ईरान अमेरिका बढ़ते तनाव के बीच,भारत अमेरिका मेगा ट्रेड डील करेंगे!!
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https://www.indiatoday.in/world/story/trump-administration-approves-resumption-of-military-training-programme-for-pakistan-1630232-2019-12-20
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बहुत से सम्मानीय दर्शको का कहना है, की 4 जनवरी को अमेरिका ने पाकिस्तान को 2 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता दे दी है.
हमें नहीं पता, की यह अफवाह कौन उड़ा रहा है, लेकिन यदि आप खुद हल्का सा गूगल सर्च करें, तो आप पाएंगे, की कल अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने केवल पाकिस्तान के लिए मिलिट्री एजुकेशन एंड ट्रेनिंग प्रोग्राम को फिर से अनुमति दी है.
यह मिलिट्री ट्रेनिंग 2 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसे जनवरी 2018 में राष्ट्रपति ट्रम्प ने रोका था.
यहाँ तक की जब 2018 में यह रोक लगायी गयी थी, तभी अमेरिका ने रोक के नियमो में ही यह व्यवस्था करि थी, की मौका पड़ने पर इस पैकेज के अंतर्गत मिलिट्री ट्रेनिंग का झुनझुना बालक पाकिस्तान को बाद में पकड़ाया जा सकता है.
अभी भी पाकिस्तान के अखवार डॉन के अनुसार 2 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता के अधिकतर पैकेज पर रोक लगी हुई है, केवल अमेरिका पाकिस्तान की सेना को मिलिट्री ट्रेनिंग देना चालू कर रहा है.
और इस पुरे घटनाक्रम को ईरान अमेरिका के बीच की टेंशन से जोड़कर भी देखना सही नहीं होगा, क्योकि New यॉर्क टाइम्स की 19 दिसंबर की खबर में यह साफ लिखा था, की अमेरिका ने पाकिस्तान को मिलिट्री ट्रेनिंग देना चालू करने का निर्णय ले लिया है.
इसलिए इस अमेरिकन निर्णय का ईरान से कोई लेना देना नहीं है. इसका सिर्फ सम्बन्ध अफ़ग़ान पीस टॉक से है. और इस सुविधा के बदले में अमेरिका को अपेक्षा है, की पाकिस्तान उसे अफ़ग़ानिस्तान से मुँह छुपाकर भागने के लिए रास्ता खोलेगा.
पाकिस्तान पूरा का पूरा 22 वा IMF बेलआउट डकार गया, और अब उसकी हालत भी सुधरने लगी है. लेकिन अमेरिका आज भी अफ़ग़ानिस्तान बेलआउट के लिए तरस रहा है.
यदि अमेरिका को लगता है, की मिलिट्री ट्रैनिंग की गाजर खाके, पाकिस्तान उसकी राह अब आसान कर देगा, तो उसे हमारी तरफ से गुड लक.
पाकिस्तान अमेरिका के बीच के आपसी सम्बन्धो पर नजर बनाये रखना जरूरी है, लेकिन अफवाहों पर विस्वास करके चिंता करना भी सही नहीं है.
इसलिए पाकिस्तान ने ये डील कर ली, वह डील कर ली, इस बारे में तुरंत विस्वास करने से हम सभी को बचने की कोसिस करनी चाहिए.
आगे बढ़ते हुए, हमारे कुछ दर्शको का यह कहना था, की अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बढ़ने से भारत के चाबहार प्रोजेक्ट पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.
यह बात तो सही है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए, की चाबहार पोर्ट पर काम भी इसलिए चल रहा है, क्योकि Trump सर्कार ने इस बंदरगाह को अमेरिकन सैंक्शंस से ढिलाई दी हुई है.
और अभी कुछ ही दिनों पहले भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका से लिखित में गारंटी ली थी, जिसे दिखाने पर ही बैंक चाबहार पोर्ट के लिए डॉलर में ट्रांसक्शन करने को तैयार हुए थे.
इसलिए अमेरिका चाबहार पोर्ट का महत्व समझता है, चाबहार पोर्ट पर कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं, इसका निर्णय तो ईरान ने करना है.
अमेरिका ने जो बग़दाद में कारवाही करि, उसका ईरान कैसे जवाब देता है, उसी से आगे के घटनाक्रम का निर्धारण होगा.
आप सभी को पता है, ना तो ईरान और ना ही अमेरिका चाहता है, की आल out वॉर हो. इसलिए अमेरिका ईरान के बीच बढ़ते हुए तनाव की आंच चाबहार पोर्ट तक आएगी, यह अभी कहना थोड़ी सी जल्दवाजी होगी.
जहाँ तक अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ रही तनातनी से आयल के कीमतों में होने वाले इजाफे का सवाल है.
यह समझने के लिए हमें दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है. यह तो ऑब्वियस है.
आयल की कीमत में उछाल ना आये, और उसके मेरीटाइम ट्रांसपोर्ट में दिक्कत नहीं आये, यह दोनों विषय भारत के लिए चिंता का विषय है. लेकिन इस बारे में हम कुछ कर नहीं सकते हैं, क्योकि इस पुरे खेल में अभी गेंद हमारे पाले में है ही नहीं.
