Taiwan's to invest $1 Billion in India

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पिछले महीने भारत सर्कार ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए 40 हज़ार करोड़ की प्रोडक्शन लिंक्ड स्कीम की घोसणा की थी. जिसके अंतर्गत  मेक इन इंडिया के तहत भारत में मोबाइल का उत्पादन करने के लिए चुनिंदा कंपनियों को अगले पांच वर्षो तक 6 से 4 परसेंट का इंसेंटिव दिया जाना था.

बेहद सरल शब्दों में इसका मतलब था, की सभी शर्तो को पूरा करने पर यदि कोई कपंनी भारत में 100 रुपये के मोबाइल बेचती है, तो सरकार की तरफ से उसे 6 से 4 रुपये मिल सकते हैं. जाहिर हैं, पांच वर्षो तक मिलने वाली यह स्पेशल सुविधा कंपनियों को भारत में निवेश हेतु आकर्षित करने के लिए काफी थी, और इंडस्ट्री ने इस सुविधा का स्वागत भी किया था.

लेकिन हमारे यहाँ पाजिटिविटी में नेगेटिविटी ढूढ़ने वालों को इसमें भी कमी दिखाई दे गयी थी, लेकिन कुछ ही महीनो में इस स्कीम का असर दिखना चालू हो गया है, 

आपको पता है, सैमसंग का दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट उत्तर प्रदेश में ऑपरेट कर रहा है, और अब उसने 706 मिलियन डॉलर का निवेश करके नया स्मार्ट फ़ोन डिस्प्लैट मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने का निर्णय लिया है. इम्पोर्टेन्ट पॉइंट यह है, की अब भारत मोबाइल असेंबली से आगे निकलकर रियल मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

लावा ने भी 105 मिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट करके मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को स्केल अप करने का निर्णय लिया है. 

और साथ में एप्पल ने यह देखना चालू कर दिया है, की कैसे वह चीन से अपनी 20 परसेंट पोडक्शन कैपेसिटी भारत में ट्रांसफर कर सकती है.

और अब iphone बनाने वाली ताइवानी कॉट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी फॉक्सकॉन ने भी भारत में १ बिलियन डॉलर का निवेश करने का डिसिशन ले लिया है. इस इन्वेस्टमेंट के जरिये फॉक्सकॉन अपने क्लाइंट एप्पल के स्ट्रेटेजिक डिसिशन को जमीं पर उतार रही है.

भारत सरकार की नयी प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव की स्कीम के अंतर्गत काम करते हुए फोक्सकोन अगले तीन सालों में यह निवेश करेगी, जिससे 6000 लोगों को डायरेक्ट एम्प्लॉयमेंट मिलेगा. जाहिर है, डायरेक्ट के साथ साथ indirect रोजगार के भी कई हज़ार अवसर खुलेंगे.

एक और जहाँ सैमसंग एक्सपोर्ट करने के लिए  भारत में मोबाइल उत्तपादन करने की सोच रहा है, तो एप्पल भी भारत की डिमांड को भारत में उत्पादन के जरिये पूरा करने की और आगे बढ़ रहा है.

जहाँ तक हमें साफ दिखाई देता है, यह तो अभी शुरुआत है, क्योकि इस नई स्कीम के तहत मोदी सरकार 5 लोकल और 5 ग्लोबल कंपनियों को यह विशेष सुविधा देने वाली है.

और यहाँ पर इम्पोर्टेन्ट बात यह है, की भारत सरकार ने इस स्कीम के नियम ऐसे बनाये हैं, की भारत के मोबाइल मार्किट पर कब्ज़ा करने वाली चाइनीस कंपनियों को सरकारी मलाई उड़ाने का मौका नहीं मिल पायेगा.

भारत के कायदे कानून अपनी तरफ है, चीन की कंपनियां इस स्कीम में शामिल होने की फ़िराक में पक्के से होगी, इसलिए हमें यह देखना होगा, की पीछे के दरवाजे से चीन की कंपनियां इंडियन टैक्स पेयर्स के पैसो से गुलझर्रे न उड़ा पाएं.

बात साफ़ है, ये 41 हज़ार करोड़ पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, यह भारत के करदाताओं का धन है, इसलिए मोदी सरकार से अपेक्षा है, की वह यह पैसा चाइनीस पॉकेट में नहीं जाने देगी.

अभी जबकि धीरे धीरे चाइनीस मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी भारत में शिफ्ट होने लगी  है, तो आप सभी ने नोटिस किया होगा, की ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग ट्रांसफर का ज्यादातर लाभ वियतनाम और अन्य आसिआन देशो को मिल रहा है.

आपको भी पता है, कसे घोड़े पर सवारी करना आसान होता है, जहाँ तक भारत का सवाल है, हमें अभी भी विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बहुत काम करना है.

जहाँ हम बहुत कुछ करने की जरूरत को स्वीकार करते हैं, वही हम यह भी जानते हैं, की अच्छी शुरुआत की ना सिर्फ पहल हो चुकी है, बल्कि सफलता के प्रारंभिक संकेत भी दिखाई देने लगे हैं.

शहर हो या जंगल, उनके खड़ा होने में वर्षो लग जाते हैं, और चीन के चमत्कार का आज जो इतना गुण गान किया जाता है, वह कोई दिन रात का करिश्मा नहीं है. 

वर्ष 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की यात्रा के दौरान जो विषैले बीज बोये थे, आज पूरी दुनिया उसी जहरीली चाइनीस फसल को काट रही है.

पॉइंट सिंपल है, जब भारत सरकार की स्कीम तीन सालों के लिए है, तो उसकी सफलता का आंकलन तीन महीनो में करना ठीक नहीं होगा.
फिर भी हमें पूरा विस्वाश है, धीरे धीरे ही सही लेकिन मोदी जी के नेतृत्व में  विश्व पटल पर भारत का उदय जरूर होगा.

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