J&K समेत आठ राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक है या नहीं??
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Reference
आप सभी दर्शको को हमारा नमस्कार, चलिए आज के रोचक रियल क्विक एनालिसिस की चर्चा करते हैं.
पिछले कुछ दिनों से सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ जो विरोध चल रहा है, वह डर फैलाओ अभियान यानि की फियर प्रोजेक्ट का ही एक हिस्सा है.
यहाँ तक की जैसे सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल पास हुआ, तो उसके बाद की सुबह Indian express अख़बार में एक ओपिनियन छपा, जिसमे कहा गया था, की यह बिल संविधान का उल्लंघन करता है, या नहीं, इसके निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोषा करना एक गलती होगी.
बेहतर होगा, कानून के बहार राजनैतिक और विचारधारा के आधार पर इस एक्ट का विरोध किया जाये. आप को इस ओपिनियन की लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगी.
हम बात यह कहना चाह रहे हैं, की जब हमारे लिबरल एक्सपर्ट्स को ऐसा लगता है, की सुप्रीम कोर्ट उनके मन के मुताबिक फैसला नहीं सुनाएंगे, तो संविधान में विश्वास रखने वाले इन एक्सपर्ट्स का सबसे पहले भरोसा संविधान से ही उठता है.
जब फैसला इनके एजेंडा को सूट करे, तभी सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष और न्यायप्रिय होगा.
इसी बैक ग्राउंड में अब हम बात करते हैं, सुप्रीम कोर्ट के हाल के निर्णय की, जिसमे साफ कर दिया गया, की यदि भारत में माइनॉरिटी कौन है, इसका निर्णय करना है, तो statewise पॉपुलेशन पर ध्यान ना देते हुए, पूरी देश की जनसंख्या पर ध्यान देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार तब सुनाये, जब उनके सामने PIL के माद्यम से ऐसा केस खड़ा किया गया, की वर्ष 1992 के National Commission for Minority एक्ट के अनुसार वर्ष 1993 में जारी किया गया नोटिफिकेशन असंवैधानिक करार दिया जाये, इस नोटिफिकेशन के आधार पर देश भर की जन संख्या को ध्यान में रखते हुए, Muslims, Christians, Sikhs, Buddhists और पर्सिस को माइनॉरिटी स्टेटस दिया गया था .
इसिलए माइनॉरिटी के लिए चलाई जा रही सर्कार की योजनाओ का लाभ केवल इन्ही धर्मो को मिलता है. जबकि कुछ राज्यों में हिन्दू माइनॉरिटी में हैं, तो उनको इन योजनाओ का लाभ नहीं मिलता है. इसलिए भारत सर्कार का 1993 का नोटिफिकेशन सही नहीं है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट से ऐसी गाइडलाइन्स बनाने का अनुरोध किया गया, ताकि राज्य वार जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए, यह निर्णय किया जाये, की उस राज्य में कौन माइनॉरिटी और कौन मेजोरिटी है.
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सर्कार ने इस पेटिशन का समर्थन नहीं किया, लेकिन केंद्र सर्कार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने साफ़ कर दिया, की वर्ष 2011 की जन संख्या के आधार पर जम्मू कश्मीर समेत भारत के आठ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशो में हिन्दू अल्पमत में हैं.
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनकर सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया, की राज्यों का निर्माण भासाई आधार पर जरूर किया गया है. लेकिन धर्म को राज्यों की दिवार में बांधा नहीं जा सकता है. इसलिए कौन माइनॉरिटी है, इसका निर्णय करते समय पुरे देश की जनसंख्या को मद्दे नजर रखना चाहिए.
और इस प्रकार पेटिशन को सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत निरस्त कर दिया.
यहाँ पर ध्यान रखना जरूरी है, की सांप्रदायिक कही जाने वाली सर्कार ने इस पेटिशन का सुप्रीम कोर्ट में पक्ष नहीं लिया, और सर्कार से डरने वाले पक्षपाती कहे जाने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी मेजोरिटी समुदाय के तुस्टीकरण की कोसिस नहीं की.
