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Reference
https://www.reuters.com/article/us-health-coronavirus-trump-china/trump-says-us-investigating-whether-virus-came-from-wuhan-lab-idUSKCN21Y01BReference
https://www.thehindu.com/news/national/russian-arms-firm-to-donate-2-mn-to-pm-cares-fund/article31350622.ece
https://www.wionews.com/india-news/russias-main-defence-export-body-donates-2-million-for-pm-cares-fund-292642
https://www.worldometers.info/coronavirus/
https://www.hindustantimes.com/india-news/india-russia-defence-deals-set-to-cross-16-bn-to-include-s-400-systems-kalashnikov-rifles/story-U40gtN75ab7Y9eymECVmmK.html
जैसा की कहा जाता है, की दोस्त और दुश्मन की असली पहचान आपत्ति काल में होती है, इसलिए आज जब कोरोना महामारी के भारत में 12 हज़ार और रूस में 24 हज़ार केस रिकॉर्ड हो चुके हैं, तब भी दुनिया में सबसे पहले रूस ने भारत की ओर मदद का हाथ आगे बढ़ाया है.
हम सभी ने PM केयर्स फण्ड में अपनी अपनी छमता के अनुसार आर्थिक सहयोग दिया है, और बाद में भारत ने निर्णय लिया, की क्योकि हम असाधारण संकट काल से गुजर रहे हैं, इसलिए भारत ने PM केयर्स फण्ड में विदेशो से मदद को स्वीकार करना चालू किया था.
मोदी सर्कार के इस निर्णय के बाद रूस में भारत के राजदूत ने इस फण्ड के बारे में जागरूकता फ़ैलाने का काम भी किया था.
अब यह सामने निकल कर आ रहा है, की रूस की सरकारी कंपनी रोसोबोरोन एक्सपोर्ट ने PM केयर्स फण्ड में 15.3 करोड़ रुपयों का दान देने का निर्णय लिया है.
इस प्रकार रूस की यह स्टेट ओन्ड कंपनी ऐसा पहला विदेशी संघठन बन गया है, जिसने PM केयर्स फण्ड में contribution किया है.
आप सभी को अच्छे से पता है, यह रसियन कंपनी भारत को हथियार बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी है, चाहे S400 हो अथवा AK203 राइफल हो , हर डील इसी रसियन अम्ब्रेला आर्गेनाइजेशन के साथ की जाती है.
इसलिए भारत को हथियार बेचकर लाभ कमाने वाली संस्था यदि आज डोनेशन दे रही है, तो आपको यह कोई बड़ी बात नजर नहीं आ सकती है.
लेकिन बड़ा सवाल यह है, की हम हथियार खरीदते तो अमेरिका से भी हैं, लेकिन डोनेशन आई तो सबसे पहले रूस से है.
हम यहाँ पर भारत के रूस और अमेरिका के साथ सम्बन्धो को Compare नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ यह कहना चाहते हैं, रूस ने हमें सबसे पहले सहयोग दिया है, इसलिए हमने उसे सबसे पहले धन्यवाद देना चाहिए.
जहाँ तक यह सवाल है, की पास्ट की डिफेंस डील को अगर हम भूल भी जाएँ, तो रूस और भारत की अभी 16 बिलियन डॉलर की डिफेंस डील्स पाइप लाइन में हैं, तो रूस ने 2 मिलियन डॉलर का दान देकर कौन सी बड़ी बात की है.
इस सवाल के जवाब में हम यही कह सकते हैं, की दान का अकार नहीं, दान देने वाले का दिल देखा जाता है. इसलिए जहाँ तक हम समझ सकते हैं, भारत ने इस रसियन मदद का स्वागत करना चाहिए.
इसी दौरान confusion क्रिएट करने की कोसिस की जा रही है, की रूस का भारत को दान अमेरिकी काटसा प्रतिबंधों का शिकार बन सकता है. हमें नहीं लगता है, की अमेरिका इस टिल का ताड़ बनाएगा, क्योकि यह दान पूरी तरह से humanitarian है, और एक बेहद कॉमन सेंस की बात, यहाँ पर भारत रूस को पैसा नहीं दे रहा है, बल्कि उल्टा हो रहा है, रूस भारत को दान दे रहा है, इसलिए काटसा का फालतू में कोई डर नहीं होना चाहिए.
