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जैसा की आप सभी ने ऑब्ज़र्व किया है, पिछले छह सालों में सीमा वर्ती इलाको में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माड बड़े जोर शोर से हुआ है.
लेकिन चाहे लोहित नदी पर बना धोला सदिया ब्रिज हो या ब्रह्मपुत्र नदी पर बना बोगिबिल ब्रिज हो, युद्ध के समय दोनों को दुश्मन की एयर स्ट्राइक से टूटने का डर रहता है.
पॉइंट सिंपल हैं, भले ही हम शांतिकाल में इन पुलों का निर्माड कर लें, लेकिन युद्ध काल में नार्थ ईस्ट के इलाको में आवा जाहि बनाये रखने के लिए हमें और भी बेहतर विकल्पों का विकास करना होगा.
इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए, यदि आप मैप पर देखें तो नुमालीगढ़ से गोहपुर जाने के लिए ब्रह्मपुत्र नदी को पार करना होता है. इसलिए यदि असम को अरुणाचल प्रदेश से हमेसा जोड़े रखना है, तो नदी के ऊपर एक और पुल बनाने के बजाय अच्छा होगा, की नदी के नीचे सुरंग बनायीं जाये.
ऐसा नहीं है, की हर जगह सस्ते पुल की जगह पर महँगी सुरंग की बात यहाँ पर हो रही हैं. यहाँ पर सिर्फ स्ट्रेटेजिक ढंग से ऐसी जगहों पर पुल के स्थान पर सुरंग बनाये जाने का प्रस्ताव है, जिससे हर प्रकार के खतरे के बाबजूद पुरे नार्थ ईस्ट में सप्लाई चैन चलती रहे.
असम के दो जिलों को जोड़ने वाली यह फोर लेन सुरंग 14.85 किलोमीटर लम्बी होगी. जिसे आर्मी और सिविलियन्स के बड़े बड़े वाहन 80 किलोमीटर पैर ऑवर की रफ़्तार से निकल सकेंगे.
और भी अच्छी बात यह है, की भारत की इस तरह की पहली सुरंग के केवल ख़याली पुलाव नहीं पकाये जा रहे हैं, बल्कि इसके लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट बन चूँकि है, और उसे भारत सर्कार ने मार्च महीने में अप्रूवल भी दे दिया है.
और इस सामरिक सुरंग पर आगामी दिसंबर महीने में कंस्ट्रक्शन वर्क भी चालू हो जायेगा.
हमें उम्मीद है, की यह स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट समय पर बिना किसी देरी के साथ कम्पलीट कर लिया जायेगा.
जैसा की आप जानते हैं, इस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर न केवल नागरिको की जिंदगी को आसान करता है, बल्कि यह दुश्मन की पकी पकाई साजिस पर भी पूरी तरह से पानी फेर देता है.
और भी हाईलाइट करने वाली बात यह है, की यहाँ पर हम ठोकर खाकर सम्हल नहीं रहे हैं, बल्कि हम प्रोऐक्टिवली खतरे के अंदेशे को ध्यान में रखकर पहले से तयारी कर रहे हैं.
इसी बीच आगे बढ़ते हुए , आप सभी ने नोटिस किया है, की हम इनफार्मेशन वॉर फेयर में कमजोर हैं.
भारत से यदि गलती से भी कुछ भी बुरा जाये, तो उसकी बड़ी चर्चा होती है, लेकिन हमारे अच्छे कामो को पूरी तरह से नजर अंदाज़ कर दिया जाता है.
कल ही की बात है, बंगाल की खाड़ी में एक मर्चेंट शिप में तैनात पाकिस्तानी वर्कर की तबियत स्ट्रोक के कारन विगड़ गई, और उनकी जान बचाने के लिए इंडियन कोस्ट गार्ड को रिक्वेस्ट भेजी गयी.
फिर क्या था, इंडियन कोस्ट गार्ड ने रेस्क्यू operation को बखूबी अंजाम दिया, और भारतीय हॉस्पिटल में उपचार के बाद वह पाकिस्तानी वर्कर खतरे से पूरी तरह बहार है.
वैसे हमें thankless पाकिस्तान से कोई थैंक यू चाहिए भी नहीं है, क्योकि इंडियन एक्सक्लूसिव इकनोमिक जोन ही नहीं, बल्कि पुरे के पुरे हिन्द महासागर की जिम्मेदारी हमारी है. लेकिन फिर भी अच्छा होता, अगर कम से कम हमारी मीडिया इस ऑपरेशन को कवर करने का थोड़ा सा समय निकाल पाती.
आखिर पाकिस्तान को भी पता चलना चाहिए, की जब वह भारत की मौत के लिए साजिशो की उधेड़ बुन में लगा रहता है, तभी यह रेस्क्यू ऑपरेशन हो अथवा दवाओं का एक्सपोर्ट हो, हर मौके पर भारत पाकिस्तानियों को जीवन दान देता रहता है.
इसी दौरान ऐसी खबरें आ रही है, की ईरान ने भारत के बिना ही चाबहार और ज़हेदन के बीच की रेलवे लाइन के निर्मांड का फैसला लिया है.
वैसे यह कोई नई न्यूज़ नहीं है, पहले भी ईरान ने इस रेलवे प्रोजेक्ट में देरी का दोस भारत के सर पर मढ़ने की कोसिस करि थी . अब चीन और ईरान के बीच प्रस्तावित 400 बिलियन डॉलर की डील का कमाल है, की ईरान ने भारत को चार वर्ष पुराने प्रोजेक्ट से बेदखल करने का निर्णय लिया है.
पहली तो साफ़ करने वाली बात यह है, की यह प्रोजेक्ट फंसा भारत के कारण नहीं था, बल्कि यह अमेरिका और ईरान के बीच के तनाव की भेट चढ़ गया है.
अब यदि ईरान को लगता है, की चाइनीस कंस्ट्रक्शन कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह किये बगैर इस प्रोजेक्ट को पूरा कर देंगी, तो ईरान को हमारी तरफ से गुड लक. और हाँ चीन में अगर हिम्मत है, तो वह पहले खुले आम ईरान से तेल खरीद के तो दिखाए.
पॉइंट सिंपल हैं, इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में ना तो ईरान और ना ही चीन की कोई रूचि है, बल्कि वह सिर्फ चालू चीन के उकसावे पर भारत को मैसेज देना चाहता है.
इसलिए नेपाल हो, श्री लंका हो यह ईरान हो, हमारे पास विकल्प दो ही विकल्प हैं, या तो हम इन चाइनीस प्यादों से लड़ने में अपनी ऊर्जा और समय बर्बाद करते रहे, अथवा सीधे चौधरी चीन से हिसाब किताब बराबर करें.
आपको भी पता है, चीन के साथ भारत के साल दर साल व्यापारिक घाटे का कमाल ही है , चाहे पाकिस्तान हो या ईरान हो, हर जगह चीन भारत का पैसा ही भारत के खिलाफ खर्च कर रहा है.
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