खाड़ी के देशो के खिलाफ भारत ने खड़ा किया नया सिस्टम
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EXCLUSIVE India plans refiners' joint oil deals to cut import bill
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References -
https://www.reuters.com/business/energy/exclusive-india-plans-refiners-joint-oil-deals-cut-import-bill-2021-10-19/
https://www.reuters.com/article/us-india-iran-oil-idUSKCN1G10T4
पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों ने दिवाली के पहले हमारे बजट का दिवाला निकाल दिया है, और महगाई के लिए मोदी जी को कोसना हमारे देश में वैसे भी टाइम पास करने का तरीका बना हुआ है.
लेकिन समस्या की जड़ आपको भी पता है, जबकि दुनिया भर में पेट्रोल डीज़ल की डिमांड धड़ा धड़ बढ़ रही है, फिर भी खाड़ी के देशो ने कच्चे तेल का उत्पादन जान बूझकर कम कर रखा है. डिमांड के सामने सप्लाई के कम होने के कारण कच्चे तेल में उबाल आ रहा है.
यह तो आपको पहले से पता है, लेकिन बड़ा सवाल है, की आखिर इस स्थिति से कैसे निपटा जाये, तो दोस्तों, इसका जवाब है, नजर बदली तो नज़ारे बदले, कस्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले.
दरअसल मोदी सर्कार ने अब निर्णय लिया है, की कच्चा तेल खरीदने वाली कोई भी भारतीय कंपनी हो, चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट हो, हर महीने में दो बार सब मिलकर एक मीटिंग करेंगे, और चर्चा करें, ताकि कच्चे तेल की कीमतों के बारे में आम राय बन सके.
जब विचारों में समानता आ जाएगी, तो सरकारी और प्राइवेट कंपनियां मिलकर एक साथ कच्चा तेल खरीद सकती है, और बचपन में हम सभी ने पढ़ा है, की एक और एक ग्यारह होते हैं.
जब कई इंडियन कंपनियां मिलकर खाड़ी के देशो के साथ बड़ी क्वांटिटी के लिए मोलभाव करेंगी, तो खाड़ी के देशो को झक मार के सस्ते दाम पर कच्चा तेल बेचना पड़ेगा.
वैसे भी यह आम अनुभव की बात है, की जब कई लोग मिलकर अधिक मात्रा में माल खरीदते हैं, तो उन्हें सस्ता भाव मिल जाता है. इसलिए भारत सर्कार अब इस सिंपल आईडिया का Complex सिनेरियो में कर रही है इस्तेमाल.
अब आपको लग सकता है, की ऐसा करने से कुछ नहीं होगा, तो दोस्तों, यदि हम इतिहास की और देखें, तो तीन चार साल पहले जब भारतीय कंपनियों ने मिलकर ईरान के साथ मोलभाव किया था, तो ईरान को कच्चे तेल का ट्रांसपोर्ट फ्री में करना पड़ गया था, मतलब हमें सिर्फ कच्चे तेल की कीमत अदा करनी पड़ी, उसका हैंडलिंग एंड ट्रांसपोर्ट चार्ज ईरान ने भरा.
ऐसा नहीं, की ईरान को ऐसा करने से कोई घाटा हुआ, सिर्फ उसका प्रॉफिट मार्जिन थोड़ा कम हुआ होगा, और हमें क्या लेना देना ईरान की कैलकुलेशन से, हमें मतलब होना चाहिए, की क्या मोलभाव करके हमें तुलनात्मक रूप से बेहतर डील मिल रही है.
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, इसने यह कह दिया, उसने वह कह दिया, इससे ज्यादा हम हमेशा महत्वा देते हैं, की किस प्रकार ऐसे सिस्टम का विकास किया जा रहा है, जो की भविस्य की कसौटी पर खरा उतरें.
आयल इम्पोर्ट करने वाली सरकारी और प्राइवेट कंपनियों की हर पंद्रह दिनों में होने वाली मीटिंग आपसी सहयोग के नए रस्ते खोलेगी, क्योकि कभी कभी यह कम्पनिया एक दूसरे के पर कतरती नजर आ जाती है, लेकिन यदि ये सब साथ मिलकर बैठने लगी, तो आपसी समन्वय और सहयोग बढ़ाया जा सकेगा इसमें कोई शक नहीं है.
देख लीजिये दोस्तों, मोदी सर्कार ने ना सिर्फ अपना नजरिया बल्कि कंपनियों के काम करने का तरीका भी बदल दिया है.
पप्पू पुजारियों की तरह मोदी सर्कार भी तो खाड़ी के देशो के खिलाफ अखाड़े में उतर सकती थी, गली दे सकती थी, उन्हें कोस सकती थी, लेकिन उससे ना पहले कभी कुछ हुआ ना भविस्य में कुछ होगा. नए परिणाम चाहिए तो नए प्रयास भी करने होंगे.
ठीक इसी प्रकार आपके पास भी दो विकल्प है, पहला और आसान विकल्प है, की पप्पू पुजारियों की तरह पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों के लिए मोदी जी के माथे पर दोष मडौं और अपना खून जलाओ,
दूसरा और बेहतर विकल्प है, की उन सरकारी और प्राइवेट कंपनियों में निवेश करो जिन्हे पेट्रोल डीज़ल की बढ़ती कीमतों से लाभ हो, और जो कंपनियां इथेनॉल एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल के छेत्र में काम कर रही है. ऐसा करने से ना सिर्फ आपको मुनाफा मिलेगा बल्कि जिंदगी में मजा भी आएगा. सब नजरिये का खेल है, बाबू भैया.
अब यदि आपको दूसरा विकल्प अपनाना हो, तो आप एक बार शामिल हो जाएँ, आत्मनिर्भर इन्वेस्टर कोर्स में. फिर जिन्दरी भर शांति के साथ अपनी सम्पत्ति खड़ी करते रहें.
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