India taught BIG Lesson of Friendship to Nepal.

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https://timesofindia.indiatimes.com/world/rest-of-world/nepal-relies-on-india-for-life-saving-remdesivir-drug/articleshow/77606929.cms

https://www.deccanchronicle.com/nation/politics/140920/nepal-buying-citizens-in-three-villages-on-border.html


 इस वीडियो को शुरू करने से पहले हम आपको जल्दी से बताते हैं, इनोवेटिव पढ़ाई प्लेटफार्म के बारे में, हमारे एक होनहार युवा दर्शक इसके कोफाउंडर हैं, जी हाँ, पढ़ाई एक एजुकेशन प्लेटफार्म है. जहाँ एजुकेशन को इम्प्रूव करने के लिए मोस्ट अफोर्डेबल एंड बेस्ट प्रोग्राम available है. सो aim हाई , do पढाई




चलिए अब बात करते हैं आज के टॉपिक की, पिछले कुछ वर्षो में हम सभी ने देखा है, की  जैसे जैसे चीन नेपाल के करीब आया, नेपाल भारत से दूर होता चला गया. और हाल के कुछ समय में नेपाल ने भारत के साथ रिश्तों को ख़राब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.




जब भी कभी द्विपक्षीय सम्बन्धो को नेपाल ने चोट पहुंचाई, तब हर बार बड़े बड़े विद्वानों का कहना था, की नेपाल के साथ रिश्तों को सुधारने के लिए भारत ने यह करना चाहिए वह करना चाहिए.




कभी कभी तो ऐसा लगता था, मानो नेपाल से दोस्ती बनाये रखने का ठेका केवल भारत ने ले रखा हो. हम सभी ने साफ़ तौर पर देखा है, की नेपाल के प्रधान मंत्री से लेकर आम जनता तक, भारत और भारतीयों को भला बुरा कहना मानो की एक फैशन बन गया हो.




अभी जबकि लद्दाक में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सातवे आसमान पर चढ़ा हुआ है, तो नेपाल कालापानी के आस पास के भारतीय गावों के लोगों को पैसा जमीं और घर का प्रलोभन देकर उन्हें नेपाली नागरिकता स्वीकारने के लिए ललचा रहा है.




असल बात का आपको भी अंदाज़ा है, चाइनीस पैसे से नेपाल भारतीय नागरिको को खरीदने में लगा हुआ है.




यह बात सही है, की भारत और नेपाल के बीच अच्छे रस्ते बनाये रखने की ज्यादा जिम्मेदारी बड़े देश यानि की भारत पर है. लेकिन क्या छोटे देश नेपाल की कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है. 




इसी बैकग्राउंड में आप देखिये, की कल नेपाल के राजदूत ने नेपाल के फॉरेन अफेयर्स मिनिस्टर को रेमडिस्विर दवा के 2000 इंजेक्शन गिफ्ट के रूप में दिए.




आपको जानकारी है, कोरोना से गंभीर रुप से संक्रमित रोगियों के लिए रेमडिस्विर एक कारगर मेडिसिन है. 




आपको अच्छे से याद होगा, कुछ ही महीनो पहले नेपाल के प्रधान मंत्री का कहना था, की भारतीय कोरोना वायरस बड़ा घातक है.  फिर भी  आज मुसीबत के दौर में भारत नेपाल की मदद कर रहा है.




लेकिन दुर्भाग्य देखिये, की ना तो भारतीय और ना ही नेपाली मीडिया को यह न्यूज़ कवर करने की फुर्सत है, आप ही बताएं, ऐसे अच्छे काम करने का क्या मतलब जिनके बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं??




नेपाल के मंत्री जी को भारत विरोधी स्टेटमेंट जारी करने का समय तो मिल जाता है, लेकिन भारत से मदद लेने के बाद उन्हें थैंक यू बोलने का समय आज तक नहीं मिल पाया है.




इसलिए आप सभी का साफ़ तौर पर मत रहा है, ऐसे गुप् चुप तरीके से मदद करने के बजाय अच्छा होगा, की भारत नेपाल जैसे थैंक लेस्स पडोसी की मदद ही ना करे.




और ऐसा नहीं है, की भारत नेपाल की कोई पहली बार मदद कर रहा है, 22 अप्रैल को भारत ने पेरासिटामोल और HCQ मेडिसिन नेपाल को दी थी, 17 मई को भारत ने Covid  टेस्ट किट, और 9 अगस्त को ICU वेन्टीलेटर्स नेपाल को मुहैया करवाए थे.




बात साफ़ है,जबकि भारत नेपाल की जेनुइनली help कर रहा है. बदले में चीन का प्यारा नेपाल भारत की पीठ पर बार कर रहा है. लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है, की जब नेपाल चाइनीस कोरोना वायरस की मार झेल रहा है, तो चीन कहाँ है??




हमें इस बात का अहसास है, की इंडियन टैक्सपेयर के पैसे से रेम डिस्विर दवा नेपाल को दी गयी है, लेकिन इसके बदले में हम भारतीयों को मिलेगी नेपाल से सिर्फ  गालियाँ.




वैसे इस बात का दोष भी हमें ही जाता है, क्योकि हमें मदद करना तो आता है, मदद का प्रचार करना नहीं. सायद यही कारण है, की नेपाल जैसे देश भारतीय मदद को भारतीय मजबूरी समझ लेते हैं.

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