Well Done France and UAE for standing against Turkey



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आप सभी को पता है, पिछले साल जुलाई से टर्की सायप्रस के एक्सक्लूसिव इकनोमिक जोन में ड्रिलिंग का काम कर रहा है. और जबकि दुनिया कोरोना महामारी से लड़ रही है, तब टर्की ने ड्रिलिंग का काम और तेज कर दिया है.

दुनिया में तेल कोड़ियों के दाम बिक रहा है, लेकिन टर्की को ड्रिलिंग करने से फुर्सत नहीं है, इसलिए बात साफ़ है, ड्रिलिंग तो केवल इशारा है, टर्की का निशाना कहीं और है.

आपको यह भी याद होगा, की पिछले साल ही टर्की ने लीबिया की लंगड़ी सर्कार से समझौता करके, टर्की और लीबिया के एक्सक्लूसिव कॉमिक जोन को मिलाकर पुरे मेडिटेरननियन सी को दो टुकड़ो में तोड़ दिया था.

अब आप ही देख लीजिये, चीन ने पुरे के पुरे साउथ चाइना सी को निगल लिया, और छोटे चीन टर्की ने मेडिटेरननियन सी के बीचो बीच के हिस्से को अपनी इकनोमिक टेरिटरी घोसित कर दिया.

लीबिया के साथ हुआ यह एग्रीमेंट कई महीनो तक सीक्रेसी की चादर ओढे रहा, लेकिन अब टर्की खुले में आकर कहने लगा है, की उसने लीबिया में सैनिक तैनात किये, जिसके बदले उसे मेडिटेरननियन सी में ड्रिलिंग का अधिकार मिल गया है.

बात क्रिस्टल क्लियर है, टर्की के इरादे सबको मालूम थे, लेकिन फिर भी उस छेत्र के देशों ने टर्की और लीबिया की डील को लेकर  ढिलाई बरती तो अब सजा भी वही भुगत रहे हैं.

इसलिए पिछले सोमवार को ग्रीस सायप्रस फ्रांस UAE और egypt के विदेश मंत्रियों ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिये मीटिंग करि, और मेडिटेरननियन सी में टर्किश ड्रिलिंग और लीबिया में टर्किश मिलिट्री ऑपरेशन्स की निंदा करि.

फिर क्या था, टर्की ने भी जवाब देने में देरी नहीं लगायी, उसने कह दिया, की ये पांचो देश मिलकर उसके खिलाफ अलायन्स ऑफ़ ईविल बना रहे हैं, और इसके कारन रीजनल कैओस फ़ैल रही है.

एक और टर्की ने फ्रांस को निशाना बनाया, की वह इस अलायन्स को आकार दे रहा है, तो दूसरी तरफ टर्की की गुस्सा सबसे अधिक निकली UAE पर.

आप सभी को सायद जानकारी होगी, की लीबिया और यमन में टर्की और UAE एक दूसरे के आमने सामने है. 

इसलिए सायद UAE का मेडिटेरननियन सी में दखल टर्की को नागवार गुजरा, और उसने UAE को आड़े हाथों लिया.

लेकिन टर्की की बातें सुनकर आपको भी वही कहावत याद आती होगी, की यहाँ तो उल्टा चोर ही कोतवाल को डांट रहा है.

एनीवे बड़ी बात यहाँ पर यह है, की समय रहते इन देशो ने टर्की की टर टर का जवाब नहीं दिया, तो उन्हें अब टर्की की गालियां ही सुननी पड़ रही है.

बात साफ़ है, तुस्टीकरण की नीति का यही परिणाम होता है, तुस्टीकरण करके आप अपनी हार को टाल सकते हैं, हार से बच नहीं सकते हैं.

छोटे चीन की बात तो हमने कर ली है, अब बात करते हैं, चाइना 420 की.

आप सभी ने पड़ा होगा, पिछले कुछ दिनों में लद्दाक और सिक्किम में भारत चीन के बीच तना तनी बहुत बढ़ गयी है.  भारत ने चीन का पाठ पड़ना क्या बंद किया, चीन ने भी अपना असली रंग दिखाना चालू कर दिया.

अब एक्सपर्ट लोग यह कहते हैं, की यदि हम चीन की हाँ में हाँ मिलाते रहते, तो आज चीन के साथ सीमा हमारे लिए सर दर्द नहीं बनती.

इन विद्वानों की बात आपको समझ आ गयी होगी, ये यह कहना चाह रहे हैं, की भारत ने आत्मनिर्भर बनने का निर्णय गलत लिया है, उसे तो हमेसा के लिए चीन पर ओवर डिपेंडेंट बना रहना चाहिए, तभी चीन की कृपा भारत पर बरसेगी.

यह बात सही है, की भविस्य के बारे में किसी को कुछ नहीं पता है, लेकिन क्या इतिहास से भी यह विद्वान कुछ भी सीखना नहीं चाहते हैं. और यदि कुछ सालों के लिए हमने चीन का तुस्टीकरण कर भी दिया, तो क्या हम भविस्य के विनास से बच सकते हैं.

यह एक ग्राउंड रेअलिटी है, की चीन के साथ हमारा दुनिया का सबसे लम्बा सीमा विवाद है, और चाइनीस ड्रैगन इंडियन ओसेन को डकारना चाहता है. आप ही बताएं, चीन की साजिस को नजरअंदाज करके क्या हम चीन के साथ पहले की तरह व्यापार बढ़ाते रहे??

इसलिए चीन के साथ हमारा  विवाद एक जमीनी सच्चाई है, देखना बंद कर देने से वह सच्चाई समाप्त नहीं होगी. इसलिए भारत को चीन से डर कर झिझकने की जरूरत नहीं है. अब तो हम मोदी साहेब के नेतृत्वा में  आत्म निर्भरता की राह पर चल पड़े हैं.

और जहाँ तक सीमा पर चीन की छिछोरी हरकतों का सवाल है, उससे हमारे वीर सैनिक निपट लेंगे, इसका हमें पूरा विस्वास है, वैसे भी आपने पड़ा होगा, की सिक्किम में  भारत के एक यंग लेफ्टिनेंट ने एक ही बार में चाइनीस मेजर का मुँह खोल दिया था. 

इसलिए चीन का पिछलग्गू बनना हमें स्वीकार नहीं है, स्वाभिमानी भारत अब आत्म निर्भर बनेगा.

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