तान को ही 3 मिलियन डॉलर में बेच कर दम लेगा.
जहाँ तक हम समझ सकते हैं, भले ही ओमान ने भारत को ग्वादर ऑफर ना किया हो, फिर भी ग्वादर पोर्ट पर किसी ना किसी प्रकार से अधिकार करने की कोसिस भारत सर्कार को उस समय करनी चाहिए थी. और उसके बाद इतिहास कौन सी करवट लेता, यह भी समय को तय करने दिया जाता, तो अच्छा होता.
बात साफ़ है, बिना कुछ किये हार मान लेने से अच्छा होता है, कुछ करके हार जाना.
आपके अनुसार क्या भारत सरकार ने ओमान से ग्वादर खरीदने की कोसिस ना करके, सही किया, या गलत? नीचे कमेंट सेक्शन में लिख कर हमें जरूर बताएं.
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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