ट्रम्प ने किया ऐलान,अमेरिका करने वाला ईरान के 52 Targets पर अटैक
पाकिस्तान ने दिया अपने भाई ईरान को धोखा
भारत को इस तनाव से होना भारी लाभ??
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Reference -
जैसा की अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है.
आज सुबह हमें पता चला, की प्रेजिडेंट ट्रम्प ने ट्विटर पर ऐलान किया, की यदि तेहरान ने अमेरिका पर हमला किया, तो अमेरिका तुरंत पूरी तागत से ईरान को जवाब देगा.
और ईरान पर जवाबी कारवाही करने के लिए अमेरिका ने 52 ईरानियन Targets की लिस्ट भी बना ली है. 52 symbolic नंबर तय इसलिए किया गया है, क्योकि वर्ष 1979 में अमेरिका के 52 दूतावास अधिकारीयों और कर्मचारियों को तेहरान में स्तिथ US एम्बेसी में बंदी बना लिया गया था.
यहाँ पर पूरी चर्चा इसी बात पर केंद्रित है, की ट्रम्प ने 52 टारगेट की लिस्ट में ईरानियन कल्चरल साइट्स को शामिल करके युद्ध लड़ने के नियमो को उल्लंघन करते हुए कितना बड़ा गुनाह कर दिया है.
लेकिन यहाँ पर बड़ा सवाल यह है, की अमेरिका को ईरानियन टार्गेट्स का नंबर क्यों बताना पड़ गया?
इसका जवाब सिंपल है, पहले ईरान ने कल सुबह धमकी दी थी, की इसरायली तेल अवीव, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज और पर्शियन गल्फ में तैनात 35 अमेरिकी एसेट्स को ईरान ने टारगेट बना लिया है.
इसलिए सुलेमानी घटनाक्रम के बाद ईरान जब 35 अमेरिकी टारगेट पर निशाना बनाये हुए है, तो ईरानियन अटैक की कीमत को समझाने की कोसिस करि गयी है, की 35 अमेरिकी टारगेट पर हमले का जवाब ईरान के 52 टारगेट पर अटैक करके दिया जायेगा.
लेकिन बात यहाँ पर साफ़ है, जमीं पर कुछ करने के बजाय हवाई धमकियाँ देकर अभी केवल परसेप्शन मैनेजमेंट किया जा रहा है.
अब ईरान कब अमेरिका के 35 टार्गेट्स पर हमला करेगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन ईरान ने कॉम सिटी में स्थित जामकरण मस्जिद पर लाल झंडा फहरा दिया है, जिसका मतलब होता है, की बड़ी लड़ाई या तो चालू हो गयी है, अथवा चालू होने वाली है.
इसलिए यह तो साफ़ दिखाई दे रहा है, की ईरान अमेरिका की सुलेमानी कारवाही का जवाब देगा, लेकिन देखने वाली बात होगी, की जवाबी कारवाही करते समय, ईरान अनुपात का ख्याल रखता है, या नहीं.
चूँकि गेंद ईरान के पाले में है, अब ईरान को तय करना है, की वह ईंट का जवाब ईंट से देगा या पत्थर से.
साथ में यह भी हो सकता है, की अमेरिका की ईंट का जवाब ईरान अपनी घरेलु जनता को लॉलीपॉप देकर भी करे. क्योकि अमेरिका के खिलाफ कारवाही करने से ज्यादा जरूरी है, की ईरान अपने देश की जनता और दुनिया को यह सन्देश दे, की अमेरिका का उसने मुँह तोड़ दिया है. यहाँ पर मैसेज की इम्पोर्टेंस एक्चुअल reaction से ज्यादा है.
इसलिए देखना होगा, की ईरान कही बालाकोट air strike के जवाब में पाकिस्तान की भारत के खिलाफ लॉलीपॉप स्ट्राइक की तरह अमेरिका के खिलाफ भी कोई मिलती जुलती लॉलीपॉप स्ट्राइक करने का आसान और रिस्क फ्री ऑप्शन न चुन ले.
लेकिन जबकि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव किस करवट को लेगा, यह देखना वाकी है, लेकिन हमारे देश में एक्सपर्ट लोगों ने चीजों को मिलाना चालू कर दिया है.
सबसे पहले तो यह कहा जा रहा है, की यदि अमेरिका ईरान को सुलेमानी सजा दे सकता है, तो अमेरिका पाकिस्तान के Generals को ऐसी ही कोई सजा क्यों नहीं देता है?
भारत की लड़ाई पाकिस्तान से अमेरिका भला क्यों लड़ेगा? अगर भारत ने पाकिस्तान को दंड देना है, तो इसके लिए लाठी भी भारत को चलानी होगी.
अमेरिका अपनी लड़ाई लड़े, और भारत अपनी लड़ाई लड़ सकता है.
हमारा तो साफ़ तौर पर मानना है, की अमेरिका ने बग़दाद में जो लकीर खींची है, भारत ने पाकिस्तान में उससे बड़ी लकीर जल्द खींचना चाहिए.
