अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे - सर्वे हुआ पूरा, चालू हो रहा है कंस्ट्रक्शन
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https://www.sentinelassam.com/north-east-india-news/arunachal-news/arunachal-frontier-highway-work-to-start-soon-chowna-mein/
https://www.nagalandpost.com/arunachal-to-have-long-highway-along-india-china-border/209176.html
https://www.outlookindia.com/newsscroll/chinas-pla-begins-major-military-exercises-in-tibet/1701361
https://en.wikipedia.org/wiki/Arunachal_Frontier_Highway
https://www.thehindu.com/news/national/Army-comes-out-against-road-work-on-China-border/article14396908.ece
https://www.eastmojo.com/opinion/2019/08/10/good-arunachal-roads-key-to-prevent-indias-external-threat
https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/infrastructure/despite-chinese-concern-india-to-go-ahead-with-its-plan-of-construction-of-frontier-highway-in-arunachal-pradesh/articleshow/44868299.cms
https://m.facebook.com/KirenRijiju/posts/2121752717946487
https://timesofindia.indiatimes.com/india/china-may-deploy-aircraft-carrier-in-ior-says-navy-commander/articleshow/73113710.cms
https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/next-doklam-could-be-in-arunachal-warns-bjp-mp/articleshow/72137190.cms
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इस साल की शुरुआत में चीन कर रहा है, तिब्बत के ऊँचे इलाके में युद्धाभ्यास, जिसमे चीन ने पहली बार अपने टाइप 15 टैंक और 155 MM व्हीकल माउंटेड होवित्जर को तिब्बत में तैनात कर दिया.
पिछले साल अक्टूबर महीने में चीन ने इन दोनों हथयारों को दुनिया के सामने पेश किया था.
लेकिन अगर आप देखें, तो टाइप १५ दुनिया का एक मात्रा आधुनिक halka टैंक है, जिसमे 105 MM की गन लगी हुई है, और अत्याधुनिक सेंसर्स से लेस यह टैंक भारत के हलके वाहनों को आसानी से नस्ट कर सकता है.
इसी तरह 155 MM की होवित्जर गन भी बेहद हलकी है, आसानी से इसे डेप्लॉय किया जा सकता है, और यह तेजी से रियेक्ट भी कर सकती है.
इसलिए भारत यह गलत फहमी तो पाल नहीं सकता है, की चीन ने इन हथियारों को डिफेंसिव पोस्चर के लिए तिब्बत में डेप्लॉय किया है.
हमें पूरा विस्वास है, चीन तिब्बत में जो सैन्य अभ्यास कर रहा है, उस पर भारतीय सेना नजर बनाये हुए होगी. और चीन की हर घातक चाल को नाकाम करने के लिए भारतीय सेनाएं और सर्कार बेहतर रणनीति बनाएगी.
यहाँ तक की चीन भविस्य में कौन सी हरकत करेगा, इस बारे में इंडियन नेवी ना सिर्फ अंदाज़ लगा रही है, बल्कि उसके लिए अभी से तैयारी भी कर रही है.
चीन हिन्द महासागर में रिसर्च करने के लिए जहाज भेजता रहा है, पायरेसी से लड़ने के लिए उसने अपने जंगी जहाज और नुक्लेअर सबमरीन भी भेजना चालू कर दिया है.
अब इंडियन नेवी को लग रहा है, की वह दिन दूर नहीं है, जब चीन अपना एयरक्राफ्ट कॅरियर परमानेंटली इंडियन ocean में डेप्लॉय कर देगा. उस हालत से भारत कैसे निपटेगा यह देखने वाली बात होगी.
भारत के खिलाफ अपनी रणनीति पर एक ओर चीन पिछले 70 सालों से धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत ने 1962 की लड़ाई हारने के बाद यह निर्णय लिया, की वह अरुणाचल प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण नहीं करेगा, क्योकि अगर भारत ने ऐसा किया, तो भारत के द्वारा बनाये इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ चीन उठा ले जायेगा.
आप ही बताएं, क्या इससे भी ज्यादा नकारात्मक सोच कोई हो सकती है??
दुश्मन हमारी रोड का इस्तेमाल कर सकता है, इसलिए हम रोड ही नहीं बनाएंगे. वैसे इस लॉजिक से तो देश में कहीं भी किसी भी प्रकार की सड़क का निर्माण हमें कभी नहीं करना चाहिए.
1962 की लड़ाई हारने के बाद भी तब की एक ही परिवार की सरकार को यह बात समझ नही आयी, की यदि हम रोड बना लेंगे, तो दुश्मन हमें हरा ही नहीं पायेगा, तो फिर हमारी रोड के दुसमन के द्वारा उपयोग की बात ही कहाँ पर आती है.
हम यहाँ कोई अपने मन से बात नहीं बना रहे हैं, वर्ष 2003 में भारत के उप प्रधानमंत्री LK आडवाणी ने भारत सर्कार की इस ऐतिहासिक भूल के बारे में सबको बताया था.
कहीं चीन नाराज हो जायेगा, तो कहीं चीन हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग हमारे खिलाफ ही कर लेगा, इन्ही बहानो और बेवकूफी का नतीजा है, की सीमा वर्ती इलाको में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण आज तक नहीं हो पाया है.