वैसे भी जब काटसा प्रतिबन्ध S400 की डील को नहीं रोक पाए, तो वह रसियन डोनेशन को क्या खाक रोक पाएंगे. फिर भी यदि कोई दिक्कत आएगी तो प्रेजिडेंट पुतिन और मोदी साहेब को ट्रम्प से निपटना भी आता है.
आगे बढ़ते हुए, जब से इस तरह की कांस्पीरेसी theories आ रही है , की कोरोना वायरस वूहान की लैब से दुनिया में फैला है, तभी से आप सभी लगातार मांग कर रहे थे, की इस बात की जमीनी इन्वेस्टीगेशन होनी चाहिए, ताकि पता लग सके की यह भस्मासुर कहाँ और किसने पैदा किया है ?
चीन के द्वारा दिए गए कोरोना वायरस के डीएनए को आधार बनाकर दुनिया भर के एक्सपर्ट लोग थे तेजाइ में, और उन्होंने चीन को क्लीन चिट भी देना चालू कर दिया था, की यह वायरस प्राकृतिक है.
लेकिन आप ही बताएं, चीन जो आज तक अपने कोरोना केस का आंकड़ा सही सही पेश नहीं करता है, क्या हम उसके द्वारा पब्लिश किये गए जीनोम सीक्वेंस पर आँख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं.
चाइनीस क्रिमिनल कांस्पीरेसी की इन्वेस्टीगेशन होनी चाहिए, लेकिन हर छोटे से छोटे मुद्दे पर जाँच की मांग करने वाले लेफ्ट लिबरल एक्सपर्ट लोगों के मुँह में आजकल फेविकोल जमा हुआ है. और तो और जब हम आम लोग यह मांग उठाते हैं, तो ये लोग मानवता की दुहाई देने लग जाते हैं.
एनीवे यह तो था बैकग्राउंड, अब प्रेजिडेंट ट्रम्प ने साफ़ कर दिया है, की अमेरिका इस बात की इन्वेस्टीगेशन में लगा हुआ है, ताकि कन्फर्म हो सके, की यह कोरोना वायरस वूहान की वायरल लैब में पैदा हुआ है की नहीं.
आगे आप सभी की बात को आगे बढाते हुए, अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी मांग करि है, की चीन को अपने चाल चलन पर लगे आरोप के बारे में दुनिया के सामने सबूत पेश करने चाहिए.
यह वायरस वूहान में पैदा हुआ, और वही से पूरी दुनिया में फेल गया, इसलिए चीन को ग्लोबल कोलैबोरेशन की आड़ में छुपने की जरूरत नहीं है.
इसलिए अब देखना होगा, की अमेरिका अपनी इन्वेस्टीगेशन में कितना आगे बढ़ पाता है, लेकिन और भी अच्छा होगा, यदि UN सिक्योरिटी कॉउन्सिल के नेतृत्वा में यह इन्वेस्टीगेशन हो.
आप सभी को अच्छे से पता है, वीटो पावर चीन यह होने नहीं देगा, लेकिन दुनिया को पता भी तो चलना चाहिए, और इतिहास में भी रिकॉर्ड होना चाहिए, की वैश्विक महामारी की जड़ ढूढ़ने में किस देश ने बाधा पैदा करि.
वैसे हमें कोई गलत फहमी नहीं है, की चार महीने गुजर जाने के बाद भी चीन ने सबूतों को नस्ट नहीं किया होगा , आपने पड़ा होगा, वह कोरोना रिसर्च को तो बहार आने नहीं दे रहा है, इसलिए वह चाइनीस वायरस की इन्वेस्टीगेशन में सहयोग देगा, इस बात की सम्भावना ना के बराबर है.
लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं, की दुनिया के देश अपने अपने लेवल पर जांच पड़ताल ही ना करें??
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