और इसी बीच कुछ एक्सपर्ट यह भी दिखाने की कोसिस कर रहे है, की पाकिस्तान कितना स्मार्ट देश है.
सुलेमानी का अंत करने के बाद अमेरिका के विदेश सचिव ने पाकिस्तान के भगवान् बाजवा से बात करि. और फिर पाकिस्तान ने अमेरिका से डील कर ली.
लेकिन बड़ा सवाल कोई नहीं कर रहा है, की पाकिस्तान ने बार बार ईरान को अपना पडोसी नहीं बल्कि भाई बताया है.
तो जब एक भाई अमेरिका के साथ लड़ने जा रहा है, तो दूसरा भाई कैसे हाथों में चूड़ियां पहन सकता है.
इस पुरे एपिसोड में हमने पाकिस्तान के झूट और पाखंड को उजागर करने का मौका गवाकर, पाकिस्तान की प्रशंसा करना चालू कर दी, की पाकिस्तान कितने अच्छे से डील कर लेता है.
पिछले महीने की मलेशिया समिट अभी कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब पाकिस्तान ने टर्की और मलेशिया के सपनो का इस्तेमाल करके सऊदी अरब और UAE के साथ डील कर ली थी.
सायद इसलिए पाकिस्तान से मदद मांगने के बजाये, ईरान ने टर्की की राष्ट्रपति से संपर्क किया, और अपेक्षा करि, की खाड़ी के देशो ने अमेरिका की खिलाफ एक जुट होना होगा, नहीं तो इसका खामियाज़ा सबको उठाना पड़ेगा.
टर्की और ईरान की बीच सम्बन्ध हमेसा से कोई ज्याद अच्छे तो नहीं रहे हैं, लेकिन मलेशिया समिट में ईरान ने भाग लिया था, इसलिए देखने वाली बात होगी, की टर्की का ऊंट किस करवट बैठता है.
अभी तो अमेरिका की खिलाफ सबसे कड़ी प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप रूस और चीन से आयी है, इसलिए यह देखना रोचक होगा, क्या ईरान के समर्थन में रूस चीन और टर्की उतरते हैं, या केवल बातों से ही काम चलाते रहते हैं.
लेकिन इस पुरे विवाद में ट्रम्प टर्की को या तो अपने पक्ष में करने की या शांत रखने की कोसिस कर रहे हैं. इसलिए देखना होगा, कौन अपनी रणनीति में कितना कामयाब होता है.
जहाँ तक भारत का सवाल है, इस पुरे विवाद में हमें अपने आदर्शों की तुलना में अपने स्वार्थों को ऊपर रखना होगा, और उसी की अनुसार अपने निर्णय का चुनाव करना होगा.
ईरान और अमेरिका की बीच आग ना भड़के, इसमें हम जितना कंट्रीब्यूट कर सकें, हमें करना चाहिए. लेकिन इस आग में कूदने की जरूरत तो हमें नहीं है.
ईरान और अमेरिका की बीच बढ़ रहे तनाव से तेल की कीमतें बढ़ जाएगी, अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा, भारत को ये नुकसान हो जायेगा, वह नुकसान हो जायेगा, यह सब कैलकुलेट करने के बजाये.
हमारी सर्कार ऐसे काम करेगी, की लॉन्ग टर्म की दृस्टि से भारत को होने वाले लाभ को कैसे बढ़ाया जाये, इसी उम्मीद और विस्वास की साथ हम यह वीडियो समाप्त करते हैं.
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और ईरान पर जवाबी कारवाही करने के लिए अमेरिका ने 52 ईरानियन Targets की लिस्ट भी बना ली है. 52 symbolic नंबर तय इसलिए किया गया है, क्योकि वर्ष 1979 में अमेरिका के 52 दूतावास अधिकारीयों और कर्मचारियों को तेहरान में स्तिथ US एम्बेसी में बंदी बना लिया गया था.
यहाँ पर पूरी चर्चा इसी बात पर केंद्रित है, की ट्रम्प ने 52 टारगेट की लिस्ट में ईरानियन कल्चरल साइट्स को शामिल करके युद्ध लड़ने के नियमो को उल्लंघन करते हुए कितना बड़ा गुनाह कर दिया है.
लेकिन यहाँ पर बड़ा सवाल यह है, की अमेरिका को ईरानियन टार्गेट्स का नंबर क्यों बताना पड़ गया?
इसका जवाब सिंपल है, पहले ईरान ने कल सुबह धमकी दी थी, की इसरायली तेल अवीव, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज और पर्शियन गल्फ में तैनात 35 अमेरिकी एसेट्स को ईरान ने टारगेट बना लिया है.
इसलिए सुलेमानी घटनाक्रम के बाद ईरान जब 35 अमेरिकी टारगेट पर निशाना बनाये हुए है, तो ईरानियन अटैक की कीमत को समझाने की कोसिस करि गयी है, की 35 अमेरिकी टारगेट पर हमले का जवाब ईरान के 52 टारगेट पर अटैक करके दिया जायेगा.
