Afghanistan allocated lot of Money to renovate temples (Good News)
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https://www.aa.com.tr/en/asia-pacific/afghan-parliament-approves-55b-annual-budget/1710577
https://www.wionews.com/south-asia/afghanistan-government-to-rebuild-temples-and-gurudwaras-280364
https://menafn.com/1099673396/Afghanistan-to-renovate-Hindu-temples
https://www.aa.com.tr/en/asia-pacific/afghan-parliament-approves-55b-annual-budget/1710577
https://www.aljazeera.com/news/2020/02/afghan-president-pompeo-reports-progress-taliban-talks-200212033459051.html
आप सभी को याद होगा, भारतीय सहयोग से अफ़ग़ान पार्लियामेंट का निर्माण कार्य वर्ष 2015 में पूरा होगया था.
पिछले महीने उसी पार्लियामेंट में पेश हुआ वर्ष २०२०-२१ के लिए बजट. अफ़ग़ानिस्तान के बजट का साइज था, 5.5 बिलियन डॉलर. जिसमे से 6 लाख 50 हज़ार डॉलर का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान में हिन्दुओ और सिक्खो के धार्मिक स्थलों के पुनर निर्माण के लिए किया जायेगा.
1970 के दशक तक अफ़ग़ानिस्तान में 7 लाख से ऊपर हिन्दू और सिक्ख रहा करते थे, लेकिन फिर कट्टरपंथ का ऐसा दौर आया, की आज अफ़ग़ानिस्तान में 1500 के लगभग हिन्दू और सिक्ख बचे हैं.
और जहाँ तक उनके पूजा स्थलों का सवाल है, इनकी संख्या मात्र 10 बताई जाती है, जो की मुख्य तौर पर काबुल में ही स्थित है.
अब अफ़ग़ानिस्तान की सर्कार हिन्दू और सिक्ख समुदाय से मिलकर पुनर निर्माड़ के लिए मंदिरों और गुरुद्वारों की पहचान करेगी.
आप इस सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट का प्रभाव भी कह सकते हैं, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ने ना सिर्फ मंदिरों और गुरुद्वारों के जीर्णोद्धार की बात कही है, बल्कि उसके लिए बजट भी allocate किया है.
इसलिए अफ़ग़ानिस्तान के बातों में थोड़ी सी सीरियसनेस तो दिखाई देती है, लेकिन सच यह भी है, की जल्द ही अमेरिका और तालिबान के बीच पीस डील होने की सम्भावना जताई जा रही है.
यहाँ तक की अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति ने अभी कल ही ट्वीट किया था, की अमेरिकन फॉरेन सेक्रेटरी ने उन्हें बताया है, की तालिबान के साथ बातचीत में प्रगति हुई है.
ऐसा बताया जा रहा है, की निश्चित समय के लिए हिंसा में कमीं लाने को लेकर तालिबान ने अमेरिका को प्रस्ताव दिया है, जिसे प्रेजिडेंट ट्रम्प ने हरी झंडी दिखा दी, और अब उसी प्रस्ताव को फाइनल करने को लेकर बातचीत चल रही है.
लेकिन जमीनी सच्चाई यह है, दिसंबर से मार्च महीनो के बीच अफ़ग़ानिस्तान में गजब की शर्दी पड़ती है, और बर्फ़बारी भी होती है.
इसलिए वैसे भी इस दौरान हिंसा में कमी आती है, इसलिए हो सकता है, की तालिबान अमेरिका को उल्लू बनाने की कोसिस कर रहा हो.
अमेरिका और तालिबान के बीच हुए एग्रीमेंट की सच्चाई तो पता चलेगी, की मार्च महीने के बाद, तब तालिबान स्प्रिंग offensive लांच करता है, या नहीं.
वैसे अभी भी तालिबान और अमेरिका के बीच पीस टॉक चल रही है, इसलिए किसी भी निस्कर्स पर पहुंचने के पहले हमें डील के फाइनल हो जाने का इंतजार करना होगा.
लेकिन एक बात तो तय हो जाती है , अफ़ग़ानिस्तान के बजट में जो धन मंदिरों और गुरुद्वारों के लिए रखा गया है, वह खर्च होगा या नहीं, वह पूरी तरह से निर्भर करता है, अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाली डील पर.