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से जबकि आठ राज्यों में रहने वाले minority हिन्दू समुदाय को हानि हो रही है, फिर भी सायद ही इसका विरोध हमें सडको पर देखने को मिले.
लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, की सुप्रीम कोर्ट ने इस पेटिशन को रिजेक्ट करते समय यह भी साफ कर दिया, की कोर्ट किस भी समुदाय को माइनॉरिटी declare नहीं करता है, यह तो सर्कार का काम होता है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस सन्दर्भ में कोई guideline जारी नहीं करि , और जिम्मेदारी सर्कार पर डाल दी, की यह उसका काम है, की वह किस आधार पर किसे माइनॉरिटी घोसित करता है.
जबकि सुप्रीम कोर्ट ने आठ राज्यों में हिन्दुओ को माइनॉरिटी घोसित करने का रास्ता एक तरह से खोल सा दिया है, लेकिन इसके लिए गवर्नमेंट को कानूनी बदलाव करना होगा.
भविस्य में केंद्र सर्कार राज्य की जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए, हर राज्य को अपनी माइनॉरिटी decide करने का अधिकार देती है, या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.
चूँकि केंद्र सर्कार ने इस पेटिशन का सुप्रीम कोर्ट में अभी समर्थन नहीं किया है, हम यह अनुमान लगा सकते हैं, की केंद्र सर्कार हाल फिलहाल देश भर की जनसंख्या के आधार पर ही माइनॉरिटी कौन है, इसका निर्णय करने में विस्वास रखती है.
लेकिन बड़ा सवाल यहाँ पर यह है, की लिबरल विद्वानों के मापदंडो के अनुसार इस पेटिशन को रिजेक्ट करने के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट का इंडिपेंडेंट चरित्र साबित हो जाता है? मोदी सर्कार सेक्युलर है, क्या यह सिद्ध नहीं होता है?
दुर्भाग्य की बात यह है, की विद्वानों के झूट और पाखंड को उजागर करने वाले इस पुरे मामले को ऐस दवा दिया जायेगा, की जैसे कुछ हुआ ही न हो.
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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पिछले कुछ दिनों से सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ जो विरोध चल रहा है, वह डर फैलाओ अभियान यानि की फियर प्रोजेक्ट का ही एक हिस्सा है.
यहाँ तक की जैसे सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल पास हुआ, तो उसके बाद की सुबह Indian express अख़बार में एक ओपिनियन छपा, जिसमे कहा गया था, की यह बिल संविधान का उल्लंघन करता है, या नहीं, इसके निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोषा करना एक गलती होगी.
बेहतर होगा, कानून के बहार राजनैतिक और विचारधारा के आधार पर इस एक्ट का विरोध किया जाये. आप को इस ओपिनियन की लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगी.
हम बात यह कहना चाह रहे हैं, की जब हमारे लिबरल एक्सपर्ट्स को ऐसा लगता है, की सुप्रीम कोर्ट उनके मन के मुताबिक फैसला नहीं सुनाएंगे, तो संविधान में विश्वास रखने वाले इन एक्सपर्ट्स का सबसे पहले भरोसा संविधान से ही उठता है.
जब फैसला इनके एजेंडा को सूट करे, तभी सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष और न्यायप्रिय होगा.
इसी बैक ग्राउंड में अब हम बात करते हैं, सुप्रीम कोर्ट के हाल के निर्णय की, जिसमे साफ कर दिया गया, की यदि भारत में माइनॉरिटी कौन है, इसका निर्णय करना है, तो statewise पॉपुलेशन पर ध्यान ना देते हुए, पूरी देश की जनसंख्या पर ध्यान देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार तब सुनाये, जब उनके सामने PIL के माद्यम से ऐसा केस खड़ा किया गया, की वर्ष 1992 के National Commission for Minority एक्ट के अनुसार वर्ष 1993 में जारी किया गया नोटिफिकेशन असंवैधानिक करार दिया जाये, इस नोटिफिकेशन के आधार पर देश भर की जन संख्या को ध्यान में रखते हुए, Muslims, Christians, Sikhs, Buddhists और पर्सिस को माइनॉरिटी स्टेटस दिया गया था .