लेकिन बात यहाँ पर साफ़ है, जमीं पर कुछ करने के बजाय हवाई धमकियाँ देकर अभी केवल परसेप्शन मैनेजमेंट किया जा रहा है.
अब ईरान कब अमेरिका के 35 टार्गेट्स पर हमला करेगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन ईरान ने कॉम सिटी में स्थित जामकरण मस्जिद पर लाल झंडा फहरा दिया है, जिसका मतलब होता है, की बड़ी लड़ाई या तो चालू हो गयी है, अथवा चालू होने वाली है.
इसलिए यह तो साफ़ दिखाई दे रहा है, की ईरान अमेरिका की सुलेमानी कारवाही का जवाब देगा, लेकिन देखने वाली बात होगी, की जवाबी कारवाही करते समय, ईरान अनुपात का ख्याल रखता है, या नहीं.
चूँकि गेंद ईरान के पाले में है, अब ईरान को तय करना है, की वह ईंट का जवाब ईंट से देगा या पत्थर से.
साथ में यह भी हो सकता है, की अमेरिका की ईंट का जवाब ईरान अपनी घरेलु जनता को लॉलीपॉप देकर भी करे. क्योकि अमेरिका के खिलाफ कारवाही करने से ज्यादा जरूरी है, की ईरान अपने देश की जनता और दुनिया को यह सन्देश दे, की अमेरिका का उसने मुँह तोड़ दिया है. यहाँ पर मैसेज की इम्पोर्टेंस एक्चुअल reaction से ज्यादा है.
इसलिए देखना होगा, की ईरान कही बालाकोट air strike के जवाब में पाकिस्तान की भारत के खिलाफ लॉलीपॉप स्ट्राइक की तरह अमेरिका के खिलाफ भी कोई मिलती जुलती लॉलीपॉप स्ट्राइक करने का आसान और रिस्क फ्री ऑप्शन न चुन ले.
लेकिन जबकि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव किस करवट को लेगा, यह देखना वाकी है, लेकिन हमारे देश में एक्सपर्ट लोगों ने चीजों को मिलाना चालू कर दिया है.
सबसे पहले तो यह कहा जा रहा है, की यदि अमेरिका ईरान को सुलेमानी सजा दे सकता है, तो अमेरिका पाकिस्तान के Generals को ऐसी ही कोई सजा क्यों नहीं देता है?
भारत की लड़ाई पाकिस्तान से अमेरिका भला क्यों लड़ेगा? अगर भारत ने पाकिस्तान को दंड देना है, तो इसके लिए लाठी भी भारत को चलानी होगी.
अमेरिका अपनी लड़ाई लड़े, और भारत अपनी लड़ाई लड़ सकता है.
हमारा तो साफ़ तौर पर मानना है, की अमेरिका ने बग़दाद में जो लकीर खींची है, भारत ने पाकिस्तान में उससे बड़ी लकीर जल्द खींचना चाहिए.
और इसी बीच कुछ एक्सपर्ट यह भी दिखाने की कोसिस कर रहे है, की पाकिस्तान कितना स्मार्ट देश है.
सुलेमानी का अंत करने के बाद अमेरिका के विदेश सचिव ने पाकिस्तान के भगवान् बाजवा से बात करि. और फिर पाकिस्तान ने अमेरिका से डील कर ली.
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पिछले महीने की मलेशिया समिट अभी कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब पाकिस्तान ने टर्की और मलेशिया के सपनो का इस्तेमाल करके सऊदी अरब और UAE के साथ डील कर ली थी.
सायद इसलिए पाकिस्तान से मदद मांगने के बजाये, ईरान ने टर्की की राष्ट्रपति से संपर्क किया, और अपेक्षा करि, की खाड़ी के देशो ने अमेरिका की खिलाफ एक जुट होना होगा, नहीं तो इसका खामियाज़ा सबको उठाना पड़ेगा.
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अभी तो अमेरिका की खिलाफ सबसे कड़ी प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप रूस और चीन से आयी है, इसलिए यह देखना रोचक होगा, क्या ईरान के समर्थन में रूस चीन और टर्की उतरते हैं, या केवल बातों से ही काम चलाते रहते हैं.
लेकिन इस पुरे विवाद में ट्रम्प टर्की को या तो अपने पक्ष में करने की या शांत रखने की कोसिस कर रहे हैं. इसलिए देखना होगा, कौन अपनी रणनीति में कितना कामयाब होता है.
जहाँ तक भारत का सवाल है, इस पुरे विवाद में हमें अपने आदर्शों की तुलना में अपने स्वार्थों को ऊपर रखना होगा, और उसी की अनुसार अपने निर्णय का चुनाव करना होगा.
ईरान और अमेरिका की बीच आग ना भड़के, इसमें हम जितना कंट्रीब्यूट कर सकें, हमें करना चाहिए. लेकिन इस आग में कूदने की जरूरत तो हमें नहीं है.
ईरान और अमेरिका की बीच बढ़ रहे तनाव से तेल की कीमतें बढ़ जाएगी, अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा, भारत को ये नुकसान हो जायेगा, वह नुकसान हो जायेगा, यह सब कैलकुलेट करने के बजाये.
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