वैसे कोई आश्चर्य नहीं है, यदि देश में शौचालय बनवाने का काम 72 सालों बाद पूरा किया गया, तो फिर सीमा वर्ती इलाको में सड़क बनवाने की बात तो बहुत दूर है.
आप सभी को पता है, अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत से अलग करने वाली मैक मोहन लाइन को चीन स्वीकार नहीं करता है, और अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत मानकर चीन उस पर दावा पेश करता रहा है.
अरुणाचल प्रदेश को अपना बताना चीन का राष्ट्रीय पागलपन है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है, और रहेगा. इसलिए सवाल उठता है, की भारत मानचित्र पर खींची मैक मोहन रेखा के समान्तर जमीं पर कोई रेखा क्यों नहीं खींच देता.
और इसी आईडिया से अस्तित्वा में आता है, २००० किलोमीटर लम्बा अरुणाचल फ्रंटियर हाई वे, जिस पर 40 हज़ार करोड़ की लागत आएगी.
स्वभाविक बात है, जब वर्ष 1914 की मैकमोहन लाइन को चीन आज तक स्वीकार नहीं कर पाया है, तो यह बात उसके गले कैसे उतरेगी, की भारत जमीं पर उसी मैक मोहन लाइन के समान्तर एक हाईवे बना दे.
जब वर्ष 2014 में भारत सरकार ने अरुणाचल फ्रंटियर हाई वे को बनाने का निर्णय लिया, तो चीन के कान खड़े हो गए. तो भारत ने साफ़ कर दिया था, की सीमा के अपनी तरफ भारत क्या कर रहा है, इससे चीन को परेशानी नहीं होनी चाहिए.
लेकिन फिर वर्ष 2016 में भारतीय सेना ने इस अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे के खिलाफ अपने विचार प्रकट किये, उनका कहना था, इस रोड का एलाइनमेंट सिक्योरिटी की दृस्टि से सही नहीं है. और इसका निर्माण हमारी स्ट्रेटेजिक भूल साबित हो सकता है.
लेकिन जब गवर्नमेंट के डिपार्टमेंट के बीच मतभेद पैदा हो गए, तो तब के गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने निर्णय लिया, की वह सभी डिपार्टमेंट की बैठक बुलाएँगे, ताकि मतभेद सुलझाए जा सके, क्योकि उस इलाके कनेक्टिविटी की सुविधा तो देनी ही होगी.
कहने की जरूरत नहीं है, यह प्रोजेक्ट स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे कठिन और सबसे बड़ा रोड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट होगा.
अच्छी बात यह है, की गवर्नमेंट के सारे डिपार्टमेंट सहमति पर पहुंचे, और अरुणाचल प्रदेश की उप मुख्यमंत्री ने हाल ही में अन्नोउंस किया है. की अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे को लेकर सर्वे और इन्वेस्टीगेशन का काम पूरा हो गया है.
अब जैसा की अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे के लिए सर्वे के बाद डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनकर तैयार हो गयी है, इसलिए जल्द से जल्द इस रोड प्रोजेक्ट पर काम चालू होने वाला है.
कहने की जरूरत नहीं है, इस सड़क प्रोजेक्ट से अरुणाचल प्रदेश के सीमा वर्ती इलाको में रोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी, और आगे जाकर टूरिज्म के विकास में भी मदद मिलेगी.
आप सभी को पता है, क्योकि चीन मैकमोहन लाइन को नहीं मानता है, इसलिए वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करने के लिए हमारी सीमा के अंदर घुसकर गस्त लगाता है.
इसलिए इस चीनी घुसपैठ के तमासे का the एन्ड करने के लिए जरूरी है, की अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे का निर्माण जल्द से जल्द पूरा किया जाये.
चीन ने तिब्बत की तरफ से मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने के लिए सीमा विवाद के सुलझने का इंतजार नहीं किया, तो हम अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे का निर्माण करने के लिए सीमा विवाद के सुलझने का बेवकूफी भरा इंतजार क्यों करें.
हाँ, जब इस फ्रंटियर हाईवे का निर्माण जमीं पर चालू होगा. तो चीन के पेट में चूहे दौड़ने जरूर चालू हो जायेंगे.
लेकिन जब भारत सरकार इतनी दूर आ गयी है, की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट ही बन गयी है, तो अब रोड का निर्माण कार्य चालू करवाने में साहस की कमी नहीं आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है.
जब चीन तिब्बत में रोड बना रहा था, तो भारतीय सेना उसे चुपचाप देखा करती थी, अब समय आ गया है, की भारत भी PLA को उसी की खुराक खिला दे.
लेकिन इस फ्रंटियर हाईवे का काम चालू होने पर चीन की हर नापाक हरकत से निपटने के लिए हमें तैयार रहना होगा.
जहाँ तक भारत की आतंरिकराजनीती का सवाल है, बातें और बहाने कुछ भी हों, जब कम्युनिस्ट चीन के हितों को नुकसान पहुँचता दिखाई पड़ता है, तो विद्वान लोगों को दिल्ली में लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है. और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान के खिलाफ कुछ भी करो, तो उन्हें दिल्ली में सेकुलरिज्म पर आंच आती दिखाई पड़ने लगती है.
इसलिए अगर सरकार का जोर शोर से विरोध हो रहा है, तो इसका मतलब है, की सरकार देश की तरक्की करने में लगी हुई है.
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