Well Done Mr Putin - Russia to deploy Troops in Afghanistan
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तालिबान की टांगे तोड़ने के लिए पुतिन हुए तैयार
https://www.dawn.com/news/1539436
https://en.mehrnews.com/news/156448/Russia-voices-readiness-to-dispatch-troops-to-Afghanistan-if
https://www.bbc.com/news/51796780
https://www.thehindu.com/news/national/jaishankar-to-head-for-sochi-for-talks-with-chinese-and-russian-counterparts/article31010739.ece
जैसा की आप सभी को पता है, 29 फरबरी को हुई अफ़ग़ान पीस डील, और पाकिस्तान में खुसी की लहार दौड़ गयी, जैसे की उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान जीतकर भारत को हरा दिया हो.
तो दूसरी तरफ भारत के एक्सपर्ट लोगों के बीच सन्नाटा पसर गया, और यह तक कनफरम किया जाने लगा, की अफ़ग़ानिस्तान के रेगिस्तानी समुद्र में भारत की लुटिया डूब गयी.
लेकिन तब आप में से कई दर्शकों का साफ़ तौर पर मत था, की अफ़ग़ानिस्तान में पार्टी तो अभी शुरू हुई हैं. और सबसे ज्यादा संकेत इसी और किया गया था, की चुप चाप बैठा हुआ रूस जैसे ही अपने मोहरे आगे बढ़ाएगा, बाजी ही पलट जाएगी.
और अब ऐसा ही होता हुआ दिखाई दे रहा है, क्योकि अब धीरे धीरे रूस अपने पत्ते खोल रहा है.
उदहारण के लिए बालक पाकिस्तान की कल्पना के परे, अमेरिका और रूस ने ज्वाइन स्टेटमेंट जारी करके साफ़ कर दिया है, की वह अफ़ग़ानिस्तान के सिंहासन पर अकेले तालिबान को बैठने नहीं देंगे. साथ ही साथ वह निश्चित करेंगे, की तालिबानी इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान को ना तो यूनाइटेड नेशंस और ना ही इंटरनेशनल कम्युनिटी स्वीकार करे.
आपको ध्यान में होगा, सोवियत रूस के अफ़ग़ानिस्तान से पलायन के बाद वर्ष 1996 में इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता अस्तित्व में आयी थी, जिसके पांव वर्ष 2001 में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से उखाड़ दिए थे.
इसलिए ना तो अमेरिका और ना ही रूस चाहते हैं, की फिर इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान का शासन लौटे.
अमेरिका और रूस के जॉइंट स्टेटमेंट का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है, की पिछले शनिवार को तालिबान की तरफ से स्टेटमेंट आया था, की सिर्फ उसके मुखिया को ही अफ़ग़ानिस्तान पर राज करने का हक़ मिला हुआ है.
उधर प्रेजिडेंट ट्रम्प ने भी यह डर जाहिर किया था, की अमेरिकी सैनिको के पीछे हटने के बाद, तालिबान अकेला अफ़ग़ान सत्ता पर काबिज हो जायेगा.
और अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसीज की तरफ से भी यह कहा जा रहा था, की अपने वादों पर खरा उतरने का तालिबान का कोई इरादा नहीं है.
इसलिए जब की यह साफ़ होता चला जा रहा था, की पाकिस्तान से पोसित तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में तक्था पलट कर सकता है , अमेरिका और रूस ने एक दूसरे से हाथ मिला लिया है.
वैसे भी आप सभी को पता है, रूस ने तालिबान को समर्थन सिर्फ इसलिए दिया था, क्यों की वह अमेरिकियों की पीठ अफ़ग़ानिस्तान में देखकर हिसाब किताब बराबर करना चाहता था. और अब जबकि अमेरिकियों ने निकलने का मन बना लिया है.
अफ़ग़ानिस्तान के लिए रूस के एन्वॉय ने साफ़ साफ़ कर दिया है, की रूस को कभी भी यह स्वीकार नहीं होगा, की तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान के ऊपर एकाधिकार हो जाये. और उन्होंने यह भी बताया, की इस डरावनी स्थिति से ना केवल रूस, बल्कि ईरान और चीन भी बचना चाहते हैं.
तालिबान वर्तमान अफ़ग़ान एडमिनिस्ट्रेशन से बातचीत और मोलभाव करके एक मिली जुली सरकार बनाये, नहीं तो बुरा अंजाम भुगतने के लिए तालिबान को तैयार रहना होगा.
लेकिन ऐसा नहीं है, की रूस केवल बातें ही दे रहा है, रसियन अधिकारी ने कह दिया है, की यदि अफ़ग़ान सर्कार ने निवेदन किया, तो रूस अपने सैनिक अफ़ग़ान धरती पर आतंकवाद से लड़ने के लिए उतार देगा.
