Thank you America for Helping Indian Navy

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https://www.tribuneindia.com/news/nation/us-tanker-refuels-indian-navy-ship-141382

https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/watch-ins-talwar-on-mission-based-deployment-undertakes-refueling-with-us-navy-tanker/videoshow/78117643.cms

https://indianexpress.com/article/india/lemoa-in-place-us-tanker-refuels-indian-navy-ship-in-sea-of-japan-4932082/

https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/to-counter-china-navy-to-implement-new-plan-for-warships-in-indian-ocean-region/articleshow/61231821.cms?from=mdr


 ऐतिहासिक रूप से इंडियन नेवी राहत बचाव कार्यक्रम और एंटी पायरेसी मिशन पर वॉरशिप्स को इंडियन ओसेन में डेप्लॉय किया करती थी.




लेकिन हाल के कुछ वर्षो में खासकर वर्ष 2008 के बाद से चाइनीस नेवी की हरकतें हिन्द महासागर में तेजी से बढ़ने लगी. जबकि समुद्री शतरंज की विसात पर चीन ने जिबूती ग्वादर और हम्बनटोटा जैसे मोहरे आगे बड़ा दिए, भारत को चीन की साजिस समझने में 10 सालों का समय लग गया, तब जाकर नीड बेस्ड डिफेंसिव डिप्लॉयमेंट की रणनीति को छोड़कर वर्ष 2018 में इंडियन नेवी ने अपनाया था, एग्रेसिव मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट.




जिसके अंतर्गत भारतीय नौ सेना के मिशन रेडी जंगी जहाजों को proactively सामरिक समुद्री रास्तों पर तैनात किया गया.




लेकिन यहाँ पर दिक्कत यह थी, की हमेसा इस मिशन based डिप्लॉयमेंट को कैसे बरकरार रखा जाये, क्योकि हिन्द महासागर के दूर सुदूर के इलाको में तैनात इंडियन नेवी के जहाजों को जरूरी सप्लाई भी तो मुहैया  करानी पड़ेगी. 




यही पर अब काम आ रहा है, वर्ष 2016 में भारत और अमेरिका के बीच हुआ Logistics support एग्रीमेंट, आपको अच्छे से याद होगा, इस एग्रीमेंट को लेकर कई बर्षो तक भारत और अमेरिका के बीच मोलभाव चला, और पिछली भारत सरकारों ने इस एग्रीमेंट को लटकाये रखने की हर संभव कोसिस की.




यहाँ तक की जब मोदी जी के शाशन काल में इस एग्रीमेंट को finalize किया गया, तो लेफ्ट लिबरल नेताओं और विद्वानों ने इसका विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.




इस बैकग्राउंड में आप देखिये,  दो दिन पहले उत्तरी अरब सागर में दूर तैनात था, आईएनएस तलवार और उसे जरूरत थी, refueling की. और इस जरूरत को पूरा किया US नेवी फ्लीट टैंकर ने.




अब यदि जंगी जहाज को इतनी दूर मिशन बेस्ड डेप्लॉय किया गया है, तो उसे सप्लाई मुहैया करवाने में काम आया वही वर्ष 2016 का Logistics support एग्रीमेंट.




इस एग्रीमेंट के तहत ऐसा नहीं है, की अमेरिका ने यह सुविधा फ्री में दी है, बल्कि एग्रीमेंट के तहत सिस्टम का विकास हो गया है, जिसके अंतर्गत इंडियन नेवी को पता है, की नॉर्थेर्न अरेबियन सी में तैनात शिप की refueling के लिए अपना टैंकर भेजने के बजाये अमेरिकन फ्यूल टैंकर से मदद ली जा सकती है, और बाद में पैमेंट किया जा सकता है.




और ऐसा नहीं है, की यह कोई पहली बार हो रहा है, वर्ष 2017 में सी ऑफ़ जापान में तैनात INS सतपुड़ा को भी अमेरिकन टैंकर ने refueling की सुविधा उपलब्ध कराई थी.




बात साफ़ है, अमेरिका के साथ भारत का logistics एग्रीमेंट समय की कसौटी पर खरा उतरा है, तभी तो आज भारत फ्रांस और जापान जैसे देशो के साथ ऐसा ही एग्रीमेंट कर चूका है. और जल्द ही रूस के साथ भी ऐसा एग्रीमेंट होने वाला है.




समय पर इंडियन नेवी की मदद करने के लिए US नेवी को धन्यवाद.




लेकिन आज फिर उन लेफ्ट लिबरल विद्वानों का असली चेहरा बेनकाब हो गया, ये विद्वान लोग चीन से बफादारी निभाते हुए अमेरिका के साथ एग्रीमेंट का विरोध किया करते थे, ताकि भारत कभी भी सफलता पूर्वक कम खर्चे पर  मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट कर पाए.




आज भी यह विद्वान कहते हैं, की लद्दाक सीमा विवाद इसलिए है, क्योकि जैसे जैसे भारत अमेरिका के करीब गया, वैसे बैसे चीन भारत से दूर होता चला गया.




चलिए हम मान लेते हैं, की यह विद्वान लोग सही कह रहे हैं, तो हमारा छोटा सा सवाल है, 1962 में क्या भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती हो गयी थी, जो चीन ने भारत पर सीधा हमला बोल दिया था.




बात साफ़ है, ये विद्वान लोग चीन की गलती का जिम्मेदार भी भारत को ठहराते हैं, इनका एक मात्रा सुझाव यह है, की भारत ने चीन का तुस्टीकरण करते रहना चाहिए.




चलिए इन एक्सपर्ट लोगों को जो कहना हो कहने दीजिये, अभी भारत सही रस्ते पर है, और यह हम सभी के लिए एक संतोष प्रद सिचुएशन है.

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