इसिलए माइनॉरिटी के लिए चलाई जा रही सर्कार की योजनाओ का लाभ केवल इन्ही धर्मो को मिलता है. जबकि कुछ राज्यों में हिन्दू माइनॉरिटी में हैं, तो उनको इन योजनाओ का लाभ नहीं मिलता है. इसलिए भारत सर्कार का 1993 का नोटिफिकेशन सही नहीं है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट से ऐसी गाइडलाइन्स बनाने का अनुरोध किया गया, ताकि राज्य वार जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए, यह निर्णय किया जाये, की उस राज्य में कौन माइनॉरिटी और कौन मेजोरिटी है.
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सर्कार ने इस पेटिशन का समर्थन नहीं किया, लेकिन केंद्र सर्कार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने साफ़ कर दिया, की वर्ष 2011 की जन संख्या के आधार पर जम्मू कश्मीर समेत भारत के आठ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशो में हिन्दू अल्पमत में हैं.
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनकर सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया, की राज्यों का निर्माण भासाई आधार पर जरूर किया गया है. लेकिन धर्म को राज्यों की दिवार में बांधा नहीं जा सकता है. इसलिए कौन माइनॉरिटी है, इसका निर्णय करते समय पुरे देश की जनसंख्या को मद्दे नजर रखना चाहिए.
और इस प्रकार पेटिशन को सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत निरस्त कर दिया.
यहाँ पर ध्यान रखना जरूरी है, की सांप्रदायिक कही जाने वाली सर्कार ने इस पेटिशन का सुप्रीम कोर्ट में पक्ष नहीं लिया, और सर्कार से डरने वाले पक्षपाती कहे जाने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी मेजोरिटी समुदाय के तुस्टीकरण की कोसिस नहीं की.
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से जबकि आठ राज्यों में रहने वाले minority हिन्दू समुदाय को हानि हो रही है, फिर भी सायद ही इसका विरोध हमें सडको पर देखने को मिले.
लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, की सुप्रीम कोर्ट ने इस पेटिशन को रिजेक्ट करते समय यह भी साफ कर दिया, की कोर्ट किस भी समुदाय को माइनॉरिटी declare नहीं करता है, यह तो सर्कार का काम होता है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस सन्दर्भ में कोई guideline जारी नहीं करि , और जिम्मेदारी सर्कार पर डाल दी, की यह उसका काम है, की वह किस आधार पर किसे माइनॉरिटी घोसित करता है.
जबकि सुप्रीम कोर्ट ने आठ राज्यों में हिन्दुओ को माइनॉरिटी घोसित करने का रास्ता एक तरह से खोल सा दिया है, लेकिन इसके लिए गवर्नमेंट को कानूनी बदलाव करना होगा.
भविस्य में केंद्र सर्कार राज्य की जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए, हर राज्य को अपनी माइनॉरिटी decide करने का अधिकार देती है, या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.
चूँकि केंद्र सर्कार ने इस पेटिशन का सुप्रीम कोर्ट में अभी समर्थन नहीं किया है, हम यह अनुमान लगा सकते हैं, की केंद्र सर्कार हाल फिलहाल देश भर की जनसंख्या के आधार पर ही माइनॉरिटी कौन है, इसका निर्णय करने में विस्वास रखती है.
लेकिन बड़ा सवाल यहाँ पर यह है, की लिबरल विद्वानों के मापदंडो के अनुसार इस पेटिशन को रिजेक्ट करने के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट का इंडिपेंडेंट चरित्र साबित हो जाता है? मोदी सर्कार सेक्युलर है, क्या यह सिद्ध नहीं होता है?
दुर्भाग्य की बात यह है, की विद्वानों के झूट और पाखंड को उजागर करने वाले इस पुरे मामले को ऐस दवा दिया जायेगा, की जैसे कुछ हुआ ही न हो.
और इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद
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