रूस अफ़ग़ान सरकार की किन शर्तो पर मदद करेगा, यह रसियन लीडरशिप के द्वारा तय किया जायेगा, लेकिन रूस अमेरिका की तरह अफ़ग़ानिस्तान पर अपनी शर्तें नहीं थोपेगा.
इसलिए यह बात क्लियर हो जाती है, की यदि अमेरिका रियलिटी में भी अफ़ग़ानिस्तान से भाग खड़ा हुआ, तो रूस की अफ़ग़ानिस्तान में एंट्री होगी, ताकि अफ़ग़ान प्रशाशन को किसी भी खतरे से बचाया जा सके.
इसी बीच भारतीय विदेश मंत्री जल्द ही रूस की यात्रा पर जाने वाले हैं, वहां पर वह रूस और चीन के विदेश मंत्रियो से मुलाक़ात करेंगे. रूस इंडिया चीन फ्रेमवर्क के अंतर्गत इस मीटिंग में और भी कई मुद्दों पर चर्चा होगी, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान मुख्य मुद्दा होगा, ऐसा हम सभी को अंदाज़ा है.
एक्सपर्ट लोगों को बहार से जरूर ऐसा दिखाई देता है, की भारत खड़ा खड़ा अफगानिस्तान का तमासा देख रहा है, लेकिन आपको भी समझ आ रहा है, की इस खेल का छुपा रुस्तम भारत ही है.
आप सभी को पता है, पाकिस्तान इस सिचुएशन की राह देख रहा था, की इधर अमेरिका निकला, उधर तालिबान अफ़ग़ानिस्तान का किंग बन जायेगा, फिर क्या पहले पाकिस्तान हिंदुस्तान से कश्मीर और फिर बाद में हिन्दुओं से हिंदुस्तान को छीन लेगा.
पाकिस्तान को बड़ा घमंड था, की उसने पहले रूस को और बाद में अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में दफ़न कर दिया, लेकिन यह सोचते हुए, वह प्रेजिडेंट पुतिन को अंडर एस्टीमेट कर गए .
दुनिया ने जमीं आसमान एक कर दिया, फिर भी पुतिन साहब ने सीरिया की सरकार नहीं गिरने दी, तो वह कैसे Northern अलायन्स की वर्तमान अफ़ग़ान सरकार को लड़खड़ाने देंगे. वैसे भी पाकिस्तान को अच्छे से पता है, की यह बहुत पुराना याराना है.
अभी भी जो लोग यही सोचते हैं, की जिस तरह उन्होंने सोवियत को धुल चटा दी, उसी तरह वह प्रेजिडेंट पुतिन को भी परास्त कर देंगे, वह जरा विकिपीडिया पर प्रेजिडेंट पुतिन की जीवनी पड़ लें.
इसी बीच आज अफ़ग़ानिस्तान के एक राष्ट्रपति पद के लिए दो लोगों राष्ट्रपति चुनाव में विजयी घोसित प्रेजिडेंट घनी और उनके भूतपूर्व चीफ एग्जीक्यूटिव अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने अलग अलग कार्यक्रम में सपथ ले ली. जब एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते हैं, तो एक देश में दो राष्ट्रपति कैसे रह पाएंगे. इसलिए असमंजश और उलझ गयी है.
हालाँकि अमेरिका इन दोनों नेताओं के बीच मोलभाव करने की कोसिस कर रहा है,फिर भी अभी तक कोई हल नहीं निकला है. लेकिन फिलहाल अमेरिका ने अपना बजन प्रेजिडेंट घनी के पक्ष में रख दिया है.
इतिहास ने हमें बताया है, की यह केवल प्योर बार्गेनिंग चल रही है, जल्द ही ये दोनों मिलकर सरकार बनाएंगे, इस बात की प्रोबेबिलिटी अधिक है. लेकिन अब हाल फिलहाल तो अफ़ग़ानिस्तान के दो दो राष्ट्रपति बन ही गए हैं.
आश्चर्य देखिये, कल तक जीत की खुसी मना रहे पाकिस्तान और तालिबान आज इस हालत को लेकर अफ़सोस जता रहे हैं.
पीस डील के अनुसार १० मार्च को तालिबान के साथ intra अफ़ग़ान टॉक पर और बड़ा सवालिया निशान तो लग ही गया है.
एनीवे हमें अभी अफ़ग़ानिस्तान को लेकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना है, अफ़ग़ानिस्तान का गेम अभी भी ओपन है, और यह किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह तय होगा, की रूस और अमेरिका कौन सी रणनीति अपनाते हैं.
लेकिन एक बात तय है, इस खेल में कोई भी उतार आये, या चढ़ाव आये, अंत में जीतेगा इंडिया ही..
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