जबकि अमेरिका के सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से भागने का रास्ता तलाश रहे हैं, पिछले महीने अफ़ग़ान NSA ने यह प्रस्ताव दिया था, की अब भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सेना उतार देनी चाहिए.
अफ़ग़ान NSA के इस सुझाव को लेकर भारतीय एक्सपर्ट के बीच वाद विवाद छिड़ गया, किसी ने अफ़्ग़ानिस्तान को साम्राज्यों का कब्रिस्तान बताकर वहां के दलदल में फसने से बचने की सलाह दी, तो अन्य एक्सपर्ट लोगों का कहना था, अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से चले जाने के बाद पाकिस्तान तालिबान की मदद से भारत पर दवाब बढ़ाना चालू कर देगा. इसलिए भारत ने छोटे स्तर पर ही सही, अपनी सेना तैनात कर देनी चाहिए.
सबसे पहले तो जो लोग अफ़ग़ानिस्तान of ग्रेवयार्ड और एम्पायर कहते हैं, उन्होंने ना तो मौर्य साम्राज्य के बारे में पड़ा है, और ना ही महाराज रणजीत सिंह के बारे में उन्हें कोई जानकारी है.
अफ़ग़ानिस्तान के NSA को भारत के दोस्त के रूप में जाना जाता है, लेकिन हम दोस्तों से भी तो सवाल कर सकते हैं.
वर्ष 2001 से अफ़ग़ान सर्कार सत्ता में है, पुरे 20 साल गुजरने को है, आज भी यदि अफ़ग़ान सर्कार को दूसरे देशो से जमीनी सैन्य सहायता चाहिए, तो इसका जिम्मेदार कौन है??
आप कह सकते हैं, की अमेरिका ने अफ़ग़ान सर्कार को अपने पाँव पर खड़े ही नहीं होने दिया. लेकिन बड़ा सवाल यह है, की क्या अफ़ग़ान सर्कार ने ऐसी कोसिस करि??
चाहे अफ़ग़ानिस्तान हो या कोई भी अन्य देश हो, हम वहां पर अपनी इच्छा के अनुसार सिस्टम नहीं थोप सकते हैं. 20 सालों तक इसी कोसिस में लगा अमेरिका आज मुँह छुपाकर अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की फ़िराक में हैं.
इसलिए भले ही अमेरिकी अफ़ग़ानिस्तान से भाग जाएँ, हमें अफ़ग़ानिस्तान के भवर में फसना नहीं चाहिए, क्योकि हम अफ़ग़ानिस्तान में घुस तो अपनी मर्जी से सकते हैं, लेकिन हम कब निकल कर वापस आएंगे, यह निश्चित नहीं है.
किसी भी लड़ाई को जीतने के पहले हमारा ऑब्जेक्टिव क्रिस्टल क्लियर होना चाहिए, बिना किसी अंत के लड़ाई नहीं लड़ी जाती है. क्या हम एन्डलेस वॉर को लड़ने के लिए तैयार हैं?
इसलिए जो एक्सपर्ट अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय सेना भेजने की बात करते हैं, उनसे हमारा यही छोटा सा सवाल है, की किसी ना किसी तरह से भारतीय सेना वहां चली तो जाएगी, लेकिन वह वापस कब आएगी?
भारतीय सेना अफ़ग़ान सर्कार के लिए बैशाखी का सहारा कब तक बनी रह सकती है?
वैसे भी हम सभी को पता है, की अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सप्लाई लाइन के लिए हमें ईरान पर निर्भर होना पड़ेगा. लेकिन ईरान जैसे दूसरे देश की दया पर निर्भर होकर जंग जीती नहीं जाती है.
अफ़ग़ानिस्तान में घुसने से अच्छा होगा, की हम POK को वापस लेने की रणनीति पर जमीनी कदम उठायें.
वैसे हमें यह भी ध्यान रखना होगा, की अमेरिका विथड्रावल एग्रीमेंट के लिए नहीं, वल्कि पीस एग्रीमेंट के लिए मोलभाव कर रहा है. इसलिए इस प्रक्रिया को पूरा होने का समय तो दिया ही जाना चाहिए.
20 सालों के बाद पहली बार अमेरिका और तालिबान बातचीत के इस मुकाम तक पहुंचे हैं, आइये देखते हैं, की पीस डील के बाद अफ़ग़ानिस्तान में पीस लौटती है, अथवा अफ़ग़ानिस्तान का हाल भी सीरिया की तरह ही होता है.
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