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पिछले कई दिनों से हमारे कुछ दर्शक कमेंट कर रहे हैं, की चीन ने भारतीय जमीं दबा ली, और मोदी सर्कार कुछ नहीं पर पायी.

हो सकता है, की इन कुछ दर्शको को मोदी सर्कार में भरोषा ना हो, लेकिन क्या इन्हे इंडियन आर्मी पर भी बिस्वास नहीं है?

आप सभी ने पड़ा होगा, की स्वयं इंडियन आर्मी चीफ ने कहा है, की LAC पर सिचुएशन पूरी तरह से कण्ट्रोल में हैं. तो हमारे लिए बात यही पर ख़तम होती है. 

अब जहाँ तक सवाल यह है, की चीन ने कितनी जमीं पर अतिक्रमण किया है, इस सवाल का जवाब देकर हम चीन को मनोवैज्ञानिक युद्ध में बिना लड़े जीत उपहार में नहीं दे सकते हैं.

गलवान वैली रीजन में जो एंटी इंडिया नैरेटिव सेट करने की कोसिस की जा रही है, ठीक वैसा ही प्रयास हुआ था, डोकलाम विवाद के दौरान. जबकि जमीं पर चीन भारत की ओर एक फुट तक रोड नहीं बना पाया, फिर भी मीडिया में भारत की जीत को हार में यह कहकर तब्दील करने की कोसिस की गयी, की चीन ने अपने कब्जे के इलाके में ये बना लिया वोह बना लिया.

जब जमीं पर डटी हमारी बहादुर सेना हार नहीं मान रही है, तो भला हम क्यों यूट्यूब पर वीडियो बनाकर अपनी ख़याली हार का ढिढोरा पीटें??

आप भी बताएं, आखिर हम क्यों चाइनीस पेपर ड्रैगन की बातों में आकर अपनी ही सेना पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वैसे भी यह वक़्त सवाल करने का नहीं, सपोर्ट करने का है.

लेकिन इस पुरे तनाव में हमने बिग पिक्चर को मिस नहीं करना चाहिए. तिब्बत पर कब्ज़ा करने के बाद वर्तमान चीन के निर्माता माओ ने कहा था, की तिब्बत हथेली है, तो  लद्दाक, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश उस हथेली की पांच उंगलियां हैं.

जब चीन सौ सालों की रणनीति पर काम कर रहा है, तो भला हम क्यों आज का अख़बार पढ़कर आपा खो देते हैं??

जबकि अब नेपाल नामक उगली पर चीन का कब्ज़ा हो गया है, और आप सभी को साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा होगा, की नेपाल स्वतंत्र राष्ट्र की तरह नहीं, बल्कि एक चाइनीस प्रान्त की तरह behave करने लगा है.

अब आप ही बताएं, वर्तमान लद्दाक स्टैंड ऑफ के लिए क्या हम सिंजियांग पर दोष धरते हैं, हम तो चीन की बात करते हैं?? ठीक उसी प्रकार यदि भारत नेपाल सीमा पर कोई विवाद होता है, तो हम चौधरी चीन की साजिस के मुताबिक चिरकुट नेपाल पर अपना समय और ऊर्जा क्यों बर्बाद करें?

ऐसा नहीं है, की नेपाल केवल भारत को ही आखें दिखा  रहा है, अमेरिका नेपाल को 500 मिलियन डॉलर की सहायता देने के लिए उताबला हो रहा है, लेकिन अमेरिकन डॉलर लेने मात्र से नेपाली सर्कार के हाथ थर थर काँप रहे हैं.

जबकि नेपाल नेक्स्ट तिब्बत बनने की राह पर चल नहीं दौड़ रहा है, हमें यह ध्यान रखना होगा, की हमारी निगाहे और निशाना दोनों चीन पर होना चाहिए,  नाकि पाकिस्तान और नेपाल जैसे प्यादों पर.

इसी बीच जब चीन अपने नेक्सस को मजबूत करते जा रहा है, तो हम भला क्यों अपना अलायन्स खड़ा करने से घवरायें??

अमेरिका की भूतपूर्व सीनियर अधिकारी ऐलिस वेल्स ने आज फिर ट्वीट किया है, एक्सटर्नल rebalancing बहुत जरूरी है, अंत में चीन से उसकी सम्प्रभुता को पैदा हुए खतरे के खिलाफ अमेरिका ही भारत के साथ खड़ा रहेगा.

अब आप में से कुछ लोग कह सकते हैं, की ये फॉर्मर सीनियर अफसर ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन की बात नहीं रख सकती है, ठीक बात है, आपको इनके द्वारा कही बात पर भरोसा नहीं है, तो फिर चीन के द्वारा फैलाये जा रहे उस प्रोपोगंडा पर आपको इतनी जल्दी क्यों विस्वास हो जाता है, की चीन ने हमारी जमीं दबा ली और भारतीय सेना और मोदी सर्कार सोती रह गयी??

जहाँ तक हम समझ सकते हैं, यह लड़ाई कोई भारत और चीन की है ही नहीं, यह तो लोकतंत्र और कम्युनिज्म की लड़ाई है, इसलिए जब कम्युनिस्ट देश एक जुट हो रहे हैं, तो डेमोक्रेटिक देश क्यों यह लड़ाई अलग अलग होकर लड़ें??

अंत में हम सबसे बेहतरीन बात करते हैं, आप सभी को याद होगा, चाइनीस कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में ताइवान ने ना सिर्फ दुनिया बल्कि विशेष तौर पर भारत की मदद की थी. आज हम मास्क बनाने में आत्म निर्भर हो गए हैं, लेकिन कुछ ही दिनों पहले हम मास्क इम्पोर्ट कर रहे थे, 

तब मई महीने की शुरुआत में ताइवान ने 10 लाख फेस मास्क भारत को डोनेट किये थे, तब वन चाइना की पागल पालिसी में बंधी भारत सर्कार ने ताइवान को थैंक यू नहीं बोला, लेकिन आज ताइवान में बसे150 भारतियों ताइवान को थैंक यू बोलने के लिए रैली निकाली. 

इस छोटे से मूवमेंट को देखकर फ़र्ज़ी चाइनीस ड्रैगन को बड़ी बेचैनी होगी, जी हाँ लद्दाक विवाद की गूँज अब चीन को ताइवान से सुनाई देगी.

आप ही बताएं, जब ताइवान में रहने वाले भारतीय यह कमाल  कर सकते हैं, तो हम आम भारतीयों को किसका डर सता रहा है. क्या हम चीन के माल का बहिस्कार करने के साथ साथ थैंक यू ताइवान मूवमेंट नहीं चला सकते हैं??

मदद करने वाले को धन्यवाद बोलने के पहले क्या अब हमें कम्युनिस्ट चीन से परमिशन लेनी होगी??

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