हाँ, हमारे लिए उचित कीमत पर पर्याप्त मात्रा में आयल सप्लाई करने की जिम्मेदारी अभी तो अमेरिका, सऊदी अरब ने ले रखी है, तो इन मामलों को सुलझाने की चिंता उन्हें करने देना चाहिए.
हम काहे फालतू की टेंशन ले रहे हैं, की आयल की कीमत बढ़ जाएगी, सप्लाई कम हो जाएगी.
अगर ऐसा हुआ भी तो मोदी साब का सिर्फ यही कहना काफी होगा, की भारत रुपये में ईरान से तेल खरीदना चालू करने की मजबूर होकर सोच रहा है, और अमेरिका और सऊदी अरब लाइन पर आने में देरी नहीं लगाएंगे.
इसलिए ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ रहे temporary तनाव के कारन हमें अपने लॉन्ग टर्म हितों के ऊपर से नजर नहीं हटानी चाहिए.
अच्छी बात यह है, की जब पूरी मीडिया का ध्यान इस विवाद में उलझ चूका है, तब भी भारत और अमेरिका ट्रेड को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने की कोसिस कर रहे हैं.
भारत के अमेरिका में पूर्व राजदूत और नए विदेश सचिव ने कल ही कहा है, की भारत और अमेरिका ट्रेड डील पैकेज को final करने के बहुत करीब आ गए हैं.
और भी महत्वपूर्ण बात यह है, की इस ट्रेड डील पैकेज के होने से दोनों देशो को एक दूसरे के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी.
हम सभी ने इंडिया अमेरिका के बीच ट्रेड डील का समर्थन किया था, यदि वह फ्री और फेयर हो.
इसलिए यदि अमेरिका भारत को सुविधाएँ देकर भारत से सुविधाएँ लेना चाहता है, तो हमें इस लेन देन में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए.
हमारे देश में बहुत से लोगों को अमेरिका को गलियां देने का शौक है. लेकिन समय की सच्चाई हमारे सामने है, अमेरिका को माल बेच बेच कर ही चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी तागत बन गया है.
कम्युनिस्ट चीन अमेरिका के साथ व्यापार करके धन्ना शेठ बन गया, तो ठीक है. लेकिन जब भारत अमेरिका के साथ व्यापार बढाने की कोसिस करता है, तो हमारे देश के लेफ्ट लिबरल एक्सपर्ट और नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगती है.
जो लोग नेहरू नाम की माला दिन रात जपते रहते हैं, वह समय मिलने पर हमें यह जरूर बताएं, की गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सबसे बड़े नेता ने 1962 की लड़ाई में चीन के हाथों भारत को हारता देख US एयरफोर्स से सपोर्ट की आश में अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने हाथ क्यों फैलाये थे?
गुटनिरपेक्षता का भूत तो इन लोगों के सर से उतर गया, लेकिन अमेरिका को गाली देने में इन्हे आज भी मजा आता है.
अमेरिका ने पाकिस्तान को मिलिट्री ट्रेनिंग दे दी, १ या २ बिलियन डॉलर की खैरात दे दी, हमारी चिंता का विषय यह होना चाहिए, अथवा चिंतन का विषय यह होना चाहिए, की अमेरिका और भारत के बीच 160 बिलियन डॉलर का व्यापार 500 बिलियन डॉलर के आंकड़े तक जल्दी से जल्दी कैसे ले जाया जाये.
आप अमेरिका से चाहे जितना नफरत करें, लेकिन डॉलर से आपको भी प्यार होगा. इसलिए भारत में रोजगार के अवसर पैदा करने और गरीबी को हटाने के लिए अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाना ही होगा.
अच्छी बात यह है, की मोदी सरकार के इस मामले में कांसेप्ट क्लियर हैं, इसलिए वह अमेरिका के साथ ट्रेड को बढाने की कोसिस कर रही है.
दुर्भाग्य यह है, की यदि अमेरिका और इंडिया के बीच ट्रेड डील की बातचीत पटरी से उतर गयी होती, तो हमारी मीडिया ने आज आसमान सर पर उठा लेना था, लेकिन अब जबकि इंडिया अमेरिका ट्रेड डील की गाडी अपने स्टेशन पर पहुंचने वाली है, तो इस बारे में चर्चा करने की जरूरत कोई नहीं समझता है.
उम्मीद है, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ रहे तनाव के बीच, मोदी सरकार अमेरिका से मोलभाव करके भारत के लिए बेहतर से बेहतर ट्रेड डील करने में जल्द से जल्द कामयाब होगी .
क्योकि ईरान के खिलाफ यदि भारत ने तटस्थ होने का निर्णय लिया है, तो अमेरिका से मोलभाव करने की हमारी छमता में भी इजाफा हुआ है. इसलिए मोदी सरकार इसी बार्गेनिंग पावर का लाभ उठाएगी, ऐसा हमें भरोषा है.
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