मोदी जी ने डाल दिया चीन के रंग में भंग

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India, Australia sign document to boost naval ties

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References -

https://indianexpress.com/article/india/india-australia-sign-document-to-boost-naval-ties-7460564/

आज जो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की विजय दिख रही है, उसके पीछे उनकी 20 सालो की मेहनत है. इसलिए भले ही आज मीडिया का तालिबान प्रेम उमड़ रहा है, तालिबान के समर्थन में भारत के दो कोंड़ी के नेता लोग माहौल खड़ा कर रहे हैं, उस दौरान हमें यह याद रखना चाहिए, की यह 11 दिन का चमत्कार नहीं है.


कहने का मतलब यह है, की सफलता के लिए बहुत लम्बा संघर्ष करना होता है. इसी बैकग्राउंड में जबकि पूरी दुनिया का ध्यान केंद्रित है अफ़ग़ानिस्तान पर, भारत ने इंडो पसिफ़िक एरिया के ऊपर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली है.


आपने एक दम सही सुना दोस्तों, भारत और ऑस्ट्रेलिया के नेवी चीफ्स ने हस्ताक्षर कर दिए हैं, जॉइंट गाइडेंस फॉर the ऑस्ट्रेलिया इंडिया नेवी to नेवी रिलेशनशिप एग्रीमेंट पर.


यह एग्रीमेंट इंडिया ऑस्ट्रेलिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का हिस्सा है. जिसके तहत दोनों देशो की नौ सेनाओ के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी.


वैसे भी हम हमेशा से ऐसे स्ट्रक्चरल एग्रीमेंट का स्वागत करते आये हैं, क्योकि कल को जब इंडो पसिफ़िक में इंडिया ऑस्ट्रेलिया किसी बड़े ऑपरेशन को अचानक से अंजाम दे देंगे, तब पूरी दुनिया तालियां पीटेगी, लेकिन कल यह सब मौके पर हो सके, उसके लिए आज यह एग्रीमेंट करना पड़ रहा है.


इस एग्रीमेंट के बल पर पूरा का पूरा सिस्टम खड़ा होगा, जिसके अंतर्गत दोनों देशो की नौ सेनाएं आपस में मिलकर कुशलतापूर्वक काम कर पाएं, और जरूरत पड़ने पर अमेरिका जापान जैसे किसी तीसरे और चौथे देश के साथ भी कंधे से कन्धा मिला पाएं.


देखा जाये तो इसी प्रकार के एग्रीमेंट हिन्द प्रशांत महासागर छेत्र में शांति सुरक्षा स्थाईत्वा और समृद्धि की नींव का पत्थर है. यह बात और है, की दुनिया महल के कंगूरों को मुँह फाड़ फाड़ कर देखती है, नींव के पत्थर पर नजर किसी की नहीं जाती.


भले ही सारी दुनिया हमें मोदी भक्त कहती रहे, लेकिन हमें इस सर्कार की यही बात सबसे अच्छी लगती है, हर व्यवधान और ध्यान भटकाने वाली घटनाओ के बीच भी वह बाजीराव की रफ़्तार से सदैव आपने लक्स्य की ओर आगे बढ़ती रहती है.


इसी पृष्ठ्भूमि में भारत और वियतनाम की नौ सेनाओं ने साउथ चाइना सी में नौ सैनिक युद्ध अभ्यास ख़तम कर लिया है.


वैसे भी आप सभी ने हमेसा से मांग की है, की हिन्द महासागर में चीन का मुकाबला करने से अच्छा होगा, की चीन को सीधी साउथ चाइना सी में चुनौती दी जाये. भविस्य में यदि कहीं बफर ज़ोन बनेगा, तो साउथ चाइना सी में बनेगा, हिन्द महासागर में नहीं.


बहुत हुआ, लद्दाख की तरह हमारे हिन्द महासागर में बफर जोन हमें स्वीकार नहीं होगा. इसलिए हमें डिफेंसिव के बजाये ओफ्फेंसिव मोड में आना होगा. बीजेपी के प्रवक्ता हों अथवा कोई भी हो, जो बचाव की मुद्रा में रहेगा, वह सिर्फ और सिर्फ पिटेगा.


देखा जाये, तो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की दुर्गति का कारन भी यही था, की अमेरिकी सैनिको की वापसी के दौरान उन्होंने डिफेंसिव पोजीशन लेकर शहरों को बचाने का निर्णय लिया, और पूरा का पूरा अफ़ग़ान एडमिनिस्ट्रेशन ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर पड़ा.


जरा कल्पना कीजिये, यदि कहीं अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ते समय, अफ़ग़ान सेना तालिबान के खिलाफ ओफ्फेंसिव मोड में होती, कंसोलिडेट होकर शहरों को डिफेंड करने के बजाये,  शुरुआत से ही तालिबान के स्ट्रांग होल्ड पर अटैक कर रही होती.  तो  जीत हार एक तरफ, कम से कम एक बात तो तय है, 11 दिनों के भीतर थाली पर परोसी जीत तालिबान को हांसिल ना हो पाती.


एनीवे अफ़ग़ानिस्तान की अफरा तफरी और इतिहास ने हमें सिखाया है, की युद्ध रणनीति और हिम्मत के बल पर जीते जाते हैं, हथियारों के बल पर नहीं. इसलिए आर्थिक और सैन्य महाशक्ति कहे जाने वाले चीन से डरने घबराने की तो जरूरत है ही नहीं.


जब तालिबान ने अमेरिकियों की हवा टाइट कर दी, तो चीन से संघर्ष करते समय हम क्यों असमंजस में पड़े रहें.

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