Raja Dahir's Daughters-How they took REVENGE from Muhammad bin Qasim
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https://en.wikipedia.org/wiki/Chach_Nama
https://www.historyofroyalwomen.com/the-royal-women/surya-devi-of-sindh-the-hindu-princess-who-defied-the-caliph/
https://postcard.news/revenge-story-of-brave-hindu-girls/
https://en.wikipedia.org/wiki/Raja_Dahir
https://en.wikipedia.org/wiki/Muhammad_bin_Qasim
हमारे इस वीडियो को स्पोंसर किया है, राकेश कुमार जी, केदार दातार जी और सिद्धार्थ कश्यप जी ने . आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद्, आपके सहयोग के कारण ही हम यह वीडियो बना पाए हैं.
आपको सायद जानकारी हो, सिंध के आखिरी हिन्दू राजा थे, राजा दाहिर.
49 वर्षीया राजा दाहिर को वर्ष 712 में हराया था 17 वर्षीय मोहम्मद बिन कासिम ने.
जीत का पूरा श्रेय बिन कासिम को दिया जाता है. लेकिन फिर भी सवाल उठता है, की एक युवा ने अनुभवी राजा को कैसे हराया, इसको संछिप्त में समझना हो तो हम कह सकते हैं, की मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर को हराया था महा गठबंधन बनाकर. आज कल जो लोग महागठबंधन का आईडिया पेश करके एक्सपर्ट की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं, वह कहीं ना कही बिन क़ासिम की राजा दाहिर पर जीत से प्रेरित हैं.
लेकिन आप सवाल कर सकते हैं, की आज के समय हम 1300 साल पुरानी बात क्यों कर रहे हैं. बात यह है, की पाकिस्तान अस्तित्व में तो आया वर्ष 1947 में, लेकिन जिन्नाह के मुताबिक पाकिस्तानी मूवमेंट की शुरुआत तब हुई थी, जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध की जमीं पर कदम रखा था, और इसीलिए हीरो क़ासिम को पहला पाकिस्तानी भी बताया जाता है.
लेकिन एक कठोर सच्चाई यह है, की एक और बिन कासिम को नायक बनाने के लिए राजा दाहिर को पाकिस्तान में खलनायक बना दिया गया, तो दूसरी और भारत ने उन्हें भुला दिया.
हमारा यह बिलकुल भी कहना नहीं है, की राजा दाहिर दूध के धुले थे. सबसे बड़ी गलती तो उनसे यही हुई, की धर्म का भेद किये बिना राजा दाहिर ने जिन लोगों को संकट काल में शरण और सम्मान दिया, उन्ही लोगों को अपना धर्म और भाईचारा याद आ गया, जब संकट के बादल राजा दाहिर के सर पर गहराए.
साथ में भारतीय समाज तब जातिबाद छेत्रवाद और संप्रदाय बाद से ग्रसित था. इसलिए हमारी कमजोरियों की सजा कोई और तो भुगतेगा नहीं.
एक्साम्पल के तौर पर बौद्ध मत के मानने वाले राजाओं और लोगों ने मोहमद बिन क़ासिम के साथ मिलकर राजा दाहिर को हराया. तब यह उनकी कल्पना से परे था, की आगे आने वाले वर्ष 2001 में बामियान में भगवान बुद्ध की मूर्तियों को तोपों से वही लोग तोड़ेंगे, जिनके साथ वह उस दिन तलवार चला रहे थे.
जहाँ तक जिहाद की बात है, दुनिया को तो इस कांसेप्ट का पता वर्ष 2001 में चला, हम तो इसके साथ वर्ष 712 से लड़ते आ रहे हैं.
लेकिन बड़ा सवाल यह है, की जिस मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध में इतनी बड़ी जीत हासिल की, उसका अंत इतनी जल्दी कैसे हुआ.
बिन क़ासिम की मौत कैसे हुई, इसके दो घटनाक्रम बताये जाते हैं.
इतिहासकारों के द्वारा पहला कारण तो यह बताया जाता है, की इराक के गवर्नर के साथ पारिवारिक कलह के कारण बिन क़ासिम को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.
दूसरे कारण का कनेक्शन हैं, राजा दाहिर की बेटियों के साथ, जिनका नाम था, सूर्या देवी और प्रेमिला देवी. और यह कहानी बताई जाती है, चाच नामा में, जिसमे आठवीं सताब्दी की स्टोरीज शामिल हैं, और इन कहानियो को ना तो लिखा किसी हिन्दू ने था, और ना ही इनका ट्रांसलेशन किसी हिन्दू ने किया था.
सूर्या देवी और प्रेमिला देवी को भले ही हमने भुला दिया हो, पाकिस्तान उन्हें आज भी याद रखता है.
हुआ यूँ, की मोहम्मद बिन कासिम के साथ युद्ध में राजा दाहिर की तो मौत हो गयी, और रानियों ने जौहर कर लिया. लेकिन राजा दाहिर के बेटियां बिन क़ासिम के कब्जे में आ गयी.
वैसे जौहर का विकल्प तो उनके सामने भी था, लेकिन तब सायद उनके यह बात समझ आ गयी थी, यदि मरना ही है, तो क्यों ना मार कर मरा जाये.
मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर के दोनों बेटियों को गिरफ्त में लेकर दमस्कस में बैठे खलीफा को उपहार के रूप में देने के लिए आज के सीरिया में भेज दिया.
फिर इन दोनों राज कुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया, खलीफा राजकुमारी सूर्या देवी की अद्भुत सुंदरता के दीवाने हो गए. और उन्होंने सूर्या देवी के पास आने की कोसिस करि.
