Smart Strategy- India buys HUGE Amount of Cheap Crude oil!!


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Reference
https://www.cnbc.com/2020/03/12/opec-dispute-india-could-be-a-major-winner-as-oil-prices-plummet.html
https://business.financialpost.com/pmn/business-pmn/indias-reliance-buys-2-mln-bbls-extra-saudi-oil-for-april-loading-trade-sources
https://www.financialexpress.com/opinion/oil-price-war-a-silver-lining-for-indian-economy/1895286/
https://www.moneycontrol.com/news/business/indias-bpcl-buys-2-million-barrels-extra-saudi-oil-for-april-5024941.html
https://oilprice.com/Energy/Crude-Oil/Oil-Price-War-Escalates-As-OPECs-No3-Boosts-Production.html
https://oilprice.com/Latest-Energy-News/World-News/Mexico-Offers-To-Mediate-In-Oil-War.html
https://www.reuters.com/article/us-oil-opec-russia-exclusive/exclusive-russia-to-opec-deeper-oil-cuts-wont-work-idUSKBN20Y2TJ

जैसा की आप सभी को पता है, एमबीएस और पुतिन ने आयल प्राइस वॉर चालू कर दी है. जिसके कारण कच्चे तेल की कीमत नीचे गिरी है, साथ में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों के कम होने का लाभ हम सभी को हो रहा है.

इंडियन पेट्रोलियम मिनिस्टर का पिछले महीने कहना था, की प्रति बैरल 50 से 60 डॉलर की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल होती है.

लेकिन अब  कच्चे तेल की कीमत 35 डॉलर प्रति बैरल  के स्तर तक पहुंच गयी है. इसलिए हम सभी के लिए यह एक बेहद अच्छी खबर है.

जैसा की ओपेक+ का current production agreement इस महीने ख़तम होने वाला है, और इसका मतलब है, अप्रैल फूल के दिन से हर देश अपनी मर्जी के मुताबिक तेल को निकाल सकता है.

कम कीमत पर आयल की सप्लाई का भारत ने लाभ उठाना भी चालू कर दिया है, एक्साम्पल के तौर पर BPCL ने सऊदी अरब से अप्रैल महीने के लिए एक्स्ट्रा 20 लाख बैरल कच्चा तेल खरीद लिया है. और ठीक इसी तरह रिलायंस ने भी 20 लाख बैरल कच्चा तेल सऊदी अरब से खरीद लिया है.

इसलिए  दूसरों को होने वाले नुकसान का अंदाज़ा लगाने में अपना समय बर्बाद न करके,  सस्ती कीमत पर अधिक तेल खरीदकर भारत चांदी काटने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है.

अभी तक सऊदी अरब और रूस ने ही Announce किया था, की वह कच्चे तेल को अधिक मात्रा में पंप करेंगे, लेकिन अब इस प्राइस वॉर में दुनिया के कच्चे तेल के तीसरे सबसे बड़े उत्पादक UAE ने भी कूदने का निर्णय ले लिया है, वह भी अप्रैल में ज्यादा क्रूड आयल पंप करने वाला है.

इस आयल प्राइस वॉर के दौरान रूस ने साफ़ कर दिया है, की वह बातचीत करने को तैयार है, तो मेक्सिको का कहना है, की वह अन्य देशो के साथ मिलकर रूस और सऊदी के बीच मध्यस्थ बनने को तैयार है.

लेकिन आज रूस के डिप्टी एनर्जी मिनिस्टर ने साफ़ कर दिया है, की इस आयल प्राइस वॉर की आग में अमेरिका के हाई कॉस्ट एनर्जी प्रोजेक्ट जलकर धुआँ हो जायेंगे.

इसलिए जैसा की आप सभी को पता है, इस लड़ाई में अमेरिका पर गोली चलाने के लिए सऊदी अरब ने कन्धा रूस को दे दिया है.

50 डॉलर पर बैरल की कीमत यदि थोड़े लम्बे समय तक रही, तो कर्ज के पहाड़ के तले दबे अमेरिकी शैल एनर्जी प्रोजेक्ट पर ताला पड़ जायेगा.

इस पूरी लड़ाई को अगर आप थोड़ा सा पीछे हटकर देखें, तो आप भी इस बात से सहमत होंगे, की रूस इस लड़ाई के लिए पहले से तैयार था, और उसने इस युद्ध को छेड़ने के लिए सही समय का इंतजार किया, और जब आयल के डिमांड पर प्रश्ना वाचक निशान लगा हुआ था, ठीक उसी समय पर आयल सप्लाई की ऐसी बाढ़ आने वाली है, जिसमे अमेरिकन फ्रैकिंग इंडस्ट्री का डूबना तय है.

पिछले तीन चार सालों में हमने देखा है, की अमेरिका ने रूस के डिफेंस एक्सपोर्ट को कम करने के लिए काटसा सैंक्शन की धमकी देना चालू कर दी, रूस की यूरोप को गैस पाइप लाइन के राह में रुकावट पैदा करि, और वेनेजुएला के आयल trade में भाग लेने के लिए रूस की कंपनी पर प्रतिबन्ध लगा दिए.

सुनार की तरह अमेरिका 100 बार टुक टुक कर रहा था, तो लोहार पुतिन ने हथोड़े की चोट से एक बार में ही सब हिसाब किताब बराबर कर लिया.

इसलिए लग तो ऐसा रहा है, जैसे रूस और ओपेक की बातचीत से कोई हल निकल सकता है, लेकिन रियलिटी में रूस से राहत पाने के लिए अमेरिका को पीछे हटना पड़ेगा.

जहाँ तक सऊदी अरब के सहजादे का सवाल है, उन्होंने यह समझकर गलती कर दी, की जिस तरह उन्होंने अपने भाइयों को थोक में कुचला है, उसी तरह वह आसानी से प्रेजिडेंट पुतिन को भी पछाड़ देंगे.

वैसे प्रेजिडेंट पुतिन क्या क्या कर सकते हैं, यह जानने के लिए MBS टर्की के राष्ट्रपति से संपर्क कर सकते हैं.

अब आप कह सकते हैं, इस आयल प्राइस वॉर में रूस को भी नुकसान तो उठाना पड़ेगा, लेकिन आप के लिए सवाल यह है, की ऐसी कौन सी लड़ाई होती है, जिसमे सिर्फ एक साइड को ही पूरा नुकसान उठाना पड़ता है.

इसलिए निश्चित रूप से इस लड़ाई में रूस को भी हानि होगी. सवाल सिर्फ यह है, की सबसे जयादा नुकसान किसे होता है, और युद्ध विराम के लिए कौन सबसे बड़ी कीमत चुकाता है.

सबको नुकसान पहुंचाने वाली यह लड़ाई लम्बे समय तक तो चलने वाली है नहीं, अब सिर्फ देखना यह होगा , की यह खतरनाक खेल कब तक चलता है.

जहाँ तक भारत का सवाल है, हम बिलकुल सही राह पर हैं, सस्ती कीमत पर एक्स्ट्रा तेल खरीदकर हमें अपने लिए आगे की राह आसान करनी है.

साथ में हम यह उम्मीद करते हैं, की मोदी सर्कार तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ लगातार आम जनता तक पहुँचाती रहेगी. ताकि महगाई को कण्ट्रोल में रखा जा सके.

कहने की जरूरत नहीं है, यदि हमने चाइनीस वायरस पर कण्ट्रोल नहीं पाया, तो इस आयल प्राइस वॉर से होने वाला लाभ गायब हो जायेगा.

आइये देखते हैं, यह आयल प्राइस वॉर किस दिशा में आगे बढ़ती है.

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