75 सालों बाद पता चली राज की जापानी बात
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Reference -
https://indiaeducationdiary.in/jica-morth-sign-agreement-for-capacity-development-for-resilient-mountainous-highways-in-india/
सायद आपके ध्यान में हो, भारतमाला प्लान के अंतर्गत भारत उत्तर पूर्व के राज्यों, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी और दुर्गम इलाको में सड़को और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर खासा ध्यान दे रही है.
यह रिमोट रोड कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर ना केवल सीमावर्ती इलाको में रहने वाले भारतीयों के जीवन में जान डाल देगा, बल्कि सीमा सुरक्षा में दिन रात लगे भारतीय सैन्य बलों का कठिन काम भी आसान कर देगा.
जबकि पहाड़ी इलाको में रोड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत को पप्पू पुजारियों के अलावा कोई नकार नहीं सकता है, लेकिन यह एक जमीनी सत्य है, की पुलों और सुरंगों का डिज़ाइन एंड कंस्ट्रक्शन करने वाले टॉप क्वालिटी सिविल engineers का भारत में आभाव है, साथ ही साथ हमारे यहाँ इस तरह की टेक्नोलॉजी की भी टेंशन है, इस लिए यह सवाल हमारे सामने खड़ा है की इन अस्थिर और उथल पुथल से भरे पहाड़ी इलाको में सड़को का रख रखाव कैसे साल भर रखा जाये?
स्किल और नॉलेज कैपेसिटी के इस गैप को पूरा करने का जिम्मा उठाया है, जापान ने. जी हाँ, Japan International Cooperation एजेंसी अब भारत में अपने एक्सपर्ट्स को लम्बी अवधि के लिए डेप्लॉय करेगी, साथ ही समय समय पर शार्ट टर्म के लिए भी जापानी एक्सपर्ट भारत आते रहेंगे. और इस पुरे सिस्टम को खड़ा करने के लिए जापान और भारत के बीच एग्रीमेंट भी हो चूका है, बोले तो पूरा काम फुल एंड फाइनल हो गया है, यह होगा तो वह होगा वाली बात हम वैसे भी नहीं करते हैं.
यह विदेशी एक्सपर्ट अपने जापानी ज्ञान और अनुभव के आधार पर भारतीय एक्सपर्ट्स को सिखाएंगे, की पहाड़ी इलाको में बेजोड़ इंफ्रास्ट्रक्चर का डिज़ाइन कंस्ट्रक्शन और रख रखाव कैसे किया जाये.
एक ओर Japan International Cooperation एजेंसी इंडियन रिमोट इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को आर्थिक सहायता देती है, तो दूसरी ओर अब वह शैक्षिक सहायता भी दे रही है, ताकि पहाड़ी रोड्स के मामले में भारत अपने पैरों पर खड़ा हो सके.
सरल शब्दों में इस प्रकार मरी हुई मछली ना देकर, जापान भारत को मछली पकड़ना सिखा रहा है.
अब आप को तो पता है, यदि भारत पहाड़ी इलाको में कम दाम पर ज्यादा चलने वाली रोड्स का कंस्ट्रक्शन कर पाया, तो इसका सबसे अधिक दर्द किसे होगा.
जापान की नजरें जरूर नार्थ ईस्ट, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड पर हैं, लेकिन निशाना कहीं और हैं.
एक बार इन तीन राज्यों के प्रोजेक्ट के लिए भारतीय एक्सपर्ट ने यदि जापानी ज्ञान प्राप्त कर लिए, तो वह इस नॉलेज का इस्तेमाल अपने आप लद्दाख और कश्मीर में कर लेंगे.
और तो और चूँकि यह नॉलेज ट्रांसफर हो रहा है, इसलिए ना तो चीन और ना ही उसका पिट्ठू पाकिस्तान इस पुरे घटनाक्रम को लेकर कोई चिल्ला चोट मचा पाएंगे. बैठे बैठे वह मिसमिसाते रहेंगे, लेकिन उन्हें असली मजा तो तब आएगा जब जापानी टेक्नोलॉजी के बल पर बनी भारतीय सड़कें साल के बारह महीने बराबर दौड़ती रहेंगी.
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