Tibet Freedom struggle - New Chinese Law against People
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Reference
https://www.thequint.com/news/world/tibet-passes-law-making-ethnic-unity-mandatory-in-effect-from-may
https://www.indiatvnews.com/news/world/china-ethnic-identity-law-failure-tibet-xinjiang-campaign-concentration-camps-dalai-lama-579250
http://www.millenniumpost.in/world/tibet-passes-new-law-to-make-ethnic-unity-mandatory-395567
http://asianews.it/news-en/-Beijing-announces-policies-to-'strengthen-ethnic-unity'-in-Tibet-49015.html
https://en.wikipedia.org/wiki/Tibet_Autonomous_Region
इस वीडियो की शुरुआत में मेम्बरशिप shout आउट के तहत हम अपने गोल्ड मेंबर सचिन जी को हाईलाइट करना चाहते हैं, आप बहुत लम्बे समय से हमारे वीडियोस को देख कर regular फीडबैक देते रहे हैं, इसके लिए आपका बहुत बहुत सुक्रिया.
चलिए अब आजके टॉपिक की चर्चा करते हैं, अगर मोदी सर्कार ने ऐसा कानून बनाया होता, जिसके अनुसार यह सभी समुदायों की जिम्मेदारी होती, की देश की अखंडता की रक्षा करते हुए सभी समुदायों के बीच एक जुटता बनाये रखे, और सभी समुदायों को साफ़ तौर पर हर तरह के अलगावबाद के खिलाफ खड़ा होना ही होगा.
तो हमारे देश में फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन और मानव अधिकारों के रक्षकों ने आज आसमान सर पर उठा लिया होता. इंडिया से लेकर अमेरिका तक सारे अखबार मोदी सर्कार के खिलाफ आर्टिकल्स से भर जाते.
मोदी सर्कार इन्टॉलरेंट हो रही है, डिस्सेंट को allow नहीं कर रही है, ऐसी बाते हर दिशा से सुनाई देने लगती.
लेकिन जब ऐसा ही कानून साउथ वेस्ट तिब्बत की सरकार ने बना दिया, तो इतना सन्नाटा क्यों है भाई??
क्या तिब्बत में रहने वाले लोग इंसान नहीं हैं, क्या उनके पास मानव अधिकार नहीं है?
तो फिर भारत के हमेसा सजग रहने वाले वामपंथियों ने अपने मुँह में दही जमा कर आँखों पर पट्टियां क्यों बांध ली है??
कोई आश्चर्य नहीं है, जिन लोगों ने 1962 से लेकर आज तक भारत पर आक्रमण करने के लिए चीन की आलोचना नहीं की है, वह आज क्यों चीन के खिलाफ बोलने का साहस जुटा पाएंगे.
एनीवे आगे बढ़ते हुए, पिछले एक साल के दौरान तिब्बत में एथिनिक यूनिटी यानि की जातीय एकता को मजबूत करने के लिए इस कानून के ऊपर काम चल रहा था. जो १ मई से लागु हो जायेगा.
यह नया कानून बिलकुल साफ़ करता है, की प्राचीन समय से तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा है. इसी प्रकार तिब्बत की संस्कृति भी चाइनीस संस्कृति का एक अंग है.
सितम्बर 2019 के आंकड़ों के अनुसार तिब्बत की 30 लाख आवादी में चीन के 40 माइनॉरिटीज के लोग रहते हैं.
और अब यह उन सभी लोगों की जिम्मेदारी बन गयी है, की वह सभी भेद भाव को भूलते हुए एक जुट होकर चीन की छेत्रिय अखंडता और सम्प्रभुता की रक्षा करें.
एथिनिक यूनिटी के लिए सर्कार, व्यापारियों गावों स्कूलों मिलिट्री और सभी धार्मिक समुदायों ने मिलकर काम करना होगा.
आप सभी को लग रहा होगा, की इस नए कानून में तो कुछ भी ख़राब नहीं है.
लेकिन आज जो कानून तिब्बत ऑटोनोमस रीजन में बनाया गया है, वैसे ही नियम चार साल पहले शिनजियांग ऑटोनोमस रीजन में भी बनाये गए थे.
और फिर कई अनुमानों के मुताबिक शिनजियांग में रहने वाले 15 लाख लोगों को री एजुकेशन कैंप में ठूंस दिया गया, ताकि वह कम्युनिस्ट पार्टी के साथ वफादारी का गुण सीख सकें.
इसलिए चार साल पहले जो काम कम्युनिस्ट पार्टी ने शिनजियांग में चालू किया था, अब वही काम तिब्बत की जमीं पर उतारा जाएगा या नहीं, यह आने वाला समय ही बताएगा.
लेकिन तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी का चाबुक कैसे चलेगा, इस बात का अंदेशा आप सभी को होगा.
आपको सायद पता हो, चीन में 56 एथिनिक groups हैं, लेकिन हेन एथिनिक ग्रुप का 80 प्रतिशत आवादी के साथ बहुमत है.
और चीन में धीरे धीरे हेन एथिनिक ग्रुप की आवादी बढ़ती हुई 82 फीसदी तक होने का अनुमान है.