तो सूर्या देवी ने खलीफा के कान में यह कह दिया, की खलीफा के सामने पेश करने के पहले उन दोनों के साथ मोहम्मद बिन कासिम तीन दिनों तक रहा है.
यह बात सुनते ही, ठरकी खलीफा का पारा सातवे आसमान पर चढ़ गया, और उन्होंने खुद अपने हाथों से फरमान लिख दिया, की मोहमद बिन कासिम को कच्चे चमड़े में बाधकर एक बॉक्स में उनके सामने लाया जाये.
खलीफा के आदेश के मुताबिक बिन क़ासिम को बंधक बनाकर लाया जा रहा था, तो इतने लम्बे रस्ते में वह suffocation से बुरी मौत मारे गए.
जब मोहमद बिन क़ासिम की लाश को ख़लीफ़ा के सामने पेश किया गया, तो राजकुमारी सूर्या देवी ने भी सत्य उजागर कर दिया, की कासिम ने तो उन्हें छुआ तक नहीं है. लेकिन क्यों की उसने सिंध और हिन्द को बर्बाद करके उनके बाप दादा के राज्य को धराशाई कर दिया, इसलिए बदला लेने के लिए उन्होंने खलीफा से झूठ बोला था .
अब खलीफा को पूरा गेम समझ आ चूका था, और उन्होंने गुस्से में आकर दोनों राजकुमारियों को या तो दिवार में चुनवा दिया, अथवा घोड़े की पूछ से बांधकर उन्हें दमस्कस में तब तक दौड़ाया गया, जब तक उनकी सांसे चलती रही.
इस प्रकार गुलाम राजकुमारियों की मौत तो हो गयी, लेकिन अपनी स्मार्टनेस और इंटेलिजेंस की दम पर ना केवल वह अपने सम्मान को बचाने में कामयाब हुई, बल्कि उन्होंने उस आदमी को भी मौत के घाट उतार दिया, जिसके कारण हिंदुस्तान को अरबों के हाथों पहली बार हार का मुँह देखना पड़ा.
अब पाकिस्तान के लोग बिन क़ासिम के बारे में कहते हैं, की वह कितने आज्ञाकारी थे, की उन्होंने स्वयं को चमड़े में बांधकर खलीफा के सामने पेश होने के आदेश का पालन किया.
वह यह भी तो कर सकते थे, की पूरा रास्ता आराम से कवर करके, दमस्कस पहुंचने के ठीख पहले चमड़े में बंधने को तैयार हो जाते.
यह बात हमें समझ आती है,पाकिस्तान ने बिन कासिम को हीरो बनाना है, और अपने प्रेजेंट को ग्लोरियस बनाने के लिए पास्ट को डार्क बताना भी जरूरी है. सच्चाई तो उन्हें भी मालूम है, थे तो वह भी हिन्दू ही पहले.
लेकिन बड़ा सवाल यह है, की जब मोहम्मद बिन क़ासिम की मौत हो चुकी थी, तो राजा दाहिर के बेटियों को क्या जरूरत थी, की वह खलीफा के सामने सच को स्वीकार कर लें.
अगर उन्हें अपनी जान ज्यादा प्यारी होती, तो वह भी झूठ बोलकर हमेसा के लिए गुलामी की जिंदगी जी लेती.
बात साफ़ है, आपत्ति के समय भी अवसर की तलाश करते हुए सूर्या देवी और प्रेमिला देवी ने सेंस ऑफ़ पर्पस से काम किया. आप ही बताएं, यदि युवा बिन क़ासिम का अंत ना हुआ होता, तो हिंदुस्तान का इतिहास क्या कुछ और नहीं होता.
बिन क़ासिम सिंध से होकर हिन्द पर हमला ना करता, क्या इसकी कोई गारंटी थी. जिस तरफ सिंध पर हमला करने के बहाने ढूंढ लिए गए, उसी तरह क्या पंजाब और राजपुताना पर हमला करने के बहानो का अविष्कार नहीं किया जा सकता था.
आज जो एक्सपर्ट हिंदुस्तान में बैठकर सिंध के राजा दाहिर में कमियां ढूढते हैं, उनसे छोटा सा सवाल यह है, की यदि आसान विकल्प का चुनाव करके राजा दाहिर ने बिन क़ासिम के सामने बिना लड़े सरेंडर कर दिया होता, तो हिंदुस्तान का इतिहास क्या होता?
आप ही बताएं, ये कहाँ का न्याय है, की बेनिफिट ऑफ़ डाउट हमेसा बिन कासिम को ही दिया जाये?
इसलिए जहाँ तक हमें समझ आता है, राजा दाहिर, सूर्या देवी और प्रेमिला देवी ने इतिहास का रुख पलटने की पूरी कोसिस करि, किसी भी व्यक्ति का सम्मान उसकी सफलता से नहीं बल्कि उसकी कोसिस से होना चाहिए.
आज के समय और कुछ ज्यादा नहीं तो हम कम से कम यह तो कर ही सकते हैं, की राजा दाहिर की वीरांगना बेटिओं को याद रखें, और उनके बारे में जागरूकता फैलाएं.
इतिहास की किताबों में भले ही इन दो राजकुमारियों को जगह ना मिले, हमारे दिल और दिमाग में इन्हे सम्मान जनक स्थान तो मिलना ही चाहिए.
इस वीडियो को बनाने के लिए हमें इम्पोर्टेन्ट इनफार्मेशन दी थी, हमारे दर्शक आदित्य गुप्ता जी और सैफाली चतुर्वेदी जी ने, हम उन्हें भी धन्यवाद् देते हैं.
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