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 https://www.rbth.com/tag/brahmos'

https://sputniknews.com/military/202008241080259889-brahmos-says-got-permission-from-russia-india-to-export-missiles-to-third-countries/

https://en.wikipedia.org/wiki/BrahMos

https://www.quora.com/Why-is-India-not-exporting-the-BrahMos-missile-to-other-countries

https://eurasiantimes.com/is-india-set-to-export-brahmos-missiles-to-the-philippines-indonesia-vietnam/

https://www.financialexpress.com/defence/made-in-india-missiles-big-hit-countries-across-the-globe-show-interest-in-buying-brahmos-akash/1515779/


जैसा की हम सभी को जानकारी है, वर्ष 2025 तक मोदी सर्कार ने 35 हज़ार करोड़ के डिफेंस एक्सपोर्ट का महत्वाकांक्षी लक्स्य अपने सामने रखा है.




इसलिए जब डिफेंस एक्सपोर्ट की बात चल रही है, तो हमारे मन में सबसे पहले ख्याल आता है, दुनिया की फास्टेस्ट सुपरसोनिक क्रूज ब्रह्मोस मिसाइल का




लम्बे समय से हम सुनते आ रहे हैं, की साउथ अफ्रीका, इजिप्ट, चिली, ओमान  और वियतनाम जैसे देशों ने इस अद्भुत मिसाइल को खरीदने में रुचि दिखाई है. और पिछले साल ऐसी खबरे भी आयी थी, की फ़िलीपीन्स ने ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने का निर्णय ले लिया है, और इस सम्बन्ध में कॉन्ट्रैक्ट इस साल फाइनल कर लिया जायेगा.




बातें तो चलती रही, और आप सभी ने भी बढ़ चढ़कर मित्र देशो को ब्रह्मोस मिसाइल के एक्सपोर्ट का समर्थन भी किया है. लेकिन  रियलिटी में आज तक ब्रह्मोस की कोई एक्सपोर्ट डील फाइनल नहीं हुई है,  हम इस जमीनी सच्चाई को नकार नहीं सकते हैं.




इसका एक प्रमुख कारण यह था, की ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर भारत और रूस के बीच जो इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट हुआ था, उसके अनुसार किसी भी तीसरे देश को इसके निर्यात के पहले भारत और रूस दोनों देशों को एक्सपोर्ट permission देनी होगी.




जबकि यह बात सही है, की भारत और रूस के बीच बहुत अच्छे सम्बन्ध है, लेकिन वर्ष 2016 के आते आते दोनों देशो के बीच सिर्फ सैद्धांतिक रूप से सहमति ही बन पायी, की कभी न कभी इस मिसाइल को एक्सपोर्ट किया जायेगा.




तब से लेकर आज तक चार साल पुरे हो चुके हैं, अब ब्रह्मोस चीफ जनरल मैनेजर के अनुसार फाइनली रूस और इंडियन गवर्नमेंट ने ब्रह्मोस मिसाइल को एक्सपोर्ट परमिट दे दिया है, और जल्द ही कोरोना महामारी के ख़तम होने के बाद इस परमिट पर एक्शन लिया जायेगा.




अब जबकि इन प्रिंसिपल से आगे बढ़कर एक्चुअल परमिट प्राप्त हो चूका है, यह उम्मीद की जा सकती है, जल्द ही भारत से ब्रह्मोस मिसाइल का पहला एक्सपोर्ट हो पायेगा.




लेकिन आप स्वयं देख लीजिये, इस छोटे से कदम को उठाने में हमने कितना लम्बा समय लगा दिया, और आज जब भारत और रूस यह निर्णय ले पाए है, इसका प्रमुख कारण भी चीन है.




क्योकि पिछले लम्बे समय से भारत चीन का तुस्टीकरण कर रहा था,  उम्मीद यही थी, की यदि भारत फ़िलीपीन्स और वियतनाम जैसे देशो को ब्रह्मोस एक्सपोर्ट नहीं करेगा, तो चीन का ईगो हर्ट नहीं होगा, और भारत चीन सीमा पर शांति का साम्राज्य बना रहेगा.




हम सभी का कॉमन सेंस बतलाता है, की तुस्टीकरण की नीति से किसी का कभी भला नहीं हुआ है, भारत ने आसियान देशो को ब्रह्मोस का एक्सपोर्ट तो नहीं किया. लेकिन चीन ने  दोकलाम के बाद गलवान को अंजाम दे दिया.




जबकि भारत चीन को बैचैन नहीं करना चाहता था, तो रूस के भी अपने हित थे, वह भी ब्रह्मोस की जगह अपनी सस्ती क्रूज मिसाइल बेचने की जुगाड़ में लगा था.




साथ में बहाना यह भी बनाया जाता था, की जब भारत की लोकल डिमांड ही पूरा नहीं हो पा रही है, तो हम ब्रह्मोस के एक्सपोर्ट के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं.




लेकिन आप देखिये, चीन से गलवान में धोका खाने के वाद भारत के सारे कन्फूज़न हवा हो चुके हैं. और ब्रह्मोस का एक्सपोर्ट परमिट भी दिया जा चुका है.




चलिए कोई बात नहीं, जब जागे तभी सवेरा, हमें विस्वास है, की औपचारिक अड़चनों के हटने के बाद अब जल्द से जल्द ब्रह्मोस मिसाइल की पहली एक्सपोर्ट डील फाइनल हो जाएगी.




फिर भी यह कहना जरूरी है, की भले ही भारत ने ब्रह्मोस को बेचने का मन बना लिया हो, यह भी देखना होगा, की क्या वियतनाम फ़िलीपीन्स जैसे अन्य आसियान देश यह मिसाइल खरीदकर चौधरी चीन को नाराज करने का जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं.




इतिहास गवाह है, भारत की तरह आसियान देशो को भी चीन का तुस्टीकरण करने की लत लगी हुई हैं.  इसलिए ब्रह्मोस की डील हो पाती है, यह सेलर के साहस के साथ साथ बायर की हिम्मत पर निर्भर करती है.




पॉइंट सिंपल है, यदि लोकतान्त्रिक देश अलग अलग होकर चीन का तुस्टीकरण करते रहेंगे, तो एक एक करके सभी लोकतान्त्रिक देशो को कम्युनिस्ट चीन के सामने घुटने टेकने होंगे.




अब वस देखना वाकी है, डेमोक्रेटिक देश इतिहास से कुछ सीखते हैं, अथवा इतिहास के शिकार बनते हैं.

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