इसलिए जबकि हेन आइडेंटिटी की आवादी बढ़ रही है, तो तिब्बत में एथिनिक यूनिटी को स्थापित करने के लिए कानून का बनाया जाना साबित करता है, की चाइनीस मुख्यधारा में तिब्बत के लोगों को मिलाने में अभी तक कम्युनिस्ट पार्टी नाकाम रही है.
यह बात इस आंकड़े से साफ़ हो जाती है, की वर्ष 2009 से आजतक 156 तिब्बत के लोगों ने विरोध करते हुए, अपने आप को आग के हवाले कर दिया, क्योकि कम्युनिस्ट पार्टी के दमन को सहन करने के बजाय उन्हें आग बेहतर लगने लगी.
इसिलए आज कम्युनिस्ट पार्टी को तिब्बत में एथिनिक यूनिटी को स्थापित करने का जिम्मा आम जनता के सर पर धरना पड़ गया.
अब सवाल उठता है, की जब चीन तिब्बत को पूरी तरह से निगल जाने की योजना पर काम कर रहा है, तो भारत सर्कार ने क्या करना चाहिए.
सबसे आसान विकल्प होगा, की तिब्बत को चीन का आतंरिक मामला समझकर भारत मौन साध ले. और अपेक्षा करे, की चीन भी बदले में भारत के आतंरिक मामलो में टांग नहीं अड़ाएगा.
लेकिन आप सभी ने देखा होगा, जम्मू और कश्मीर से धारा 370 के हटने का पुर जोर विरोध चीन ने किया था. इसलिए हमें नहीं लगता है, की तिब्बत को चीन का आतंरिक मामला समझकर भारत सर्कार कोई अकल मंदी का काम करेगी.
वैसे इस बात की सम्भावना अधिक है , की भारत सरकार इस एक आसान और रिस्क फ्री ऑप्शन का ही चुनाव करेगी.
आप ही बताये, जब जम्मू कश्मीर चीन के लिए भारत का इंटरनल अफेयर नहीं है, तो तिब्बत भारत के लिए चीन का इंटरनल अफेयर कैसे हो सकता है?
होन्ग कोंग को चीन का आतंरिक मसला माना भी जा सकता है, लेकिन तिब्बत को चीन का इंटरनल मैटर माना ही नहीं जा सकता है.
हमने तिब्बत को चीन का इंटेनल अफेयर मान लिया, तो परिणाम हमारे सामने है, हम आज अरुणाचल का सीमा विवाद चीन के साथ सुलझाने की कोसिस कर रहे हैं.
यदि प्रश्न वाचक निशान लगा होता, तिब्बत के ऊपर, तो आज भारत और चीन तिब्बत को लेकर चर्चा कर रहे होते.
यह होता है, डिफेंसिव की बजाय offensive तरीके से गेम खेलने का परिणाम , लेकिन हम अपना भूतकाल नहीं बदल सकते हैं. जो समस्याएं भूतकाल ने पैदा करि है, हमें उनके जन्म पर विवाद ना करते हुए, उनसे कैसे निपटा जाये, इसकी चर्चा करनी चाहिए.
आपको अंदाज़ा होगा, की चीन एथिनिक यूनिटी का ये जो कानून लेकर आया है, उसका कुछ न कुछ लेना देना तो दलाई लामा के पुनर जन्म से लेकर है.
जब चने ही नहीं होंगे, तो अम्मा भुनाने क्या जाएँगी??
सायद इसी लिए चीन ने दलाई लामा के पुनर जन्म के सवाल का उत्तर ढूंढने की कोसिस यह कानून बनाकर करि है, ऐसा दिखाई पड़ता है.
इसलिए हमारा तो साफ़ मत है, भारत ने तिब्बत के इस नए कानून को चुनौती देनी चाहिए, और इसके खिलाफ विचार प्रकट करते हुए, दलाई लामा के पुनर जन्म पर भारत सर्कार की स्थिति स्पस्ट करनी चाहिए.
दलाई लामा का पुनर जन्म होगा भी की नहीं, और अगर होगा तो किस प्रकार होगा, इसका निर्णय करने का अधिकार तो अन्य सभी समुदायों की तरह तिब्बत के समुदाय और वर्तमान दलाई लामा को मिलना ही चाहिए.
यदि भारत साकार ने आज मौन साध लिया , तो तय जानिए, तिब्बत की आजादी का सवाल हमेसा के लिए शांत हो जायेगा.
मोदी सरकार पर हम सभी को पूरा विस्वास है, इस पूरी सिचुएशन पर समग्र दृस्टि कोड़ से विचार करके वह सही कदम उठाएगी, आज ऐसी उम्मीद की जा सकती है.
इसी बीच हम यह भी देखेंगे, की अमेरिका इस नए कानून के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देगा, कुछ ही दिनों में अमेरिका और चीन के बीच fake ट्रेड डील होने वाली है, इसलिए अमेरिका प्रतिक्रिया देगा भी की नहीं, यह देखना रोचक होगा.
अगर आप चाहते हैं, की भारत सर्कार तिब्बत के इस नए कानून के खिलाफ विरोध दर्ज कराये, तो आप इस वीडियो को like कीजिये, और यदि आपको लगता है, की तिब्बत चीन का इंटरनल मैटर मानकर भारत ने इस कानून को नजरअंदाज करना चाहिए, तो आप इस वीडियो को dislike कर सकते हैं.
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